देश में हर दिन साइबर अपराध की घटनाएं सामने आती हैं. लेकिन अब इससे जुड़ा एक हैरान करने वाला आंकड़ा भी सामने आया है. दरअसल, 2020-2022 के बीच सभी 28 राज्यों में रजिस्टर्ड कुल 1.67 लाख मामलों में से केवल 2,706 लोगों (1.6%) को इन अपराधों के तहत सजा दी गई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में 2020 से 2022 के बीच साइबर अपराध से जुड़े सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए.
हालांकि, इन राज्यों में भी साइबर अपराधों के रजिस्टर्ड मामलों के मुकाबले सजा की दर 2 प्रतिशत से कम है. द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में सभी राज्यों में कुल 49,708 साइबर अपराध के मामले पंजीकृत हुए, जिसमें केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल नहीं किया गया. इनमें से केवल 1,109 व्यक्तियों यानी कि केवल 2 फीसदी लोगों को ही सजा दी गई.
यूपी में साइबर अपराध के सबसे ज्यादा मामले
2020 में उत्तर प्रदेश में साइबर अपराध से जुड़े कुल 11,000 मामलों को रजिस्टर किया गया. लेकिन केवल 642 व्यक्तियों को सजा दी गई. कर्नाटक में धोखाधड़ी के 10,741 मामलों को दर्ज किया गया. लेकिन केवल दो व्यक्तियों को ही सजा मिली. महाराष्ट्र ने 2020 में 5,496 साइबर अपराध के मामलों के साथ तीसरा स्थान हासिल किया, लेकिन केवल तीन व्यक्तियों को सजा दी गई.
2021 में, सभी राज्यों में कुल 52,430 मामले पंजीकृत हुए, जिनमें से केवल 490 व्यक्तियों को सजा दी गई. यानी कि 0.93 प्रतिशत लोगों को ही सजा मिली. इसमें तेलंगाना ने साइबर अपराध के 10,300 मामलों के साथ सबसे अधिक मामले दर्ज किए. इनमें से केवल 19 व्यक्तियों को सजा दी गई. उत्तर प्रदेश ने 8,829 मामले पंजीकृत किए, लेकिन केवल 292 व्यक्तियों को सजा दी गई. कर्नाटक तीसरे स्थान पर था, जहां 8,136 मामले पंजीकृत हुए, लेकिन केवल 10 व्यक्तियों को सजा मिली.
2022 का ऐसा रहा हाल
2022 में, सभी राज्यों में कुल 64,907 साइबर अपराधों के मामले पंजीकृत हुए, जिनमें से केवल 1,107 व्यक्तियों को सजा दी गई. यानी कि केवल 1.7 प्रतिशत लोगों को ही सजा मिली. इसमें तेलंगाना ने 15,297 साइबर अपराधों के मामलों के साथ सबसे अधिक मामले पंजीकृत किए, जिनमें से केवल 60 व्यक्तियों को सजा दी गई. कर्नाटक ने 12,556 मामलों के साथ दूसरा स्थान प्राप्त किया, जिनमें से केवल 12 को सजा मिली. उत्तर प्रदेश तीसरे स्थान पर था, जहां 10,117 साइबर अपराधों के मामले पंजीकृत हुए और 838 व्यक्तियों को सजा दी गई.
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बता दें कि इन दिनों डिजिटल अरेस्ट के जरिए साइबर ठगी को अंजाम दिया जा रहा है. गृह मंत्रालय ने साइबर अपराधों से निपटने के लिए भारतीय साइबर क्राइम समन्वय केंद्र (I4C) की स्थापना की है.
क्या है डिजिटल अरेस्ट स्कैम
डिजिटल अरेस्ट स्कैम में, आमतौर पर, ठग पुलिस अधिकारियों या कस्टम अधिकारी होने का दावा करते हैं. एक बार जब ऑडियो कॉल वीडियो में बदल जाती है, तो पीड़ितों को अक्सर एक पुलिस स्टेशन जैसा सेटअप दिखाया जाता है, जिसे उन्हें यह विश्वास दिलाने के लिए डिजाइन किया जाता है कि वे वैध अधिकारी के साथ बात कर रहे हैं.
पीड़ित पर अवैध गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया जाता है, एक दावा जिसका इस्तेमाल घोटालेबाज यह झूठा दावा करने के लिए करते हैं कि शख्स को अरेस्ट कर लिया गया है. वे डिजिटल अरेस्ट के अपने दावों का समर्थन करने के लिए गढ़े हुए दस्तावेज भी पेश करते हैं.