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हाथ-पैर बांधकर लाठी से पीटना, ठंड में रातभर खड़ा रखना... अखाड़ों में टूटे नियम तो कोतवाल देते हैं ये सजा

अखाड़ों की परंपरा को जीवित रखने में कोतवाली परंपरा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. कोतवाल अखाड़ों के नियमों का पालन सुनिश्चित करते हुए अनुशासन और सुरक्षा बनाए रखने का दायित्व निभाते हैं. महाकुंभ में हर एक अखाड़े की अपनी कोतवाली होती है. कोतवाल पद का खास उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अखाड़ों के नियमों का किसी भी परिस्थिति में उल्लंघन न हो.

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अखाड़ों में कोतवाल का पद भी होता है जो अनुशासन कायम रखने की जिम्नेदारी निभाते हैं
अखाड़ों में कोतवाल का पद भी होता है जो अनुशासन कायम रखने की जिम्नेदारी निभाते हैं

महाकुंभ-2025 के आयोजन से धर्मनगरी प्रयागराज गुलजार है. कुंभ का आयोजन भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का अद्वितीय संगम है और यह दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक आयोजन है. महाकुंभ की भव्यता और विशालता कोई एक-दो साल या बीते कुछ वर्षों की बात नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपरा है. इसे संभालने के लिए प्राचीन परंपराओं और अनुशासन का पालन किया जाना आज भी जारी है. कुंभ की शोभा और सार्थकता अखाड़ों से बनती है और ये अखाड़े ही परंपराओं के निर्वाहक हैं.

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विरासत है अखाड़ों की परंपरा
पत्रकार और लेखक धनंजय चोपड़ा अपनी किताब 'भारत में कुंभ' में इस बात को बहुत विस्तार से लिखते हैं और बताते हैं कि अखाड़े सदियों पुरानी व्यवस्था को संभालने और उन्हें जीवित रखने में इस लिए सक्षम रहे क्योंकि उन्होंने खुद को भी कड़े अनुशासन में ढाला है. इस अनुशासन की भी सुरक्षा वह खुद करते हैं. अखाड़ों का अनुशासन जिंदा है और आज एक विरासत बन चुका है तो इसका श्रेय अखाड़ों में बंटे विभिन्न पदों को जाता है, जिसमें उनका कोतवाल पद बहुत प्रमुख नाम है. 

हर अखाड़े की होती है अपनी कोतवाली
अखाड़ों की परंपरा को जीवित रखने में कोतवाली परंपरा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. कोतवाल अखाड़ों के नियमों का पालन सुनिश्चित करते हुए अनुशासन और सुरक्षा बनाए रखने का दायित्व निभाते हैं. महाकुंभ में हर एक अखाड़े की अपनी कोतवाली होती है. कोतवाल पद का खास उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अखाड़ों के नियमों का किसी भी परिस्थिति में उल्लंघन न हो. बड़े अखाड़ों में चार मुख्य कोतवाल होते हैं, जो अपनी-अपनी कोतवाली का संचालन करते हैं. वहीं छोटे अखाड़ों में दो कोतवाल होते हैं. इन कोतवालों का चयन कुंभ शिविर की स्थापना के समय किया जाता है.

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कोतवाली का प्रमुख “छड़ीदार” भी कहलाता है. इसके अलावा अन्य सहायक कोतवाल हर समय शिविर में तैनात रहते हैं. ये कोतवाल न केवल अखाड़े की छावनी की निगरानी करते हैं, बल्कि पेशवाई और शाही स्नान के समय साधुओं को अनुशासन में बांधे रखने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं. शाही स्नान के दौरान कभी-कभी अतिरिक्त कोतवालों की नियुक्ति भी की जाती है.

कोतवाल का कार्यकाल कुंभ शिविर के समापन तक हो सकता है. हालांकि, कुछ अखाड़ों, जैसे जूना अखाड़ा, में कोतवाल तीन वर्षों के लिए चुने जाते हैं. इनका चयन कुंभ मेले के आरंभिक दिनों में होता है. कोतवाली को अखाड़े के गुरु की कुटिया के पास स्थापित किया जाता है, ताकि यह अखाड़े की गतिविधियों का केंद्रीय बिंदु बन सके.

