वन नेशन वन इलेक्शन बिल को लोकसभा में स्वीकार कर लिया गया है. अब इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया गया है.जेपीसी की सिफारिशें मिलने के बाद अब नरेंद्र मोदी सरकार की अगली चुनौती इसे संसद से पास कराने की होगी.
चूंकि वन नेशन वन इलेक्शन से जुड़ा बिल संविधान संशोधन विधेयक है इसलिए लोकसभा और राज्यसभा में इस बिल को पास कराने के लिए विशेष बहमत की आवश्यकता होगी.
अनुच्छेद 368 (2) के तहत संविधान संशोधनों के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है. इसका अर्थ है कि प्रत्येक सदन में यानी कि लोकसभा और राज्यसभा में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत द्वारा इस विधेयक को मंजूरी देनी होगी.
वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा इस मुद्दे को स्पष्ट करते हुए कहते हैं, "इस विधेयक को दोनों सदनों के सामने प्रस्तुत किया जाना होगा, और दो-तिहाई सदस्यों को मतदान करना होगा ताकि यह पारित हो सके." पूर्व लोकसभा सचिव पी.डी.टी. अचार्य भी इस बात से सहमत हैं. उन्होंने कहा कि एक संविधान संशोधन बिल होने के नाते इस बिल को इस संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा करना होगा.
लोकसभा और राज्यसभा में इस बिल को पास कराना ही सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.
लोकसभा का नंबरगेम इस तरह है
दरअसल लोकसभा में एनडीए के पास दो तिहाई बहुमत नहीं है. हां एनडीए के पास सामान्य बहुमत जरूर है. लोकसभा में अगर सभी 543 सांसद इस बिल पर वोटिंग में शामिल होंगे, तो बिल पास कराने के लिए सरकार को 362 वोट चाहिए होंगे. इस वक्त बीजेपी लोकसभा में बीजेपी के 240 सांसद हैं. अगर NDA का आंकड़ा देखें तो यहां इनकी सांसदों की संख्या 293 है.
इस तरह से लोकसभा में नरेंद्र मोदी सरकार को 69 सांसदों की कमी पड़ती दिख रही है.
इस वक्त बीजेपी सरकार के लिए राहत की बात ये है कि गैर INDIA ब्लॉक की कुछ पार्टियों ने वन नेशन वन इलेक्शन बिल के लिए समर्थन जताया है. इनमें जगन मोहन की पार्टी YSRCP, नवीन पटनायक की BJD और मायावती की BSP शामिल है. YSRCP के लोकसभा में 4 सांसद हैं जबकि BJD और BSP के लोकसभा में कोई सांसद नहीं हैं.
के चंद्रशेखर राव की पार्टी भारत राष्ट्र समिति ने इस बिल पर अभी कोई स्पष्ट राय नहीं दी है और वेट एंड वाच की मु्द्रा में है. नवीन पटनायक की पार्टी BJD ने कहा है कि वे बिल की कॉपीज देखने के बाद औपचारिक प्रतिक्रिया देंगे.
अगर INDIA ब्लॉक अपने कुनबे को छिटकने से बचाने में सफल रही तो वन नेशन वन इलेक्शन बिल को लोकसभा से पास कराने में नरेंद्र मोदी सरकार को इस बिल को लेकर काफी चुनौतियां मिलने वाली हैं.
राज्यसभा का नंबरगेम
वन नेशन वन इलेक्शन बिल को राज्यसभा में पास कराने के लिए 164 वोटों की जरूरत होगी. राज्यसभा में इस वक्त 245 में से 112 सीटें एनडीए के साथ है. इसमें 6 मनोनीत सांसद भी शामिल हैं.
यानी कि उच्च सदन में भी सरकार के पास बिल को पास कराने के लिए जरूरी संख्याबल नहीं है. राज्यसभा में एनडीए के पास 52 वोटों की कमी पड़ रही है. अगर NDA जगनमोहन की YSRCP का साथ लेने में सफल होती है तो इन्हें YSRCP के 11 और और सांसदों का समर्थन हासिल हो जाएगा.
