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महाकुंभ में लोगों का हुजूम ही नहीं, एक प्राचीन तीर्थ भी स्नान करने आता है, जानिए शिवजी से जुड़ी ये कथा

भारत में तीर्थ स्थानों की यात्रा और भ्रमण भी पाप से मुक्ति पाने का एक जरिया है. इसलिए कहा जाता है कि तीर्थों ने असंख्य लोगों के पाप उठा रखे हैं. ऐसे में यह तीर्थ कुंभ आयोजनों का इंतजार करते हैं और जहां भी इनका आयोजन होता है, वहां पहुंचकर खुद को पवित्र करते हैं. ऐसा ही एक तीर्थ है कनखल. 

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पौष पूर्णिमा से महाकुंभ स्नान की शुरुआत हो गई है
पौष पूर्णिमा से महाकुंभ स्नान की शुरुआत हो गई है

प्रयागराज में महाकुंभ-2025 की शुरुआत पौष पूर्णिमा से हो गई है. संत-भक्त और श्रद्धालु इस महाकुंभ में आस्था की डुबकी लगा रहे हैं और संगम तट पर बने घाट हर-हर महादेव से गूंज रहे हैं. संगम स्नान का महत्व सीधे तौर पर पाप और पुण्य से जुड़ा हुआ है. इसे लेकर मान्यता है कि संगम स्नान से कर्म के बंधन कट जाते हैं और पाप नष्ट हो जाते हैं. इन मान्यताओं को प्रबल बनाती हैं, लोककथाएं. कहा जाता है कि संगम में सिर्फ मनुष्य ही नहीं, बल्कि कई तीर्थ स्थल भी स्नान करते आते हैं और खुद को पवित्र करते हैं. 

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कुंभ का इंतजार करता है कनखल
भारत में तीर्थ स्थानों की यात्रा और भ्रमण भी पाप से मुक्ति पाने का एक जरिया है. इसलिए कहा जाता है कि तीर्थों ने असंख्य लोगों के पाप उठा रखे हैं. ऐसे में यह तीर्थ कुंभ आयोजनों का इंतजार करते हैं और जहां भी इनका आयोजन होता है, वहां पहुंचकर खुद को पवित्र करते हैं. ऐसा ही एक तीर्थ है कनखल. 

हरिद्वार में मौजूद है कनखल
हरिद्वार की सुरम्य वादी में पहाड़ी तलहटी में है कनखल झेत्र, जिसे शिवजी के पहले विवाह से जुड़ी भूमि माना जाता है. यह उनके जीवन की सबसे बड़ी घटना का साक्षी है, जहां उनकी पहली पत्नी सती का दहन हो गया था. हरिद्वार से थोड़ी ही दूर स्थित कनखल तीर्थ, प्राचीन नगर सभ्यता का भी आधार है. शिव के क्रोध और सती दाह के कारण यह क्षेत्र निर्जन हो गया था और फिर यहां की पवित्रता हरिद्वार में आकर स्थापित हो गई थी. 

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फिर जब एक युग के बाद गंगा की धारा हरिद्वार से गुजरी तो कनखल का श्राप भी खत्म हो गया. यह फिर से हरा-भरा हो गया. महादेव ने उसी अपनी कृपा का पात्र बनाया. कहते हैं कि कनखल तीर्थ भी कुंभ के आयोजन के कुंभ आकर स्नान करता है और पवित्र होता है. 

यह है सती दाह की कथा
असल में सती, पार्वती की पूर्व जन्म का अवतार हैं. मां दुर्गा के आशीर्वाद से उन्होंने प्रजापति दक्ष के घर जन्म लिया था. इसके साथ ही उन्होंने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव से विवाह किया था. इससे क्षुब्ध होकर सती के पिता, दक्ष ने कनखल तीर्थ में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया और इस समारोह में शिव एवं सती छोड़कर अन्य सभी देवताओं को निमंत्रण दिया. पिता के न बुलाए जाने के बावजूद सती अपने इस यज्ञ समारोह में भाग लेने के लिए जबरन ही पहुंच गईं थीं.

वहां दक्ष ने उनका और महादेव का घोर अपमान कर दिया. इससे दुखी सती ने यज्ञ कुण्ड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए. तब क्रोधित शिव ने वीरभद्र को दक्ष का वध करने तथा यज्ञ का विनाश करने कनखल भेजा. वीरभद्र की क्रोध की अग्नि में कनखल जलकर भस्म हो गया. 

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इसलिए पवित्र है कनखल
क्रोधित शिव सती की मृतदेह उठाकर सारी पृथ्वी में पर घूमने लगे. इससे सब ओर हाहाकार मच गया. अंत में शिव के क्रोध को शांत करने के लिए विष्णु ने चक्र द्वारा सती की देह को कई भागों में काट कर गिराया. सती की देह के विभिन्न अंग जिन स्थलों पर गिरे, उन सभी स्थानों पर शक्ति पीठ की स्थापना की हुई. इसके बाद सती ने अगले जन्म में हिमालय की पुत्री, पार्वती के रूप में पुनर्जन्म प्राप्त किया. तब उन्होंने कनखल के पास ही आकर शिव की ओर घोर तपस्या की थी.

तीर्थों में तीर्थ है प्रयाग
तीर्थों में राजा प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान सभी तीर्थों का जल आकर मिल जाता है. इसीलिए कुंभ के दौरान इस तीर्थ की बहुत मान्यता है. इसी दौरान कनखल तीर्थ भी प्रयाग पहुंचता है और सती दहन का जो पाप उसकी भूमि पर हुआ था, इस वजह से आज तक उस भार को उतारने कुंभ स्नान के लिए आता है. 

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