संसद भवन परिसर का मकर द्वार गुरुवार को एक ऐसी अप्रत्याशित घटना का साक्षी बना जो आजाद हिंदुस्तान के इतिहास में अभी तक नहीं घटी थी. पहले प्रदर्शन, फिर विरोध और फिर धक्कामार सियासत ने जहां संसद की मर्यादा को तो तार-तार किया ही वहीं, इस घटना ने एक तरह से भारतीय लोकतंत्र के चेहरे को भी मलिन कर दिया है. गलती किसकी है? इस सवाल पर दोनों पक्षों से आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं, साथ ही इस घटना ने संसद भवन के मकर द्वार को भी खास चर्चित बना दिया है.
संसद भवन परिसर में घटी यह घटना, ऐतिहासिक, पौराणिक और यहां तक कि ज्योतिष संदर्भों के लिए भी अनोखी है और स्थान विशेष 'मकर द्वार' होने के कारण इस स्थान का अलग ही महत्व और रुख भी सामने आता है. पहले बता दें कि नई संसद भवन परिसर में छह द्वार हैं. जिनमें सिंह द्वार, हंस द्वार, गरुण द्वार, गज द्वार, अश्व द्वार, मकर द्वार और शार्दुल द्वार शामिल हैं. इनमें मकर द्वार संसद भवन का पश्चिमी दिशा का द्वार है और इसके प्रवेश बिंदु पर मकर की भव्य प्रतिमा बनी हुई है.
मकर एक पौराणिक जीव है. जिसका संबंध जल और भूमि दोनों से है. एक अर्थ में तो मकर, जलीय जंतु मगरमच्छ का ही प्राचीन और संस्कृत स्वरूप है. लंबा मुख, बड़ी पूंछ, एक रेखीय पीठ और कांटेदार मोटी चमड़ी वाला यह जीव, जलचरों में सबसे खतरनाक प्राणी माना जाता है. विज्ञान की भाषा में यह सरीसृप यानी रेप्टाइल्स की श्रेणी में आता है और जल के अलावा दलदल या नमी वाली भूमि में रहना पसंद करता है. इसे कई पौराणिक कथाओं और संदर्भों में जल का संरक्षक माना गया है, इसलिए प्राचीन वैदिक देवता वरुण देव से भी मकर का संबंध माना गया है. कई जगहों पर इसे उनकी सवारी माना गया है तो कई संदर्भों में वरुण देव मकर के ही रूप में जल में रहते हैं, ऐसा भी मानते हैं.
क्या है मकर का महत्व?
मगरमच्छ को देवी गंगा से भी जोड़कर देखा जाता है. गंगा जो कि भारत की परम पवित्र नदी है और पौराणिक कथा के अनुसार जब धरती पर उनका आगमन हो रहा था तो वह बहुत वेग से उतरी थीं. शिवजी ने उन्हें अपनी जटाओं में स्थान देकर उनकी गति को कुछ कम कर दिया था, फिर भी उनकी धाराओं में इतना तेज था कि वह जिस स्थान से भी बहती वहां की समूची धरती बह जाती थी, तब महादेव शिव के आदेश पर मकर (मगरमच्छ) के समूह ने एक धरती पर एकसाथ गुंथ कर एक बांध जैसा बना लिया और फिर जब गंगा जल उनकी मोटी चमड़ी वाली पीठ पर गिरा तो उसका वेग कम होता गया. इस तरह धरती पर गंगा अवतरण संभव हो सका. देवी गंगा ने मकर को सम्मान देने के लिए ही उसे अपनी सवारी के तौर पर स्वीकार किया, इसलिए जब भी गंगा नदी का मानवीकरण करते हुए उन्हें देवी के तौर उकेरा जाता है तो उन्हें मकर पर बैठा हुआ दिखाया जाता है. प्राचीन स्थापत्य कला में किसी किले, भवन आदि को देखें तो कई जगहों पर जल निकासी की नालियां और टोंटी मकर के मुख की आकृति की बनाई हुई दिखाई देंगी.
मकर स्थिरता, स्थायित्व, सात्विक शक्ति और संरक्षण का प्रतीक है. संसद भवन के पश्चिमी द्वार का नाम इस पौराणिक जीव के आधार पर रखने की एक वजह यह भी है. यह लोकतंत्र को स्थायित्व देने का संकल्प द्वार है, लेकिन विडंबना है कि यही मकर द्वार गुरुवार को छल और द्वंद्व का साक्षी बन गया और लोकतंत्र की मर्यादा के उल्लंघन का भी.