लोकसभा में भले ही BJD के एक भी सांसद न हो लेकिन राज्यसभा में पार्टी के 7 सांसद है. अगर बीजेपी, बीजेडी का समर्थन राज्यसभा में हासिल करने में सफल रहती है तो NDA को 7 और सांसदों का समर्थन हासिल हो जाएगा.
के चंद्रशेखर राव की BRS के भी राज्यसभा में 4 सांसद हैं.
इसके अलावा राज्यसभा में BSP के 1 सांसद, AIADMK के 3 सांसद हैं. इनके अलावा पूर्वोत्तर के कुछ सांसद भी राज्यसभा में हैं जो सरकार के साथ आ सकते हैं. AIADMK ने अपना रुख अभी स्पष्ट नहीं किया है.
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इस समर्थन के बावजूद NDA बहुमत के लिए जरूरी 164 सांसदों के आंकड़े तक नहीं पहुंच पा रही है.
क्या राज्य विधानसभाओं से बिल को पास कराना होगा जरूरी?
लोकसभा-राज्यसभा से पास कराने के बाद इस बिल को देश की आधी से अधिक विधानसभाओं में पास कराना होगा. हालांकि इस मुद्दे पर कानून के जानकारों की राय अलग अलग है.
अनुच्छेद 368(2) के दूसरे प्रावधान के तहत, कुछ संशोधनों को विशेष रूप से राज्यों के कम से कम आधे विधानसभाओं द्वारा अनुमोदित करना होता है, विशेष रूप से उन संशोधनों के लिए जो संघीय संरचना, संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व या सातवीं अनुसूची के प्रावधानों को प्रभावित करते हैं.
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी का तर्क है कि राज्य अनुमोदन आवश्यक है, वे कहते हैं, "जब राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल बदले जा रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर राज्य स्वायत्तता, चुनाव और शासन को प्रभावित करता है"
इसी तरह, वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष का भी यही मत है कि यदि राज्य विधानसभाओं के अधिकारों को सीमित किया जाता है, तो इसके लिए राज्य विधानसभाओं के बहुमत द्वारा अनुमोदन आवश्यक होगा.
दूसरी ओर कानूनविद सिद्धार्थ लूथरा एक विरोधाभासी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, वे तर्क देते हुए कहते हैं कि अनुमोदन की आवश्यकता नहीं हो सकती है क्योंकि विधेयक सातवीं अनुसूची में विधायी प्रविष्टियों को संशोधित नहीं करता है. हालांकि, वे स्वीकार करते हैं कि संघीयवाद और मूल संरचना सिद्धांत के आधार पर संभावित चुनौती हो सकती है, वे कहते हैं, "व्यापक परामर्श हमेशा आवश्यक होते हैं".
हालांकि इस मोर्चे पर बीजेपी की चुनौती तुलनात्मक रूप से आसान है. महाराष्ट्र में जीत के बाद इस वक्त 14 राज्यों में बीजेपी की सरकार है. जबकि NDA शासित राज्यों का आकड़ा 20 है. इस लिहाज से बीजेपी को इस बिल को राज्य विधानसभाओं में पास कराने में खास दिक्कत नहीं होगी. हां इतना जरूर है कि बीजेपी को अपने सहयोगियों को फिर से विश्वास में लेना होगा.
वन नेशन, वन इलेक्शन बिल का विरोध करने वाली पार्टियों के पास लोकसभा में 205 और राज्यसभा में 85 सीटें हैं. कुल मिलाकर, सरकार को इस बिल को पास कराने के लिए विपक्ष की सहमति हासिल करनी पड़ेगी. हालांकि इस बिल पर विपक्ष के तेवर ऐसे लगते नहीं हैं.