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ऑर्गन डोनेशन के 14 साल बाद खुला केस, अस्पताल ने मलेशियाई शख्स को लगा दिया ब्रेन डेड आदमी का लिवर

केरल के कोच्चि से एक ऐसा मामला सामने आया है जहां एक अस्पताल ने ब्रेन डेड शख्स का लिवर मलेशिया के रहने वाले नागरिक को प्रत्यारोपित कर दिया. इस मामले में अब 8 डॉक्टरों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है.

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ऑर्गेन डोनेशन के 14 साल बाद खुला एक केस (प्रतीकात्मक तस्वीर)
ऑर्गेन डोनेशन के 14 साल बाद खुला एक केस (प्रतीकात्मक तस्वीर)

केरल के कोच्चि स्थित एक अस्पताल और उसके सात डॉक्टरों के खिलाफ ब्रेन डेड व्यक्ति का अंग निकालने का आरोप लगा है. केरल की एक अदालत ने एक शिकायत के मिलने के बाद मामला दर्ज करने का आदेश दिया है. शिकायत में कहा गया है कि अस्पताल ने नियमों का उल्लंघन करते हुए दुर्घटना के शिकार उस व्यक्ति के अंग निकाले लिए थे जिसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया था. यह बात सामने आई कि लिवर को एक मलेशियाई नागरिक को प्रत्यारोपित किया जाना था, और उसकी पत्नी को कथित रूप से डोनर के रूप में दिखाया गया था.

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कोर्ट का आदेश

एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, एर्नाकुलम में न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) की अदालत ने कोल्लम के डॉ एस गणपति की एक याचिका पर एक्शन लिया. कोर्ट ने कहा कि अस्पताल और डॉक्टरों के खिलाफ मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम के तहत प्रथम दृष्टया एक मामला बनता है और इसके लिए पर्याप्त आधार हैं. सात डॉक्टरों के अलावा,अस्पताल के एक डॉक्टर को भी आरोपी के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. कोर्ट ने 29 मई को प्रतिवादियों को समन जारी किया था.

कथित घटना 2009 में हुई थी, जिस व्यक्ति के अंगों का प्रत्यारोपण किया गया था उसका नाम अबिन वीजे था जो 21 साल का था. वह एक दुर्घटना का शिकार हो गया था और कथित तौर पर उसे अस्पताल ने सही ट्रीटमेंट नहीं दिया था. शिकायत में आरोप लगाया गया है कि उनके परिवार को विश्वास दिलाया गया कि वह ब्रेन डेड हैं और उन्हें उसके महत्वपूर्ण अंगों को दान करने के लिए प्रेरित किया गया. शिकायत में यह भी कहा गया है कि अस्पताल ने कानून का उल्लंघन करते हुए एक विदेशी नागरिक को उसके अंगों का प्रत्यारोपण किया.

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बचाई जा सकती थी मरीज की जान

अदालत ने दो सरकारी डॉक्टरों - फोरेंसिक सर्जन पी एस संजय और गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज तिरुवनंतपुरम में न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख थॉमस इयपे से पूछताछ की.  पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर संजय ने क्रेनेयिल केवेटी (cranial cavity) में खून नहीं निकलने पर संदेह जताया. अदालत ने कहा कि डॉ. आईपे ने कहा कि खून निकालने से मरीज की जान बचाई जा सकती थी.

अस्पताल ने कहा कि गलत ब्रेन-डेड सर्टिफिकेट जारी करने के आरोप तथ्यों पर खरे नहीं उतरते हैं. अस्पताल के बयान में कहा गया, 'भले ही 1998 में केरल सरकार द्वारा मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम को अपनाया गया था, लेकिन इस पर कुछ भी रचनात्मक नहीं किया गया है… सोसाइटी फॉर ऑर्गन रिट्रीवल एंड ट्रांसप्लांटेशन (SORT) उस समय कैडेवर डोनेशन को बढ़ावा देने वाली केरल में एकमात्र पंजीकृत संस्था थी. केरल नेटवर्क फॉर ऑर्गन शेयरिंग, जो शव दान का काम करती है, उसे 2012 में गठित किया गया था. अस्पताल ने SORT की मदद मांगी थी और उनकी सलाह के अनुसार कार्रवाई की.' रिलीज ने कहा गया है कि वे जांच में सहयोग करेंगे.

शिकायतकर्ता डॉ गणपति केरल में अंग प्रत्यारोपण पर कड़ी नजर रख रहे हैं. 2015 में, उन्होंने केरल हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें कहा गया था कि "मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने में कदाचार हुआ... " 

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