19-20 अक्टूबर 1962 की रात. गलवान के पास का हिमालयी इलाका. ठंड, बर्फ और अंधेरे का नजारा था. इसी का फायदा उठाते हुए चीनी फौजियों ने चुपके से हमला कर दिया. चीनी फौजियों ने लद्दाख के पूर्वी सेक्टर और गलवान की चौकियों पर एक साथ हमला किया था. करीब 600 से ज्यादा सैनिक आए थे सीमा उस पार से. गोरखा रेजिमेंट के मेजर धन सिंह थापा आगे की चौकी संभाल रहे थे. चीन की सेना उनकी पोस्ट पर लगातार गोलियों और मोर्टार से हमला कर रही थी.
मेजर धन सिंह थापा को आगे की चौकी पर इसलिए तैनात किया गया था, क्योंकि भारत सरकार ने चीन की घुसपैठ को रोकने के लिए 'फॉरवर्ड पॉलिसी' को लागू किया था. यानी चीन के सामने छोटे-छोटे पोस्ट बनाए जाएं. खैर कहानी शुरु होती है महावीर थापा के पोस्ट से.
आसमान से बरस रहे थे 'आग के गोले'
19 अक्टूबर 1962 को चीन की तरफ से भारी मात्रा में आर्टिलरी फोर्स आ रही थी. ये लोग श्रीजाप-1 के ऊपर बड़ी मात्रा में हमला बोल रहे थे. उस हमले का अंदाजा मेजर धन सिंह थापा को था. इसलिए वो लगातार अपने जवानों से कह रहे थे कि जल्दी बंकर खोदों और उन्हें गहरा बनाओ. मेजर थापा की आशंका सच साबित हुई. चीनी फौजियों ने रात साढ़े चार बजे आर्टिलरी और मोर्टार से हमला करना शुरु कर दिया.
ढाई घंटे तक लगातार आसमान से गोले बरस रहे थे. ऊंचाई से आ रहे चीनी फौजी ताबड़तोड़ फायरिंग कर रहे थे. रात के अंधेरे में गोलियां शोलो की तरह चमकती हुई भारतीय बंकरों की तरफ आ रही थीं. ऊपर से चीनी सीमा उस पार से तोप से शेलिंग कर रहे थे. जब शेलिंग बंद हुई तब तक 600 चीनी सैनिक मेजर धन सिंह थापा की पोस्ट 140 मीटर के दायरे में आ चुके थे. लेकिन न धन सिंह डरे, न ही उनके जवान. लाइट मशीन गन से जवाबी हमला शुरु किया.
बंकर से बंकर जाकर जवानों का हौसला बढ़ाया
इस हमले की उम्मीद चीनियों को नहीं थी. हालांकि चीन के आर्टिलरी हमले में कई भारतीय सैनिक बुरी तरह जख्मी हो चुके थे. कुछ शहीद भी. डी कंपनी के साथ धन सिंह थापा का संपर्क भी टूट गया था. क्योंकि उनके सभी रेडियो सेट्स गोलीबारी में खराब हो चुके थे. तब मेजर धन सिंह थापा और उनके सेकेंड इन कमांड सुबेदार मिन बहादुर गुरुंग एक पोस्ट से दूसरे पोस्ट की तरफ भागते हुए मशीन गन से फायरिंग करते रहे. जवानों का हौसला बढ़ाते रहे.
इस तरह से हमला करते रहने के दौरान भी चीनी फौजी धन सिंह की पोस्ट से 46 मीटर करीब पहुंच गए. भारतीयों को पोस्ट से भगाने या मारने के लिए चीनी फौजियों ने बम फेंकना शुरु कर दिया था. हथगोले ही हथगोले दागे जा रहे थे. गोरखा रेजिमेंट के जवान भी हैंडग्रैनेड्स और छोटे हथियारों से लगातार जवाबी हमला कर रहे थे. तब मेजर थापा ने खुद को दुश्मन के सामने लाते हुए लाइट मशीन गन से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरु कर दी. कई चीनी सैनिक मारे गए.
खुद मशीन गन, खुकरी से मारे कई चीनी फौजी
मेजर धन सिंह थापा के पोस्ट पर उस समय सिर्फ सात जवान बचे थे. थापा इस पोस्ट के कमांडर थे. चीनी फौजियों ने अगला हमला हैवी मशीन गन और रॉकेट लॉन्चर से शुरू किया. झील के पास वाले इलाके में चीनी फौजी एंफिबियस बोट्स के साथ आए. सबके पास हैवी मशीन गन थी. तब तक भारत के दो स्टॉर्म बोट्स ने चीनी नावों पर हमला कर दिया. लेकिन चीनियों के हमले में भारतीय फौजियों की एक नाव डूब गई. दूसरी बुरी तरह से टूट-फूट गई. इससे हमले से नायक रबिलाल थापा बचकर भागे.
तब तक तीसरा चीनी हमला हुआ. वो भी टैंक से. मेजर थापा के बंकर में सिर्फ तीन लोग बचे थे. थापा बाहर निकले लेकिन हथियार खत्म हो चुके थे. तब उन्होंने छिपकर हमला करने के लिए बनाए गए खंदकों से चीनियों की तरफ बढ़ना शुरू किया. हाथ में खंजर लेकर कई चीनी फौजियों को मार डाला. लेकिन थोड़ी देर बाद उन्हें चीनी फौजियों ने पकड़कर युद्धबंदी बना लिया. थापा के साथ तीन और फौजी युद्धबंदी बनाए गए. इनमें से राइफलमैन तुलसी राम किसी तरह से भागने में कामयाब हुए और वापस बटालियन में शामिल हुए.
पहले लगा शहीद हो गए, बाद में पता चला युद्धबंदी हैं
पहले तो लगा कि मेजर धन सिंह थापा बाकी जवानों के साथ शहीद हो चुके हैं. लेकिन बाद में खबर आई कि ये युद्धबंदी बनाए गए थे. मेजर थापा को नवंबर 1962 के बाद रिहा कर दिया गया. हालांकि उनकी बहादुरी और युद्ध कुशलता के लिए उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया. धन सिंह थापा का जन्म 10 अप्रैल 1928 को शिमला में हुआ था. 8 अगस्त 1949 को धन सिंह गोरखा राइफल्स की पहली बटालियन में शामिल हुए थे.