मुंबई की मजिस्ट्रेट अदालत ने आईएनएस विक्रांत से संबंधित एक मामले में बीजेपी नेता किरीट सोमैया के खिलाफ दायर एफआईआर को खत्म करने के लिए इकोनॉमिक ऑफेंस विंग द्वारा दायर क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने आगे की जांच का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि फंड कलेक्शन से संबंधित कई पहलुओं को रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया है.
बीजेपी नेता के खिलाफ दोबारा जांच का आदेश देते हुए मजिस्ट्रेट एसपी शिंदे ने कहा, "जांच अधिकारी ने अन्य स्थानों से आए उन गवाहों के बयान दर्ज करने में थोड़ी भी तकलीफ नहीं उठाई, जिन्होंने कथित तौर पर (फंडरेजिंग) अभियान में योगदान दिया था." सोमैया के खिलाफ शिकायत सिपाही बबन भीमराव भोसले नाम के एक पूर्व सैनिक ने दर्ज कराई थी.
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अभियान के तहत 57 करोड़ उगाही का दावा
पूर्व सैनिक भोसले ने आरोप लगाया कि सोमैया और उनके बेटे नील ने 2013-2014 के बीच फंडरेजिंग अभियान चलाया था, जिसमें उन्होंने "विक्रांत बचाओ" पहल के तहत लगभग 57 करोड़ रुपये जुटाने का दावा किया. इस अभियान के तहत भोसले ने 2000 रुपये का योगदान दिया था. उन्होंने आरोप लगाया कि सोमैता पिता-पुत्र ने उस फंड को संबंधित ऑफिस में जमा नहीं कराया था. इसके लिए उन्होंने आरटीआई से हासिल एक रिपोर्ट का हवाला दिया था.
पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट में क्या दावा किया?
भोसले ने दावा किया था कि किरीट सोमैया ने चर्चगेट, भांडुप, मुलुंड, बांद्रा, अंधेरी और मुंबई के अन्य इलाके से 57 करोड़ रुपये की उगाही की थी. इस मामले की जांच पुलिस इंस्पेक्टर विनय घोरपड़े ने की, जिन्होंने कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दायर किया और अदालत से मांग की कि मामले को बंद कर दिया जाना चाहिए. उन्होंने कोर्ट में दावा किया कि एफआईआर गलतफहमी में दर्ज की गई थी. इंस्पेक्टर ने दावा किया कि चर्चगेट से ही फंड जुटाए गए और अन्य जगहों से सिर्फ 10 हजार रुपये की उगाही की गई.
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गवाहों के बयानों ने पुष्टि की कि धन उगाहने वाले अभियानों के दौरान योगदान दिया गया था, लेकिन किसी भी गवाह को इस बात की जानकारी नहीं थी कि इकट्ठा किए गए धन का क्या हुआ. मजिस्ट्रेट ने चर्चगेट क्षेत्र से परे गवाहों के खातों को दस्तावेज करने में विफल रहने के लिए जांच अधिकारी को फटकार लगाई.