रामकथा में भी प्रसंग
छल-छंद की बात आती है तो मकर के छल से जुड़ा से ऐसा ही एक प्रसंग रामकथा में भी मिलता है. प्रसंग है कि मेघनाद के शक्ति बाण से लक्ष्मण युद्धभूमि में मूर्छित पड़े थे. उनके उपचार के लिए हनुमान जी संजीवनी लेने के लिए जा रहे थे. आकाश मार्ग से उड़ान भरते हुए उन्हें स्थान को लेकर थोड़ा भ्रम हुआ. इसी बीच उन्हें दिखा कि दुर्गम पहाड़ों के बीच एक साधु राम भजन कर रहा है. हनुमान संजीवनी बूटी का मार्ग जानने के लिए उसकी कुटिया में उतरे. वास्तव में यह साधु रावण का मित्र राक्षस कालनेमि था, जो कि वेश बदलकर हनुमान का रास्ता रोकने आया था. साधु बने कालनेमि ने हनुमान को राम-राम की धुन सुनाकर भ्रमित कर दिया और फिर कहा कि थोड़ी देर विश्राम कर लो. जाओ वहां तालाब में शीतल जल है, वहां स्नान कर लो, जल पी लो फिर हम तुम्हें चमत्कारी शक्ति से संजीवनी बूटी तक पहुंचा देंगे. हनुमान जी ने उसकी बात मान ली और तालाब पहुंच गए. वहां जैसे ही उन्होंने ताल में डुबकी लगाई एक मगरमच्छ ने उन पर हमला कर दिया.
हनुमान जी ने मगरमच्छ को पकड़ कर पटक दिया और उसका अंत कर दिया. मरते ही उस मगरमच्छ से एक अप्सरा प्रकट हुई, जिसने श्राप के कारण यहां फंसे होने की बात कही. हनुमान ने उन्हें मुक्त कराया था, इसलिए उसने राक्षस कालनेमि का सारा सच उन्हें बता दिया. इस तरह मकर ने रामकथा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर धर्म की स्थापना में सहायता की.
धर्म को मानें तो बौद्ध धर्म और जातक कथाओं में भी मकर को धम्म यानी धर्म का प्रतीक बताया गया है. कई बौद्ध स्थलों में मकर उनके पवित्र प्रतीकों के तौर पर शामिल नजर आएगा. जातक कथाओं में भी मकर को बुद्धि, चिंतन, आत्म मंथन और सम्यक धर्म का प्रतीक बताया गया है. भारत, तिब्बत, और दक्षिण-पूर्व एशिया में मकर को संरक्षक देवता माना जाता है. कई बौद्ध मंदिरों में इसे पवित्र प्राणी के रूप में पूजा जाता है. बौद्ध ग्रंथों में मकर 'धर्मपाल' (धर्म के रक्षक) के रूप में दर्शाया गया है. यह दुष्ट शक्तियों और अज्ञान से लड़ने का प्रतीक भी है.
मकरमुख नलिकाएं, जिनमें मकर का चेहरा दिखता है, कई हिंदू और बौद्ध मंदिरों में जल निकासी के लिए उपयोग किया जाता है. इसे केवल कार्यात्मक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना गया है. यह जल को पवित्र और शुद्ध करने का प्रतीक है. शिल्प और चित्रों में मकर के मुख से अक्सर लहरें, मछलियां, या जल धाराएं निकलती हुई दिखाई जाती हैं. यह समृद्धि, जीवन की निरंतरता, और उर्वरता का प्रतीक है.
भारत के ही प्राचीन और पौराणिक आख्यानों में नहीं बल्कि मकर को रोमन काल के प्राचीन संदर्भों में भी महत्वपूर्ण जगह मिली हुई है.
रोमन में मकर राशि को कैसे समझाया गया है?
