विधायक रहे कृष्णानंद राय की हत्या से जुड़े गैंगस्टर मामले में मुख्तार अंसारी को 10 साल की सजा हुई है. इसी बीच मुख्तार अंसारी की वजह से अपनी नौकरी गंवाने वाले एसटीएफ के पूर्व डीएसपी रहे शैलेंद्र सिंह ने अपनी इच्छा जाहिर की है. वह चाहते हैं कि मुख्तार अंसारी के उस मामले को दोबारा खोला जाए जिसमें उन्होंने मुख्तार के खिलाफ पोटा कानून लगाया था. सवाल है कि शैलेंद्र ऐसा क्यों चाहते हैं?
इस रहस्य से पर्दा उठना जरूरी
शैलेंद्र सिंह चाहते हैं कि सेना से चुराए लाइट मशीनगन खरीदने के मुख्तार के उस मामले को दोबारा अदालत में खोला जाए ताकि उस रहस्य से भी पर्दा उठ सके कि कैसे सेना से चुराए गए हथियार मुख्तार तक पहुंचते थे. ये कहानी सिर्फ इतनी भर नही हैं कि सेना से लाइट मशीन गन चोरी हुई, इस कहानी में तीन सवाल और उनके जवाब सामने आएंगे.
पहला सवाल, आखिर कैसे, मुख्तार अंसारी पर पोटा की आंच पहुंची थी.
दूसरा सवाल, कैसे तत्कालीन मुलायम सिंह की सरकार ने मुख्तार के खिलाफ पोटा को मंजूरी नहीं दी?
तीसरा सवाल, मुख्तार के दबाव में शैलेंद्र सिंह को अपनी नौकरी क्यों गंवानी पड़ी
दरअसल मुख्तार अंसारी, कृष्णानंद राय की हत्या के मूल मामले से बरी हो चुका है. यह हत्याकांड नवंबर 2005 में हुआ था. इसके पहले मुख्तार ने जनवरी 2004 में ही कृष्णानंद राय को मारने के लिए सेना की एक लाइट मशीन गन को खरीदने की योजना बनाई और इसके लिए उसने 2004 में आर्मी के एक भगोड़े से चुराई गई लाइट मशीन गन खरीदने की डील भी की थी.
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ये कहानी कुछ यूं शुरू होती है...
तत्कालीन एसटीएफ सीओ के तौर पर शैलेंद्र सिंह वाराणसी में तैनात थे. उन्हें मुख्तार अंसारी और कृष्णानंद राय के गैंगवार पर नजर रखने के लिए तैनात किया गया था. इसी तैनाती के दौरान शैलेंद्र सिंह ने जब मुख्तार के फोन को टेप करना शुरू किया तो एक खतरनाक कहानी सामने आई. शैलेंद्र सिंह ने वह ऑडियो रिकॉर्ड किया जिसमें मुख्तार अंसारी सेना के एक भगोड़े से लाइट मशीन गन खरीदने का डील कर रहा था.
मुख्तार अंसारी के फोन हो रहे थे रिकॉर्ड
एसटीएफ तब मुख्तार अंसारी के फोन को रिकॉर्ड कर रही थी. मुख्तार और सेना के इस भगोड़े की बातचीत का टेप आज भी अदालत की कार्यवाही में मौजूद है. यह टेप अपने आप में इतना विस्फोटक था कि उस लाइट मशीन गन की बरामदगी के बाद शैलेंद्र सिंह ने मुख्तार अंसारी पर पोटा कानून लगा दिया और यहीं से मुलायम सरकार की नजरें डीएसपी शैलेंद्र सिंह पर टेढ़ी हो गई और अंततः शैलेंद्र को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी.
शैलेंद्र सिंह ने सीएम योगी से की थी केस री-ओपेन की बात
बकौल शैलेंद्र सिंह 'लखनऊ में 2004 में मुख्तार और कृष्णानंद राय के बीच गैंगवार हुई थी. आपस में गोलियां चलीं और तब एसटीएफ को इन पर नजर रखने के लिए जिम्मेदारी दी गई थी. यह दोनों पूर्वांचल से आते थे दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे और मैं भी पूर्वांचल चंदौली का रहने वाला हूं. ऐसे में मुझे मुख्तार और कृष्णानंद राय दोनों पर निगरानी की जिम्मेदारी थी ताकि कोई खूनी गैंगवार न हो जाए.'
फोन टेप होने से हुआ था खुलासा
शैलेंद्र कहते हैं कि, इसी निगरानी के क्रम में जब मैं मुख्तार अंसारी का फोन सुन रहा था तब यह सेना के भगोड़े बाबूलाल यादव से एलएमजी खरीदने की बात कर रहा था, बाबूलाल कह रहा था कि मेरे पास सेना से चुराई हुई लाइट मशीन गन है जो कि राष्ट्रीय राइफल से चुराई गई थी और उससे लेकर आया हूं और यह सौदा लगभग एक करोड़ में तय हो गया था.
