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आखिर 27 सालों से क्यों लंबित पड़ा है महिला आरक्षण बिल? कितनी बदल जाएगी देश की सियासत

12 सितंबर 1996 को एचडी देवगौड़ा की सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में ससंद में महिला आरक्षण विधेयक को पेश किया था. उस समय यूनाइटेड फ्रंट की सरकार थी, जो 13 पार्टियों का गठबंधन था. लेकिन सरकार में शामिल जनता दल और अन्य कुछेक पार्टियों के नेता महिला आरक्षण के पक्ष में नहीं थे. इस विरोध की वजह से इस विधेयक को सीपीआई की गीता मुखर्जी की अगुवाई वाली संयुक्त समिति के समक्ष भेजा गया. 

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महिला आरक्षण विधेयक
महिला आरक्षण विधेयक

संसद के विशेष सत्र के पहले दिन केंद्रीय कैबिनेट ने महिला आरक्षण बिल को मंजूरी दे दी है. सबसे पहले सितंबर 1996 में एचडी देवगौड़ा की सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पेश किया था. इसके बाद से लगभग हर सरकार ने इस विधेयक को पारित कराने की कोशिश की.

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यूपीए सरकार 2010 में राज्यसभा में इसे जरूर पारित कराने में सफल रही लेकिन यह विधेयक लोकसभा में लटक गया. महिला आरक्षण विधेयक के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलेगा कि 27 सालों की यह यात्रा इतनी आसान नहीं रही. 

विधेयक में महिला आरक्षण की व्याख्या पर फंसा था पेंच

12 सितंबर 1996 को एचडी देवगौड़ा की सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में ससंद में महिला आरक्षण विधेयक को पेश किया था. उस समय यूनाइटेड फ्रंट की सरकार थी, जो 13 पार्टियों का गठबंधन था. लेकिन सरकार में शामिल जनता दल और अन्य कुछेक पार्टियों के नेता महिला आरक्षण के पक्ष में नहीं थे. इस विरोध की वजह से इस विधेयक को सीपीआई की गीता मुखर्जी की अगुवाई वाली संयुक्त समिति के समक्ष भेजा गया. 

इस 31 सदस्यीय संसदीय समिति में ममता बनर्जी, मीरा कुमार, सुमित्रा महाजन, नीतीश कुमार, शरद पवार, विजय भास्कर रेड्डी, सुषमा स्वराज, उमा भारती, गिरिजा व्यास, रामगोपाल योदव, सुशील कुमार शिंदे और हन्नाह मोल्लाह शामिल थे. 

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इस समिति ने विधेयक में सात बड़े सुझावों का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि विधेयक में महिलाओं के लिए आरक्षण के संबंध में 'एक तिहाई से कम नहीं' वाक्य अस्पष्ट हैं और इसकी अलग तरह से व्याख्या की जानी चाहिए.

समिति ने सुझाव दिया कि इसे 'लगभग एक तिहाई' लिखना चाहिए ताकि इसमें अस्पष्टता की कोई गुंजाइश नहीं बचे. समिति ने यह भी सुझाव दिया कि राज्यसभा और विधानपरिषदों में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण होना चाहिए. साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी आरक्षण का लाभ उचित समय पर मिलने के लिए इस पर विचार करना चाहिए.

महिला विरोधी बयानों से भरा पड़ा है इतिहास

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस समिति का हिस्सा थे. उन्होंने महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करते हुए असहमति नोट में कहा था कि यह विधेयक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षण की बात करता है. मेरा मानना है कि ओबीसी की महिलाओं को भी आरक्षण मिलना चाहिए. इसलिए एक तिहाई आरक्षण में ओबीसी की महिलाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए. यह आरक्षण ओबीसी की महिलाओं के लिए भी सही अनुपात में होना चाहिए. 

16 मई 1997 में लोकसभा में एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक को लाया गया लेकिन सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर ही इसके विरोध में आवाजें उठने लगी. इस दौरान विधेयक पर बहस करते हुए शरद यादव ने  कहा था कि इस बिल से सिर्फ पर-कटी औरतों का ही फायदा पहुंचेगा. परकटी शहरी महिलाएं हमारी ग्रामीण महिलाओं का प्रतिनिधित्व कैसे करेंगी. उनके इस बयान से विवाद खड़ा हो गया था. हिंदी भाषी क्षेत्र के नेताओं ने इस विधेयक का पुरजोर विरोध किया था.इस वजह से यूनाइटेड फ्रंट सरकार इस बिल को पास नहीं कर पाई थी और यह औंधे मुंह गिर गया था.

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विधेयक पारित कराने के प्रयास बार-बार होते रहे फेल

साल 1998 से 2004 के बीच बीजेपी की अगुवाई में एनडीए सरकार ने कई बार महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने की कोशिश की. 

पहली बार 13 जुलाई 1998 को लोकसभा में उस समय घमासान मच गया, जब कानून मंत्री एम थंबी दुरई ने इस विधेयक को सदन के पटल पर पेश करने की कोशिश की लेकिन राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इसका पुरजोर विरोध किया. इस हंगामे के बीच आरजेडी के सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने लोकसभा के स्पीकर जी एम सी बालयोगी से बिल की कॉपी छीन ली और उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए. 

अब बिहार सरकार में मंत्री सुरेंद्र ने कहा था कि उनहोंने इस बिल की कॉपी इसलिए फाड़ दी क्योंकि बीआर आंबेडकर उनके सपने में आए थे और उन्हें ऐसा करने को कहा था. इस हंगामे के बाद अगले दिन इस बिल को संसद में लाया जाना था लेकिन स्पकीर ने यह कहकर इसे पेश नहीं होने दिया कि इस पर सहमति संभव नहीं है. 

