विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को कच्चातिवु द्वीप से जुड़े कई सवाल का जवाब दिया. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पिछले दिनों विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर प्रसाद द्वारा दिए गए बयान पहले ही इस विषय अपने रुख स्पष्ट कर चुके हैं. जो इस मामले में भारत की स्थिति को स्पष्ट करने में सरकार की सक्रिय भागीदार का रुख देता है.
एमईए प्रवक्ता ने प्रेस वार्ता में गुरुवार को कच्चातिवु द्वीप पर श्रीलंका के रुख और आरटीआई के जवाब में विसंगतियों के बारे में कई सवालों के जवाब में दिए. उन्होंने कहा कि इस विषय पर विदेश मंत्री ने दिल्ली में और गुजरात में भी प्रेस से बात की है. उन्होंने इस विषय को स्पष्ट किया है. मैं कहूंगा कि आप कृपया उनकी प्रेस वार्ताओं पर नजर डालें. आपको अपने उत्तर वहां मिलेंगे.
क्या बोले विदेश मंत्री
प्रधानमंत्री मोदी के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की उदासीनता के कारण 285 एकड़ में फैला द्वीप श्रीलंका के हिस्से में चला गया. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकारों ने द्वीप को तुच्छ करार देते हुए इसके प्रति उदासीन दिखाई.
क्या बोले श्रीलंका के विदेश मंत्री
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीलंका के विदेश मंत्री अली साबरी ने स्थानीय टीवी चैनल Hiru टेलिविजन से बात करते हुए कहा,'यह एक ऐसी समस्या है जिस पर 50 साल पहले चर्चा हुई थी और इसका समाधान किया गया था और इस पर आगे चर्चा करने की कोई जरूरत नहीं है.'
श्रीलंकाई नौसेना करती है कच्चातिवु द्वीप की सुरक्षा
कच्चातिवु द्वीप तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच स्थित है जो बंगाल की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है. 285 एकड़ में फैले इस द्वीप की सुरक्षा श्रीलंकाई नौसेना की एक टुकड़ी करती है. इसमें समुद्री इलाकों के साथ-साथ द्वीप पर स्थित सेंट एंथनी चर्च की रक्षा करना शामिल है.
1974 में श्रीलंका के साथ हुए ऐतिहासिक समुद्री सीमा समझौते के तहत भारत सरकार ने कच्चातिवु श्रीलंका को दिया था. इस समझौते के जरिए श्रीलंका के साथ समुद्री सीमा और अन्य लंबित विवादों को सुलझाने का रास्ता साफ हुआ.
समझौते के बाद 1976 में भी भारत-श्रीलंका के बीच एक समझौता हुआ था जिसके तहत भारत को वाड्ज बैंक और उसके संसाधनों पर अधिकार मिला. भारत सरकार और श्रीलंका के बीच हुए इस समझौते के वक्त दिवंगत इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं.