कर्नल मनप्रीत.. मेजर आशीष.. डीएसपी हुमांयू भट्ट... ये सब के सब जांबाज अफसर वतन की रक्षा में कुर्बान हो गए. इनकी शहादत बेमिसाल है, लेकिन इनके परिजनों के हौसले की दाद देनी पड़ेगी, जिन्होंने अपने लाल को खोया, मगर आह तक नहीं की. एक मां अपने शहीद बेटे को सलाम कर रही है... कह रही है कि सपूत की शहादत पर उसे नाज है.
पानीपत के मेजर आशीष पर हर नागरिक को नाज है. मेजर आशीष की मां ने कहा कि आशीष मेरा नहीं भारत मां का बेटा है. मैंने तो अपना बेटा पाल पोसकर देश को सौंप दिया था. आंखें गम में डूबी हैं, लेकिन वतन पर बेटा न्योछावर हो गया, ये सोचकर आंसू सूख जाते हैं.
मेजर आशीष, कर्नल मनप्रीत और डीएसपी हुमायूं भट्ट के परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूटा है, लेकिन इस मुश्किल घड़ी में भी वो अपने सपूतों की शहादत को याद कर अपने दर्द को दरकिनार कर दे रहे हैं. इनके लिए आज भी देश का सवाल खुद से ज्यादा बड़ा है, तभी तो मेजर आशीष की मां कह पा रही हैं- बेटा चला गया, लेकिन हमारा सर ऊंचा कर गया.
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मेजर आशीष के पिता भी फौजी रहे हैं. इस परिवार का सेना से पुराना नाता रहा है. ये जानते हैं कि सेना का हिस्सा होने का मतलब क्या है. सैन्य सेवा के खतरे से ये अंजान नहीं हैं, लेकिन इन्होंने खतरा मोल लिया, क्योंकि सवाल देश की सुरक्षा का था.
पानीपत में मेजर आशीष को आखिरी विदाई देने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़ पड़े. पूरा पानीपत एक परिवार बन गया. जो चले गए, वे दोबारा लौटकर नहीं आने वाले, लेकिन शौर्य की जो गाथा ये जांबाज दर्ज करा गए हैं, वो भी कभी न मिटने वाली कहानी बन गई है.
जिस घर में गृह प्रवेश होना था, वहां से निकली जांबाज की अर्थी
मेजर आशीष बडे़ शौक से पानीपत में घर बनवा रहे थे. 23 अक्टूबर को गृह प्रवेश की तैयारी थी. जन्मदिन भी धूमधाम से मनाने की तमन्ना थी, लेकिन झटके में सारे सपने स्वाहा हो गए. एक जांबाज की जिंदगी की यही विडंबना है. एक तरफ देश के स्वाभिमान, मां भारती की सुरक्षा का सवाल है, जहां शहादत फख्र की बात होती है, वहीं दूसरी तरफ वो अपने हैं, जिन पर ये शहादत भारी पड़ती है.
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एक पिता के दर्द के बारे में सोचिए. आंखों के सामने बेटे की अर्थी निकल रही है. एक पत्नी के दुख का अंदाजा लगाइए, जिनकी जिंदगी में अब अंधेरा और मुश्किलें ही बची हैं.
मेजर आशीष के पिता भी सेना में रहे
मेजर आशीष के परिवार का समर्पण और देशभक्ति लाजवाब रही है. पिता भी सेना में थे. रिटायर होकर पहले किराए के मकान में रहते थे. अब परिवार नए मकान में शिफ्ट होने की तैयारी कर रहा था, लेकिन नियति को शायद कुछ और मंजूर था.
मेजर आशीष का पार्थिव शरीर पानीपत से उनके पैतृक गांव लाया गया. इसी गांव की मिट्टी में वो पले-बढे़. यहां की आबोहवा में उन्होंने वतन की सेवा का सपना देखा, लेकिन आज ये पूरा गांव गम के आंसू बहा रहा है, क्योंकि आशीष पूरे गांव का गौरव थे.
आतंकियों से मोर्चे पर सबसे आगे रहे मेजर आशीष
जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में आतंकियों से दो-दो हाथ हो रहा था तो मेजर आशीष मोर्चे पर सबसे आगे थे. दहशतगर्दों ने घात लगाकर हमला कर दिया. सामने होते तो सीना दुश्मनों का छलनी होता, लेकिन कायरों ने छिपकर वार किया. मेजर आशीष शहीद हो गए, लेकिन अपने पीछे बहादुरी की मिसाल कायम कर गए.