इसलिए रची जा रही थी खौफनाक साजिश
जब मुख्तार अंसारी अपने लोगों से बात कर रहा था और वह फोन भी रिकॉर्ड हो रहा था तब उसने कहा था कि उसे हर हाल में यह लाइट मशीन गन चाहिए और उसकी वजह भी वह बताता था कि कृष्णानंद राय की गाड़ी बुलेट प्रूफ है और उस पर इसके राइफल का कोई असर नहीं होगा और अगर लाइट मशीन गन उससे मिल जाए तो वह उसकी बुलेट प्रूफ घर गाड़ी को भेद सकती है और उसे मारा जा सकता है.
मुख्तार तक पहुंचने से पहले बरामद करनी थी LMG
खास बात यह है कि इस पूरे ऑपरेशन की जिम्मेदारी खुद आरके विश्वकर्मा ने दी थी, जो कि तब बनारस में एसटीएफ के एसपी थे और आज राज्य के डीजीपी है. उन्होंने ही शैलेंद्र को यह जिम्मेदारी दी थी कि हर हाल में इस लाइट मशीन गन को मुख्तार के पास पहुंचने से पहले बरामद करना है, क्योंकि अगर यह मुख्तार के पास पहुंच गई तो फिर इसे बरामद करना असंभव हो जाएगा.
24 घंटे में बरामद करनी थी लाइट मशीन गन
यह लाइट मशीन गन 24 घंटे के अंदर बरामद करनी थी. क्योंकि मुख्तार से बाबूराम यादव की डील हो चुकी थी. पुलिस को मालूम था कि अगर यह एक बार मुख्तार के मोहम्मदाबाद स्थित घर के भीतर चली गई तो फिर किसी भी कीमत पर पुलिस उसे बरामद नहीं कर पाएगी. शैलेंद्र बताते हैं कि 'तत्काल हम लोगों ने ऑपरेशन लांच किया. हमने बाबू लाल यादव को उठाया तो पता ये चला कि उसने अपने मामा जो कि मुख्तार का पुराना साथी रह चुका था उसके पास एलएमजी छुपा कर रखी है. जान पर खेलकर हम लोगों ने इसे बरामद किया.
शैलेंद्र बताते हैं कि
"मुख्तार अंसारी हर हाल में कृष्णानंद राय को मार देना चाहता था और उसे लग रहा था कि कृष्णानंद राय की बुलेट प्रूफ गाड़ी सबसे बड़ी अड़चन है. एके-47 या उसके राइफल अचूक नहीं थे. ऐसे में अपने लोगों से बातचीत में उसने हर हाल में इस लाइट मशीन गन को लेने की बात कही थी और वह लगभग इसे ले चुका था.'
फाइनली जब मैंने इसे रिकवर किया तो वादी के रूप में बनारस के चौबेपुर थाने में मैंने यह मामला दर्ज कराया. संबंधित धाराओं में यह मामला दर्ज हुआ, लेकिन मामला सेंसेटिव था. सेना से चुराई लाइट मशीन गन थी, कश्मीर से लाई गई थी और मुख्तार के हाथों में पहुंचने वाली थी, इसलिए हमने आर्म्स एक्ट के साथ-साथ इसमें पोटा भी लगाया और यहीं से पूरा मामला बिगड़ गया. मुख्तार अंसारी को लग चुका था कि पोटा लगने से उसकी मुसीबत काफी बढ़ जाएगी और वह इससे निकल नहीं पाएगा.
सियासत कैसे बनी सहयोगी?
दरअसल तब की सियासत इसके मुफ़ीद थी. मायावती की सरकार तोड़कर मुलायम सिंह यादव ने सरकार बनाई थी. तब मुख्तार अंसारी कई इंडिपेंडेंट विधायकों के साथ सरकार को समर्थन दे रहा था और यहीं उसने मुलायम सिंह यादव पर दबाव बनाया. मुलायम सिंह यादव कतई नहीं चाहते थे कि मुख्तार पर पोटा लगे, इस मामले में एक साथ दर्जनों ट्रांसफर मुलायम सिंह यादव ने कर दिए.
बंद कर दी गई बनारस की STF यूनिट
यहां तक कि बनारस की एसटीएफ यूनिट को भी बंद कर दिया और यह मैसेज साफ हो गया कि इसमें बीच का रास्ता कुछ नहीं है. मुख्तार को हर हाल में पोटा से बाहर निकालना है, दूसरी तरफ मेरे ऊपर भी दबाव था. वो एफआईआर बदलना चाहते थे. मैंने f.i.r. बदलने से मना कर दिया. लोगों ने कहा कि आप इन्वेस्टिगेशन में नाम मत लेना उनका, लेकिन सब कुछ जुटाया हुआ साक्ष्य मेरा ही थ तो मैं अड़ा रहा और मैंने पीछे हटने से मना कर दिया. जिसकी कीमत मैंने अपनी नौकरी देकर चुकाई.
जब सब तरफ से समझाने की कोशिश भी बेकार हो गई और मैंने भी फैसला कर लिया कि मैं इस मुद्दे पर पीछे नहीं हटूंगा. तब मैंने भी त्याग पत्र लिखा और त्यागपत्र में मैंने साफ लिखा कि जब सरकार का फैसला मुख्तार अंसारी कर रहा हो तो यहां मेरे लिए यहां काम करना मुश्किल है.