कोतवाल की पोशाक और उपकरण उनकी पहचान का हिस्सा होते हैं. साधु इन्हें आसानी से पहचान सकें, इसके लिए उनका स्पेशल ड्रेस-कोड होता है. कोतवाल हमेशा हाथ में चांदी की मूठ वाली लाठी लेकर चलते हैं. यह लाठी न केवल उनकी पहचान है, बल्कि अनुशासन बनाए रखने का प्रतीक भी है.

महाकुंभ जैसे विशाल आयोजन में अनुशासन बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है. कोतवाल अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले छोटे-मोटे अपराधों का तुरंत निपटारा कर देते हैं. इनमें साधुओं को अनुशासनहीनता के लिए दंड देना भी शामिल है. कोतवाल द्वारा दी जाने वाली सजाएं पारंपरिक और रोचक होती हैं. इनमें गोललाठी ज्यादा कठिन मानी जाती है. इसमें अपराधी को लाठी बांधकर पीटा जाता है. इसके अलावा अन्य सजा भी हैं, लेकिन वह कठिन साधना की तरह हैं. 

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गंगा में डुबकी: 108 बार गंगा में डुबकी लगवाना.

सेवा कार्य: गुरु की कुटिया या रसोई में सेवा करना.

अनुशासनात्मक कार्रवाई: ठंड में खुले आसमान के नीचे खड़ा रखना.

कोतवाल का कोई वेतन निर्धारित नहीं होता, लेकिन इन्हें अखाड़ों में बहुत सम्मान मिलता है. जिन कोतवालों का कार्यकाल सराहनीय रहता है, वे थानापति, महंत और श्रीमहंत जैसे बड़े पदों के लिए भी चुने जा सकते हैं. यह परंपरा अखाड़ों की आंतरिक संरचना को मजबूत बनाती है. महाकुंभ के दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु और साधु एकत्र होते हैं. ऐसे में अनुशासन और सुरक्षा बनाए रखना बेहद जरूरी होता है. कोतवाल न केवल अखाड़े के अंदर व्यवस्था बनाए रखते हैं, बल्कि किसी भी अनहोनी की स्थिति में तुरंत कार्रवाई करते हैं.

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चिमटा बजाकर देते हैं संकट का संदेश
कोतवाल चिमटे का उपयोग आपातकालीन सूचनाओं को फैलाने के लिए भी करते हैं. किसी भी अप्रिय घटना की स्थिति में चिमटा बजाकर सभी को सतर्क किया जाता है.
छोटे-मोटे मामलों का निपटारा कोतवाल खुद करते हैं, लेकिन गंभीर अपराधों का निर्णय अखाड़े की “जाजिम” या पंचायत में होता है. यह परंपरा अखाड़ों की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को दर्शाती है.

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जाजिम का अर्थ दरी या जमीन पर बिछने वाला चादर होता है. अखाड़े में न्याय व्यवस्था के लिए पंच इसी पर बैठते हैं, और सब उनके सामने बैठते हैं. इस व्यवस्था का आधार ये है कि न्याय के दरबार में सभी बराबर हैं और सिर्फ न्याय ही ऊंचा रहता है. इसलिए इसे 'जाजिम' व्यवस्था कहते हैं.

अनुशासन की अनूठी मिसाल है कोतवाली परंपरा
महाकुंभ में कोतवाल की परंपरा अनुशासन और सुरक्षा की अनूठी मिसाल है. यह प्राचीन परंपरा न केवल अखाड़ों के नियमों को संरक्षित करती है, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी सहायक है. यदि आप महाकुंभ के दौरान किसी अखाड़े में प्रवेश करते हैं, तो सबसे पहले कोतवाल से ही आपका सामना होगा. कोतवाल की सतर्कता और अनुशासन के प्रति उनकी निष्ठा ही महाकुंभ जैसे विशाल आयोजन की सफलता का आधार है.

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