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RAW एजेंट्स ने एक बाल से खोजा था पाकिस्तान का न्यूक्लियर प्लांट, जानें क्या था ऑपरेशन कहुटा

साल 1974 में भारत के पोखरण परमाणु परीक्षण ने दुनिया को हैरान कर दिया था. उस समय पाकिस्तान ने चोरी- चोरी परमाणु हथियार बनाना शुरू कर दिया था. इसके चलते भारतीय खुफिया एजेंसी RAW का पूरा ध्यान पाकिस्तान पर था और पाक के परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए शुरू किया गया ओपरेशन कहूटा.

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किसी देश की सुरक्षा में उसकी खुफिया एजेंसी का सबसे अहम रोल होता है. इन एजेंसियों के काम करने एक-एक अंदाज और रणनीति हैरत में डाल देती है. इसी तरह भारत की खुफिया एजेंसी है RAW. हालांकि सबसे पहले आजादी के बाद, भारत के पास इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के रूप में एक अच्छी खुफिया संस्था थी. साल 1968 तक आईबी ही भारत के आंतरिक और बाहरी खुफिया ऑपरेशन करती थी, लेकिन इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सोचा कि हमारे लिए अपनी विदेशी खुफिया एजेंसी का होना बहुत जरूरी है. ऐसे में 1968 में भारत के जाने माने जासूस रामेश्वर नाथ काव ने खुफिया एजेंसी RAW- Research and Analysis Wing  की स्थापना की.

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जब 1974 में भारत के पोखरण परमाणु परीक्षण ने दुनिया को हैरान कर दिया तो भारत और पाकिस्तान के बीच हथियारों को लेकर होड़ शुरू हो गई. भारत की बढ़ती परमाणु क्षमताओं से बहुत सावधान रहते हुए, पाकिस्तान ने भी अपने लिए परमाणु हथियार बनाने की तैयारी शुरू कर दी थी और चीन उसका रणनीतिक सहयोगी था. इसलिए रॉ का पहला फोकस पाकिस्तान और दूसरा चीन था. 
 
रॉ ने शुरू किया ऑपरेशन कहुटा 

1977 में रॉ द्वारा लॉन्च किए गए इस मिशन का मोटिव पाकिस्तान के सीक्रेट वीपन प्रोग्राम का पता लगाना और उसकी पुष्टि करना था. कहा जाता है कि रॉ के इस मिशन में इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने भी मदद की थी. इसके लिए लगभग एक दशक तक, 'काओबॉय' आर.एन. काव के नेतृत्व में रॉ ने पाकिस्तान के अंदर एक नेटवर्क बनाने का काम किया था. पाकिस्तान के अंदर रॉ की प्राथमिकता इस वीपन प्रोग्राम की लोकेशन का पता लगाना था. 1970 के दशक के अंत से पहले ही रॉ ने  पाकिस्तान के अंदर एक अच्छा नेटवर्क स्थापित कर लिया था.

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'कैसे जानें कहुटा में न्यूक्लियर प्लांट है या नहीं?'

नेटवर्क के लोगों ने यहां पंजाब के कहुटा में न्यूक्लियर प्लांट के बारे में अफवाहें सुनी थीं. लेकिन सवाल था कि इस खुफिया जानकारी की पुष्टी कैसे की जाए? न्यूक्लीयर प्लांट में घुसपैठ की कोशिश करना मूर्खतापूर्ण होता और इसमें सालों लग सकते थे. और तब तक तो के परमाणु बम के लिए रिच फ्यूल पाकिस्तान के हाथ लग जाता. पाकिस्तान ने इसे इतना छिपाकर रखा कि रॉ के व्यापक नेटवर्क के बावजूद, उन्हें केवल अफवाहें ही मिलीं. 

न्यूक्लीयर प्रोग्राम वाले वैज्ञानिक की पहचान

इस बीच वैज्ञानिकों ने रॉ को बताया कि अगर कोई आदमी परमाणु कार्यक्रम में हिस्सा लेता है तो उसके शरीर में ऐसे कई रेडियोएक्टिव कण चिपक जाते हैं जिससे इस बात का पता लगाया जा सकता है कि वो किसी न्यूक्लीयर में शामिल है या नहीं . ये एक तरह से न्यूक्लियर प्रोग्राम वाले वैज्ञानिक की पहचान होता. एजेंट समझ नहीं पा रहे थे कि किसी वैज्ञानिक की ऐसी कौन सी चीज हासिल की जाए कि किसी को शक भी न हो और काम भी बन जाए.  एजेंट्स को इस बात की भी भनक थी कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी भी परमाणु कार्यक्रम में शामिल लोगों पर निगाह रखे हुई है तो आखिर उन तक पहुंचा कैसे जाए?

