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तीन नए कृषि कानूनों के विरोध की गूंज सबसे ज्यादा पंजाब और हरियाणा में सुनी जा रही है. पंजाब में बीजेपी को छोड़ कर लगभग सभी राजनीतिक दल खुद को इस मुद्दे पर विरोध करने वाले किसानों के साथ खड़ा बता रहे हैं. केंद्र सरकार हाल ही में वजूद में आए तीन नए कृषि कानूनों को भले ही किसानों के लिए फायदेमंद बता रही हो लेकिन इनमें से एक कानून को राज्य सरकार अपने राजस्व पर कुंडली मारने वाला बता रही हैं.
दरअसल फार्मर्स प्रोड्यूस, ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) कानून में कमीशन और मार्किट फीस वसूलने का प्रावधान नही है. अगर किसान अपनी फसल प्राइवेट मंडियों में बेचते हैं तो राज्य सरकारों को अपनी आमदनी के एक बहुत बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ेगा. यही कारण है कि पंजाब जैसे गैर बीजेपी शासित राज्य इस कानून के हक में नहीं है.
दरअसल पंजाब और हरियाणा केंद्रीय पूल में सबसे ज्यादा अनाज का योगदान देते हैं. इसका मतलब है कि अब तक केंद्रीय एजेंसियों की ओर से सबसे अधिक अनाज की खरीद इन्हीं दो राज्यों से होती रही हैं. बम्पर उत्पादन की वजह से इन दोनों राज्यों को ‘अनाज का कटोरा’ भी कहा जाता है. ऐसे में इन दोनों राज्यों को अनाज मंडियों से अच्छा खासा राजस्व मिलता रहा है.
पंजाब गेहूं और धान की प्रति क्विंटल फसल पर सबसे ज्यादा 8.5 फ़ीसदी मार्किट फीस और दूसरे शुल्क वसूलता है. इसमें तीन फ़ीसदी मार्केट फीस, 2.5 फ़ीसदी कमीशन और तीन फ़ीसदी ग्रामीण विकास फीस शामिल है.
मार्केट फीस से होने वाली कमाई में हरियाणा का दूसरा स्थान है. राज्य सरकार प्रति क्विंटल फसल पर 6.5 फ़ीसदी फीस और दूसरे शुल्क वसूलती है. इसमें दो फ़ीसदी ग्रामीण विकास फीस, 2.5 फ़ीसदी कमीशन और दो फ़ीसदी मार्केट फीस शामिल है.
पंजाब को सालाना 3,500 करोड़ रुपये के नुकसान का अंदेशा
नए कृषि कानून के लागू होने से पंजाब को सालाना 3,500 करोड़ रुपए और हरियाणा को मौजूदा खरीफ सीजन में ही 730 करोड़ का नुकसान होने का अंदेशा है.
एक तरफ पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नए कृषि कानून के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात कही है वहीं हरियाणा की सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने केंद्र सरकार को साफ-साफ बता दिया है कि राज्य में मौजूदा खरीफ सीजन में 730 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है.
हरियाणा सरकार ने इस आकलन की सूचना केंद्र सरकार को भेज दी है वही राजस्व घाटे की पूर्ति के लिए वित्तीय सहायता का मामला भी उठाया है. हालांकि हरियाणा के कृषि मंत्री जयप्रकाश दलाल ने नए कानूनों पर केंद्र का बचाव करते हुए कहा कि इनका मकसद किसानों की आमदनी बढ़ाना है. दलाल ने कहा कि अगर नए कानून के लागू होने से राज्य सरकार के राजस्व में कमी आती है तो राजस्व बढ़ाने के दूसरे विकल्प ढूंढे जाएंगे.
केंद्र सरकार की ओर से लाए नए कृषि कानूनों के पक्ष में बोलना भले ही बीजेपी नेताओं की राजनीतिक मजबूरी हो लेकिन सच तो यह है कि हरियाणा की बीजेपी सरकार भी अप्रत्यक्ष तौर पर नए कानून को लागू करने से आशंकित है.
राज्य सरकारों के सामने क्या हैं चुनौतियां?
राज्यों में सरकारें विपक्षी पार्टियों की हो या फिर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की. सबके सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं. एक नए कृषि कानून के लागू होने से कम होने वाले राजस्व घाटे को रोकना और दूसरे किसानों को परंपरागत दाना मंडियों से बांधे रखना.
पंजाब और हरियाणा सरकारों ने तो इस ओर अपने प्रयास भी तेज कर दिए हैं. दोनों सरकारों ने मार्केट फीस और ग्रामीण विकास फीस कम करके किसानों को परंपरागत मंडियों से बांधे रखने का प्रयास किया है.
हरियाणा सरकार ने मार्केट फीस और ग्रामीण विकास फीस एक फ़ीसदी तक कम कर दी है. यानी सरकार अब 6.5 फ़ीसदी के बजाय 5.5 फ़ीसदी फीस वसूलेगी.
पड़ोसी राज्य पंजाब की कांग्रेस सरकार ने भी मार्केट फीस घटाने के संकेत दिए हैं. कैप्टन सरकार ने पहले से ही चावल मिल मालिकों को राहत देते हुए एक फ़ीसदी मार्केट फीस कम वसूलने का फैसला किया है, साथ ही उनकी संपत्तियों को मार्केट यार्ड घोषित कर दिया है. हालांकि खाली खजाने से जूझ रहे पंजाब के लिए यह फैसले भविष्य में नुकसानदेह साबित हो सकते हैं.
यही नहीं पंजाब सरकार केंद्र सरकार के नए कृषि कानून को राज्य में लागू न करने के लिए समूचे राज्य को प्रिंसिपल मार्केट यार्ड भी घोषित कर सकती है. कांग्रेस शासित राजस्थान की सरकार पहले से ही भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों को राज्य की मंडी के रूप में परिभाषित कर चुकी है.
किसानों को केंद्र के आश्वासन पर भरोसा नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को भले ही जोर देकर कहा हो कि कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन राजनीति से प्रेरित हैं और किसानों को पहले की तरह ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की सुविधा मिलती रहेगी, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि आंदोलनकारी किसान सिर्फ आश्वासन से ही संतुष्ट होते नहीं दिख रहे.
इन किसानों का कहना है कि केंद्र सरकार MSP को लेकर लिखित तौर पर भरोसा दे तो वह आंदोलन वापस लेने पर सहमत हो सकते हैं. ज्यादातर किसान धान के लिए प्रति क्विंटल बढ़ाए गए 53 रुपये एमएसपी को भी नाकाफी मानते हैं.
किसानों का मानना है कि MSP कुल लागत के हिसाब से तय की जानी चाहिए. उनका कहना है कि कोरोना महामारी फैलने के बाद एक तरफ जहां खेत मजदूरों की व्यापक कमी है वहीं डीजल की कीमतें भी आसमान छू रही है. इससे ट्रैक्टर जैसे कृषि उपकरण चलाना मुश्किल हो गया है.
केंद्र के नए कृषि कानूनों को लेकर छिड़ा हुआ विवाद कहां तक जाएगा फिलहाल कहना संभव नहीं है, क्योंकि विपक्षी पार्टियों और किसान संगठन इन कानूनों को वापस लेने पर अड़े हुए हैं.