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ओडिशा ट्रेन हादसा: 'कुछ रोते हैं, कुछ हंसते हैं, कहीं चुप्पी, कहीं चीख-पुकार...' डिसऑर्डर के शिकार हो रहे घायल

ओडिशा ट्रेन हादसे में जीवित बचे लोगों में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर देखने को मिल रहा है. इन मरीजों का डॉक्टर इलाज कर रहे हैं और विशेषज्ञों की टीम काउंसिलिंग करने में जुटी है. डॉक्टर्स का कहना है कि हादसे में घायल हुए लोगों में कोई घबरा रहा है. कोई साधे चुप्पी रहता है. किसी के सपने में भयावह मंजर आ रहा है.

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अमेरिका में रहने वाले मनोचिकित्सक रंजन घोष ने कोलकाता में ट्रिपल-ट्रेन हादसे में बचे सानू दास से बात की. (फोटो- पीटीआई)
अमेरिका में रहने वाले मनोचिकित्सक रंजन घोष ने कोलकाता में ट्रिपल-ट्रेन हादसे में बचे सानू दास से बात की. (फोटो- पीटीआई)

ओडिशा के बालासोर में ट्रिपल ट्रेन हादसे की भयावह कहानियां सामने आ रही हैं. इस दर्दनाक हादसे में जो लोग बच गए हैं या घायल हुए हैं, वो तेजी से रिकवर कर रहे हैं. लेकिन कटक के SCB मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में भर्ती 105 मरीजों में से करीब 40 में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) देखा जा रहा है. इन सभी मरीजों की काउंसिलिंग शुरू कर दी गई है. परिजनों की मौजूदगी में विशेषज्ञ मरीजों के डर को दूर भगा रहे हैं. शनिवार को डॉक्टरों ने इस बारे में जानकारी दी है.

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बता दें कि ट्रिपल ट्रेन हादसे में 288 यात्रियों की जान गई है. जबकि 1100 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं. क्लीनिकल साइकोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जशोबंता महापात्र ने कहा, हादसे में बचे लोगों की मानसिक स्थिति को देखते हुए अस्पताल ने सभी मरीजों की काउंसिलिंग शुरू कर दी है. डॉ. महापात्रा ने बताया कि इस तरह की दुर्घटना की वजह से जिंदा बचे लोगों के दिमाग पर गंभीर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है.

'परिजन के साथ मरीजों की काउंसिलिंग'

उन्होंने कहा, कई गंभीर रूप से तनावग्रस्त, भयभीत, कभी-कभी घबराए हुए देखे जा रहे हैं. कुछ घायलों को एकदम चुप पाया जा रहा है. हम उनकी काउंसलिंग कर रहे हैं और उनके परिवार के सदस्यों के साथ बात कर रहे हैं. डॉ महापात्रा ने कहा कि अस्पताल ने बचे लोगों की काउंसलिंग के लिए चार टीमों का गठन किया है.

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कोरोमंडल एक्सप्रेस में घायल मरीजों का इलाज किया जा रहा है. डॉक्टर्स की टीम काउंसिलिंग भी कर रही है. तस्वीर चेन्नई की है. (फोटो- पीटीआई)

'सपना आने से टूट जाती है नींद'

उन्होंने कहा, प्रत्येक टीम में एक मनोचिकित्सक, एक मनोवैज्ञानिक, एक सामाजिक कार्यकर्ता और मरीज के परिवार के एक या दो सदस्य शामिल हैं. सर्जरी विभाग की एक नर्स ने बताया कि जो लोग जिंदा बचे हैं, वो ठीक से नींद नहीं ले पा रहे हैं. इन लोगों की आंखों के सामने आज भी भयावह मंजर आ जाता है. दुर्घटना का सपना आने से नींद टूट जाती है. उन्होंने कहा कि सभी मरीजों की लगातार निगरानी की जा रही है.

'नहीं आती है नींद, सपने में आता है हादसा'

हादसे में एक 23 वर्षीय मरीज के दोनों हाथ और पैर टूट गए हैं. वो दिन या रात में सो नहीं पाता है. उसकी आंखों के सामने बार-बार हादसे का मंजर आ जाता है. एक डॉक्टर ने बताया कि यह मरीज अपनी आंखें बंद करने से डरता है क्योंकि दुर्घटना के दृश्य उसके सामने आते हैं.

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'नींद में पुकारता है दोस्त का नाम'

एक अन्य युवक भी भर्ती है. उसने अपने करीबी दोस्त को खो दिया है. वो अक्सर नींद में अपने दोस्त का नाम पुकारता है और नींद से जाग जाता है. एक अन्य डॉक्टर ने बताया कि कुछ मरीज बस दीवार को घूर रहे हैं. गुमसुम की तरह व्यवहार करते हैं.

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'अस्पताल में 105 मरीजों का इलाज'

अस्पताल में 105 मरीजों का इलाज करवा रहे हैं. इनमें से तीन के पैर पूरी तरह से अलग हो गए हैं. जबकि अन्य मरीजों ने पैर और अंग खो दिए हैं. कुछ की रीढ़ की हड्डी में चोट लगी है.

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'कुछ रोते हैं... कुछ जोर से हंसते हैं'

एक अन्य डॉक्टर ने बताया कि ये मरीज अपनी स्थिति देखकर रोते हैं. जबकि कुछ अन्य जोर-जोर से हंसते हैं. उन्होंने कहा कि इन लक्षणों को समय के साथ ठीक किया जा सकता है. डॉ. महापात्रा ने दावा किया कि सभी मरीजों की हालत स्थिर है. उम्मीद है कि प्रत्येक मरीज मानसिक तनाव से उबर जाएगा. कुछ अन्य संवेदनशील मरीजों को दूसरों की तुलना में कुछ ज्यादा समय लग सकता है.

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क्या होता है पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर 

PTSD एक ऐसी मानसिक स्थिति होती है जो आमतौर पर दुर्घटना या बेहद बुरी स्थिति का सामना करने के बाद मरीजों में देखने को मिलती है. इस डिसऑर्डर के लक्षणों में फ्लैशबैक, घटना से जुड़े सपने आना, हाई ऐंग्जाइटी लेवल और घटना के बारे में लगातार विचार करना शामिल हैं, जिससे सामान्य रूप से जीवन जीना मुश्किल हो जाता है. कई स्थितियों में मरीज खुद को नुकसान पहुंचाने की भी कोशिश करता है ताकि वो हादसे या उससे जुड़ी यादों से छुटकारा पा सके.

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दरअसल, मरीज को घटना से जुड़ी किसी भी स्थिति या चीज से डर लगने लगता है. कुछ केस में मरीज ना चाहते हुए भी दिमाग में हादसे को फिर से अनुभव करता है जो उसके ट्रॉमा को बढ़ा देता है. यह मरीज को हकीकत से दूर ले जाता है.

 

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