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रॉ एजेंट ने नाई की दुकान से चुराए बाल

फिर इस खुफिया ऑपरेशन में अनोखा ही तरीका अपनाया गया. दरअसल, रॉ एजेंटों ने कहुटा में एक नाई की दुकान का पता लगाया. ये वही दुकान थी जहां पाक के परमाणु वैज्ञानिक अपने बाल कटवाने आते थे. रॉ एजेंट नाई की दुकान में एक वैज्ञानिक के पीछे  गए और यहां बाल काटने के बहाने चुपके से गिरे हुए बालों में से कुछ चुरा लिए. ये सैंपल लैब टेस्ट के लिए भारत भेज दिए गए. जब टेस्ट की रिपोर्ट आई तो सबकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. क्योंकि उस पाकिस्तानी वैज्ञानिक के बालों से रेडिएशन के अंश मिले थे. बस अब सब कुछ साफ था. भारत जान चुका था कि कहुटा प्लांट परमाणु बम विकसित करने के लिए तैयार एक प्लूटोनियम रिफाइनिंग प्लांट था. ये बात तो तय हो गई कि पाकिस्तान वास्तव में परमाणु हथियार बना रहा है. 

उत्तरी कोरिया के चलते चिंता में थी मोसाद

इधर, इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद भी पाकिस्तान के परमाणु हथियार हासिल करने को लेकर असुरक्षित थी. इसने पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम के बारे में जानने के लिए सब कुछ इकट्ठा करने में रॉ के साथ साझेदारी की थी. मोसाद इसलिए भी परेशान थी क्योंकि पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम के जनक पाकिस्तानी वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान ने उत्तरी कोरिया के प्योंगयांग का दौरा किया था.  उस वक्त उत्तरी कोरियो की कमान तानाशाह किम जोंग उन के पिता के हाथ में थी और वो लगातार परमाणु बम बनाने की कोशिश कर रहा था. यही उत्तरी कोरिया  इज़रायल को अपना कट्टर दुश्मन मानता था लिहाजा मौसाद को लग रहा था कि अगर पाकिस्तानी वैज्ञानिक खान की मदद से उत्तरी कोरिया परमाणु बम बना लेता है तो उसकी मुसीबतें और बढ़ जाएंगी. ऐसे में  इजराइल सीधे तौर पर कहुटा प्लांट पर बमबारी करना चाहता था. लेकिन भारत की तरफ से एक बड़ा पेंच फंस गया.

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एक चूक ने बिगाड़ा सारा नेटवर्क

दरअसल, भारत और पाकिस्तान के बीच उस वक्त रिश्ते इतने खराब नहीं थे जितने आज है. तब लीडरशिप फोन पर आपस में बात कर लिया करती थी.  ऐसी ही एक बातचीत के दौरान जनरल जिया उल हक को संकेत मिल गया कि भारत को हमारे परमाणु कार्यक्रम की खबर मिल चुकी है. जिया उल हक ये जानते ही ठनक गए और पाकिस्तान ने तुरंत सभी रॉ नेटवर्क को हटा दिया और कहुटा को इजराइल बमबारी से बचाने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ डील कर ली.

'...तो शायद परमाणु बम बना ही नहीं पाता पाकिस्तान'

साथ ही भारत की ओर से इस चूक का नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान में रॉ के नेटवर्क में शामिल लोगों को चुन-चुन कर मार दिया गया. एक भूल के चलते पाक में रॉ का नेटवर्क बर्बाद हो गया. रॉ का ये मिशन भले ही पूरी तरह से कामयाब न हो पाया. लेकिन, वाकई में रॉ का ये अभियान न सिर्फ़ ऐतिहासिक था, बल्कि दुनिया के सबसे जोखिम भरे मिशन में से भी एक था. इस ऑपरेशन कहूटा रॉ के कई शानदार ऑपरेशन्स में से एक माना जाता है. इसमें शामिल एजेंट्स के इनपुट का इस्तेमाल अगर ठीक तरह से होता तो शायद आजतक पाकिस्तान परमाणु बम बना ही नहीं पाता.
 

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