रोमन में मकर राशि को एक व्यावहारिक और स्थिरता प्रदान करने वाली राशि के रूप में देखा जाता था. साम्राज्य के स्थायित्व और महत्वाकांक्षी योजनाओं के प्रतीक के रूप में देखा गया है. रोमन कथाओं में भी मकर एक पौराणिक जलीय जीव है, लेकिन उसका स्वरूप भारतीयता से कुछ अलग है. यहां मकर एक दो जीवों की मिक्स ब्रीड है, जिसमें मछली के शरीर पर बकरी जैसा मुख है. कई जगहों पर यह किसी भी अन्य स्थलीय स्तनधारी के मुख और पूंछयुक्त मगरमच्छ जैसे शरीर वाला जीव है, जिनमें घोड़ा और भेड़िया प्रमुख हैं, लेकिन इसकी प्रकृति जलीय ही है, सिर्फ जमीन से भी इसका संपर्क दर्शाने के लिए इसे चौपाया स्तनधारी जीव का मुख दिया गया है. रोमन सम्राट ऑगस्टस भी मकर राशि से प्रभावित था और उसके साम्राज्य की कुछ मुद्राओं पर मकर चिह्न बने हुए थे.
अब आते हैं, ज्योतिष पर. भारतीय ज्योतिष और खगोल शास्त्र में मकर 12 राशियों में से एक है. अंग्रेजी में इसे "Capricorn" कहा जाता है और खगोल विज्ञान में यह सूर्य के वार्षिक पथ पर मौजूद 12 खंडों में से एक है. सूर्य जब हर खंडों से गुजरता है और पृथ्वी अपनी गति के कारण उससे दूर चली जाती है तो परवलयाकार (पैराबोलिक) पथ होने के कारण एक परिक्रमा के बाद फिर से वह इस मकर राशि का रेखीय स्थिति से गुजरती है. तब सूर्य पृथ्वी के सम्मुख मकर राशि में आ जाता है और यह स्थिति मकर संक्रांति कहलाती है. हर साल 13-14 जनवरी को यह स्थिति बनती है.
खगोल शास्त्र में इसे ऐसे कहा जाता है कि, जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर आता है, तब मकर राशि में प्रवेश करता है और यह मकर संक्रांति होती है. वैदिक ज्योतिष में मकर राशि का स्वामी शनि ग्रह है, जो कि न्याय और दंड विधान के देवता हैं. मकर को भूमि तत्व की राशि कहा गया है. यह व्यावहारिकता, अनुशासन, और महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी हुई है. मकर राशि दसवीं राशि है और इसे कर्म और सामाजिक स्थिति से जोड़ा गया है. सूर्य के क्रांतिवृत्त के दक्षिणी भाग में स्थित होने के कारण और धरती पर खींची गई काल्पनिक मकर रेखा से नजदीक होने के कारण इसका नाम "मकर" पड़ा.
अब गुरुवार के पूरे घटनाक्रम को ज्योतिष की नजर से देखें. सियासत की यह घटना मकर द्वार पर हुई. मकर द्वार पश्चिम दिशा में है. इस राशि का स्वामी शनि है. गुरुवार 19 दिसंबर को जिस समय यह घटना हुई, (सुबह 9 बजे से 11 बजे के बीच) वह गुलिक काल था. गुलिक काल को केतु का छाया समय, शनि का पुत्र और उनकी कुदृष्टि का प्रतीक माना गया है. यह समय शुभ नहीं होता है. केतु भी भ्रम और अनिश्चितता का प्रतीक है, जो कि दो गुटों, दो लोगों और विचारों के बीच मतभेद लेकर आता है. इसके अलावा गुरुवार को दिनभर विडाल योग भी बना रहा. विडाल योग बेहद अशुभ योग है और ज्योतिष की मानें तो इसका प्रभाव इतना गहरा होता है कि क्रंदन, चीत्कार और मानसिक अशांति जैसी स्थिति बनती हैं. दोपहर में राहुकाल भी रहा जो कि टकराहट का कारण बनता है और इस टकराव के दूरगामी और लंबे समय तक रहने वाले कुप्रभाव भी हो सकते हैं.
कुल मिलाकर भारतीय राजनीति और लोकतंत्र के लिए गुरुवार का दिन किसी भी लिहाज से बेहतर नहीं रहा और सारे समीकरण एक साथ मिल गए. मकर राशि का प्रतीक मकर द्वार जो कि अपने शुभ लक्षणों और शुभ कर्मों का प्रतीक था, वह भी लोकतंत्र के दमन दिवस का साक्षी बन गया.