11 दिसंबर 1998 को लोकसभा में एक बार फिर इस विधेयक को लेकर घमासान मचा. ममता बनर्जी ने इस बिल का विरोध कर रहे समाजवादी पार्टी के तत्कालीन सांसद दरोगा प्रसाद सरोज का कॉल पकड़कर उन्हें संसद से बाहर का रास्ता दिखाया था.

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इस बिल को सपा, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा, बहुजन समाज पार्टी और मुस्लिम लीग के विरोध के बावजूद 23 दिसंबर 1998 को संसद में पेश किया गया. लेकिन हर बार की तरह इस पर जमकर हंगामा बरपा. अप्रैल 1999 में वाजपेयी सरकार के गिरने की वजह से यह संसद भंग होने की वजह से यह विधेयक एक बार फिर ठंडे बस्ते में चला गया. 

2010 में आधा रास्ता हुआ था पार

अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार फिर एनडीए का गठन किया. इस बार सरकार में कानून मंत्री राम जेठमलानी ने 23 दिसंबर 1999 को इस बिल को पेश किया. लेकिन इस बार फिर सपा, बसपा और आरजेडी ने इसका विरोध किया. इसके बाद 2000, 2002 और 2003 में भी विधेयक को पारित कराने की कोशिशें की गईं लेकिन कांग्रेस, लेफ्ट के समर्थन के बावजूद यह पारित नहीं हो सका. 
जुलाई 2003 में तत्कालीन स्पीकर मनोहर जोशी ने इस विधेयक पर सहमति के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई थी लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ.

छह मई 2008 को कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक को राज्यसभा में पेश किया. लेकिन इसे जल्द ही कानून और न्याय की स्थाई समिति के समक्ष भेज दिया गया. सपा, जदयू और आरजेडी के विरोध के बीच इसे संसद के दोनों सदनों में पेश किया गया. 25 फरवरी 2010 को केंद्रीय कैबिनेट ने महिला आरक्षण विधेयक को मंजूरी दे दी.नौ मार्च 2010 को राज्यसभा में इस विधेयक को भारी मतों से पारित किया गया. लेकिन यह विधेयक लोकसभा में पेश नहीं हो पाया.

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बीजेपी ने 2014 और 2019 के चुनावी घोषणापत्रों में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का वादा किया था लेकिन इस दिशा में कोई खास काम नहीं हो पाया. लेकिन 18 सितंबर 2023 को कैबिनेट की अहम बैठक में महिला आरक्षण बिल को मंजूरी दे दी गई.

देश की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का वजूद?

संसद ओर अधिकतर विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 15 फीसदी से कम है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 19 विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी 10 फीसदी से भी कम है. मौजूदा लोकसभा में 543 सदस्यों में से महिलाओं की संख्या 78 है, जो 15 फीसदी से भी कम है. राज्यसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 14 फीसदी है. कई विधानसभाओं में महिलाओं की भीगीदारी 10 फीसदी से कम है.

जिन विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 फीसदी से अधिक है. उनमें बिहार (10.70 फीसदी), छत्तीसगढ़ (14.44 फीसदी), हरियाणा (10 फीसदी), झारखंड (12.35 फीसदी), पंजाब (11.11 फीसदी), राजस्थान (12 फीसदी), उत्तराखंड (11.43 फीसदी), उत्तर प्रदेश (11.66 फीसदी), पश्चिम बंगाल (13.70 फीसदी) और दिल्ली (11.43 फीसदी) है. गुजरात विधानसभा में 8.2 फीसदी महिला विधायक हैं जबकि हिमाचल प्रदेश विधानसभा में सिर्फ एक ही महिला विधायक है. 

40 देशों में महिलाओं के लिए आरक्षण

राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण की राह कभी आसान नहीं रही. स्वीडन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (आईडीईए) के अनुसार, लगभग 40 देशों में या तो संवैधानिक संशोधन या कानूनों में बदलाव कर संसद में महिलाओं के लिए कोटा निर्धारित किया गया.

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50 से अधिक देशों में कई राजनीतिक दलों ने कानून में कोटा प्रावधान निर्धारित किया है. पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में महिलाओं के लिए 60 सीटें आरक्षित हैं. बांग्लादेश की संसद में महिलाओं के लिए 50 सीटें आरक्षित हैं. नेपाल की संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित हैं.

तालिबान के शासन से पहले अफगानिस्तान की संसद में महिलाओं के लिए 27 फीसदी सीटें आरक्षित थीं. यूएई की फेडरल नेशनल काउंसिल (एफएनसी) में महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटें आरक्षित हैं. इंडोनेशिया में उम्मीदवारों में कम से कम 30 फीसदी महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. कई अफ्रीकी, यूरोपीय, दक्षिण अमेरिकी देशों में भी राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान है.

क्या है महिला आरक्षण बिल?

बीते 27 सालों से चर्चा में बने हुए महिला आरक्षण विधेयक में लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है. मौजूदा समय में लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 78 है जो एक तरह से कुल सांसदों का सिर्फ 14 फीसदी है. राज्यसभा में महिला सांसदों की संख्या महज 32 है जबकि कई राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 फीसदी से भी कम है. 

महिला आरक्षण बिल की जरूरत क्यों?

महिला आरक्षण बिल आज के समय की जरूरत है. इससे पंचायत से लेकर विधानसभाओं, विधान परिषदों और देश की संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ेगी. इस बिल को कानूनी दर्जा मिलने से देश की सियासत से लेकर सरकारी और निजी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी. 

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