समलैंगिक शादी यानी सेम सेक्स मैरिज... ये शब्द इन दिनों खूब चर्चा में है. समलैंगिक विवाह को आप ऐसे समझिए कि पुरुष से पुरुष और स्त्री से स्त्री की शादी करें. लेकिन इस मैरिज को कानूनी मान्यता दी जाए या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. इसी बीच समलैंगिक जोड़ों के परिजनों ने CJI डीवाई चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर उनको स्वीकार्यता देने की अपील की है. इन परिजनों ने अपने पत्र में लिखा है कि हमने अपने बच्चों के जेंडर और सेक्सुएलिटी से लेकर उनकी भावनाओं को समझा है. हमने कई पहलुओं पर गौर किया और ये अहसास हुआ कि उनकी इच्छाएं और पसंद सही हैं. हम चाहते हैं कि हमारे बच्चों को हमारे देश में स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत उनके रिश्ते को कानूनी स्वीकृति मिल जाए. साथ ही कहा कि हमें भारत के लोगों, संविधान और हमारे देश के लोकतंत्र पर भरोसा है.
ओपन लैटर में सेम सेक्स मैरिज की वकालत करते हुए समलैंगिक जोड़ों के परिजनों ने लिखा कि हम भारतीय LGBTQIA+ बच्चों के पैरेंट्स हैं. हमारा एक ग्रुप है, जिसका नाम स्वीकार (Sweekar) - द रेनबो पैरेंट्स है. यह एक तरह से सहायता समूह है, जो स्वीकृति की दिशा में हमारी यात्रा को आसान बनाने में मदद कर रहा है. हम देश के कोने-कोने से एकत्र होने वाले 400 से ज्यादा पैरेंट्स का एक समूह हैं. हमारी मांग है कि आप सेम सेक्स मैरिज को लेकर दाखिल की गई याचिकाओं पर विचार करें.
लेटर में लिखा गया है कि हमने अपने बच्चों के जेंडर, सेक्सुएलिटी से लेकर उनकी फीलिंग्स को गहराई से समझा है. हालांकि हम उन लोगों के प्रति भी सहानुभूति रखते हैं जो इस शादी का विरोध कर रहे हैं. हमें अपने LGBTQIA+ बच्चों से बात करने के दौरान ये अहसास हुआ कि उनका जीवन, उनकी भावनाएं और उनकी इच्छाएं गलत नहीं हैं. हम उम्मीद करते हैं कि जो लोग सेम सेक्स मैरिज का विरोध कर रहे हैं, वह भी आगे आएंगे और इन बच्चों को समझेंगे. हमें भारत के लोगों, संविधान और हमारे देश के लोकतंत्र पर भरोसा है.
परिजनों ने लैटर में लिखा कि एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के लिए धारा-377 को पढ़ा, और यह सुनिश्चित किया कि हमारे बच्चों के साथ सम्मान और स्वीकृति के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए.
इतना ही नहीं, कॉर्पोरेट भारत ने भी धीरे-धीरे समलैंगिक जीवन के विचार को अपनाना शुरू किया है. समाज एक बदलती और विकसित प्रक्रिया है. जिस तरह एक पैर उठता है तभी दूसरा पैर भी अपने आप उठ जाता है. सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने समाज पर एक शानदार प्रभाव पैदा किया था. इससे नफरत की सुई ने सहनशीलता के साथ स्वीकृति तक का रास्त तय किया.
हमारे बच्चों की शादी को भी कानूनी मान्यता दी जाए. हम बूढ़े हो रहे हैं. हममें से कुछ जल्द ही 80 साल की उम्र के आंकड़े को छू लेंगे. हमें आशा है कि हमारे बच्चों के सपनों को मुकम्मल आसमां जरूर मिलेगा.
- दो अलग-अलग धर्मों और अलग-अलग जातियों के लोग शादी कर सकें, इसके लिए 1954 में स्पेशल मैरिज एक्ट बनाया गया था.
- इस कानून के जरिए भारत के हर नागरिक को ये संवैधानिक अधिकार दिया गया है कि वो जिस धर्म या जाति में चाहे, वहां शादी कर सकते हैं. इसके लिए लड़के की उम्र 21 साल और लड़की की उम्र 18 साल से ज्यादा होनी चाहिए.
- भारत में शादी के बाद उसका रजिस्ट्रेशन भी करवाना होता है. अलग-अलग धर्मों के अपने पर्सनल लॉ हैं, जो सिर्फ उन धर्मों को मानने वालों पर लागू होते हैं. लेकिन स्पेशल मैरिज एक्ट सभी पर लागू होता है. इसके तहत शादी करवाने के लिए धर्म बदलने की जरूरत नहीं होती.
1. कानूनी उम्र बदली जाए
- सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट रोहतगी ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट में शादी की कानूनी उम्र में बदलाव किया जाए. यहां पुरुष की पुरुष से शादी होती है तो उम्र 21 साल और स्त्री की स्त्री से शादी होती है तो 18 साल उम्र तय की जा सकती है.
2. महिला-पुरुष की जगह व्यक्ति लिखा जाए
- याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने ये भी मांग की है कि स्पेशल मैरिज एक्ट में 'पुरुष और महिला की शादी' की बात कही गई है. इसमें 'पुरुष' और 'महिला' की जगह 'व्यक्ति' लिखा जाना चाहिए. स्पेशल मैरिज एक्ट को 'जेंडर न्यूट्रल' बनाया जाए.