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भारत में बनेगा मलेरिया का टीका, ऑक्सफोर्ड और सीरम इंस्टीट्यूट में डील, अफ्रीका में होगा इस्तेमाल 

सीरम इंस्टीट्यूट में बनने वाली R21/Matrix-M वैक्सीन को 5 से 36 महीने तक के बच्चों को लगाया जाएगा. मलेरिया से बचाने वाली इस वैक्सीन को सबसे पहले अफ्रीकी देश घाना की ओर से मंजूरी मिली है.

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सांकेतिक फोटो
सांकेतिक फोटो

अफ्रीका में मलेरिया बीमारी पर काबू पाने के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा विकसित किए गया टीका भारत में बनाया जाएगा. इसको लेकर ऑक्सफोर्ड और सीरम इंस्टीट्यूट में डील भी हो गई है. इस वैक्सीन को अफ्रीका फूड एंड ड्रग्स अथॉरिटी द्वारा घाना में इस्तेमाल करने के लिए लाइसेंस भी दे दिया गया है.  

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सीरम इंस्टीट्यूट में बनने वाली R21/Matrix-M वैक्सीन को 5 से 36 महीने तक के बच्चों को लगाया जाएगा. मलेरिया से बचाने वाली इस वैक्सीन को सबसे पहले घाना की ओर से मंजूरी मिली है. ऑक्सफोर्ड की ओर से प्रोफेसर एड्रियन हिल ने बताया कि यह वैक्सीन 30 साल की रिसर्च का नतीजा है. भारत में निर्माण के बाद वैक्सीन को सबसे अधिक आवश्यकता वाले देशों को पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति की जा सकती है.  

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मेडिसिन विभाग के जेनर संस्थान के डायरेक्टर प्रोफेसर एड्रियन हिल ने कहा कि कोविड-19 वैक्सीन के लिए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ हमारी साझेदारी काफी सफल हुई थी. मलेरिया की R21/Matrix-M वैक्सीन एक डोज वाली है, जिसे बड़े पैमाने पर मामूली लागत से बनाया जाएगा, जिससे अफ्रीकी देशों को करोड़ों डोज वैक्सीन की आपूर्ति की जा सकती है, जो मलेरिया से जूझ रहे हैं.  

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अफ्रीकी देश घाना में मिला लाइसेंस

मलेरिया एक जानलेवा बीमारी है, जो समाज के सबसे कमजोर तबके के लोगों को असमान रूप से प्रभावित करती है और बच्चों की मौत की वजह बनी हुई है. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा कि इस बीमारी के बोझ को बहुत अधिक प्रभावित करने के लिए एक टीका विकसित करना असाधारण रूप से कठिन रहा है. अफ्रीकी देश घाना में इस वैक्सीन का लाइसेंस मिलना दुनियाभर में मलेरिया से निपटने के हमारे प्रयासों में एक मील का पत्थर है. हम मलेरिया से जूझ रहे देशों में पीड़ितों के जीवन को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. 

बुर्किना फासो, केन्या, माली में हो चुका टेस्ट

इस वैक्सीन R21/Matrix-M को शुरू में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में डिजाइन और विकसित किया गया था और यूके, थाईलैंड और कई अफ्रीकी देशों में क्लिनिकल परीक्षण किया गया है, जिनमें बुर्किना फासो, केन्या, माली और तंजानिया में तीसरे फेज का टेस्ट भी शामिल है. इसके लिए 4800 बच्चों का नामांकन हुआ. इन टेस्ट का रिजल्ट इस साल के अंत में रिपोर्ट किए जाने की उम्मीद है.   

 

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