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अब प्रोजेक्ट चीता के दूसरे चरण की तैयारी, MP में बन रहीं दो साइट, दक्षिण अफ्रीका से आएगा नया बैच

भारत में प्रोजेक्ट चीता के प्रमुख ने बताया कि नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए 20 चीतों में से 14 चीते पूरी तरह से स्वस्थ हैं और अच्छे से रह रहे हैं. उन्होंने बताया कि अब प्रोजेक्ट चीता के दूसरे चरण की तैयारी की जा रही है. मध्य प्रदेश में दो नई साइट्स तैयार की जा रही हैं.

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प्रोजेक्ट चीता के तहत पिछले साल आठ नामीबियाई चीतों को कूनो राष्ट्रीय उद्यान के बाड़ों में छोड़ा गया था.
प्रोजेक्ट चीता के तहत पिछले साल आठ नामीबियाई चीतों को कूनो राष्ट्रीय उद्यान के बाड़ों में छोड़ा गया था.

भारत ने प्रोजेक्ट चीता के दूसरे चरण की तैयारी शुरू कर दी है. भारत अब उन चीतों का लाने का प्लान बना रहा है, जिन पर गंभीर संक्रमण का खतरा नहीं होगा और सर्दियों में बीमारी का खतरा ना हो. दरअसल, पिछले साल अफ्रीका से भारत लाए गए कुछ चीतों में गंभीर संक्रमण हो गया था और उनमें से तीन की मौत के पीछे यह बड़ा फैक्टर सामने आया था.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 17 सितंबर को मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में नामीबिया से लाए गए चीतों के एक समूह को बाड़े में छोड़कर भारत में प्रोजेक्ट चीता का उद्घाटन किया था. रविवार को प्रोजेक्ट चीता का एक साल पूरा होने जा रहा है. न्यूज एजेंसी से बातचीत में पर्यावरण मंत्रालय में अतिरिक्त वन महानिदेशक एसपी यादव ने इस बात पर जोर दिया कि प्रोजेक्ट का दूसरे वर्ष में ध्यान चीता के प्रजनन (Breeding) पर होगा.

'रेडियो कॉलर के कारण नहीं मरे चीता'

उन्होंने दावा किया कि चीतों को जो रेडियो कॉलर पहनाए गए थे, उससे कोई संक्रमण नहीं हुआ. हालांकि, इन कॉलरों को दक्षिण अफ्रीकी निर्माता के नए कॉलर से बदलने का निर्णय लिया गया है. यादव ने कहा, चीतों का अगला बैच दक्षिण अफ्रीका से लाया जाएगा और मध्य प्रदेश के गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में भेजे जाने की तैयारी है. यह साल के अंत तक स्वागत करने के लिए तैयार हो जाएगा.

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'कूनो में 20 चीता रखने की क्षमता'

यादव ने आगे कहा, चीता एक्शन प्लान के तहत कूनो में लगभग 20 चीतों को रखने की क्षमता है. अभी वहां एक शावक समेत 15 चीते हैं. जब हम देश में चीतों का अगला बैच लाएंगे तो यह किसी अन्य जगह पर भेजे जाएंगे. हम मध्य प्रदेश में ऐसी दो साइटें तैयार कर रहे हैं, इनमें एक गांधी सागर अभयारण्य और दूसरी नौरादेही का नाम शामिल है.

'मध्य प्रदेश में दो नई साइट की तैयारी'

उन्होंने कहा, गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में तैयारियां जोरों पर चल रही हैं. मुझे उम्मीद है कि यह नवंबर या दिसंबर के अंत तक पूरी हो जाएंगी. एक बार जब हमें पूरा होने की रिपोर्ट मिल जाएगी तो हम साइट पर जाएंगे. हम सभी तैयारी के दृष्टिकोण से इसका मूल्यांकन करेंगे और दिसंबर के बाद हम चीतों को लाने पर फैसला लेंगे.

'इस वजह से गई चीतों की जान...'

यादव ने स्वीकार किया कि भारत में चीतों के प्रबंधन के पहले वर्ष में सबसे बड़ी चुनौतियों में से मौसम को समझ पाना भी रहा है. अफ्रीकी सर्दियों (जून से सितंबर) के मुकाबले भारतीय गर्मी और मानसून के दौरान कुछ चीतों का अप्रत्याशित विकास हुआ. इसकी अफ्रीकी विशेषज्ञों को भी उम्मीद नहीं थी. यादव ने बताया कि इस मौसम में सर्दियों से बचाव के लिए निकले कोट में उच्च आर्द्रता और तापमान के साथ मिलकर खुजली पैदा करता है, जिससे जानवरों को पेड़ के तने या जमीन पर अपनी गर्दन खुजलाने की कोशिश करते हैं. इससे चोट लगती है और जहां मक्खियों ने अपने अंडे दिए, वहां कीड़ों का संक्रमण हुआ. अंततः, जीवाणु संक्रमण और सेप्टीसीमिया हुआ, जिससे मृत्यु हो गई.

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'अबकी बार चयन में बरतेंगे सावधानी'

प्रोजेक्ट चीता के प्रमुख ने कहा, कुछ चीतों में सर्दियों से बचाव के लिए कोट विकसित नहीं हुए और वे संक्रमण मुक्त रहे. वे भारतीय परिस्थितियों के लिए बेहतर अनुकूल साबित हुए हैं. इसलिए, हमारे अगले प्रोजेक्ट में आने वाले चीता के चयन में बहुत सावधानी बरतेंगे. हम उन जानवरों को प्राथमिकता देंगे जिनमें या तो शीतकालीन कोट विकसित नहीं हुए हैं या पतले विकसित हुए.

'कूनो में अच्छे माहौल में रह रहे हैं चीता'

यादव ने कहा कि परियोजना के पहले वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक जंगल में चीतों के बीच देखा गया सफल प्राकृतिक शिकार करने का व्यवहार शामिल है. उन्होंने कहा, चीता को शिकार करने, अपने शिकार की रक्षा करने और पर्यावरण के अनुकूल ढलते देखा गया. ये संकेत बेहद उत्साहजनक हैं. मेरा मानना ​​​​है कि हमने प्रोजेक्ट चीता को पूरा करने के सिर्फ एक साल के भीतर कई मील के पत्थर हासिल किए हैं.

'अगले साल भारत में सबसे ज्यादा शावक होंगे'

परियोजना के दूसरे वर्ष में फोकस के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, पहली बात जो मेरे दिमाग में आती है वह चीतों का प्रजनन है. भारतीय धरती पर पैदा होने वाले शावक बेहतर तरीके से माहौल में ढल सकते हैं. एक बार प्रजनन होता है तो हम समझेंगे कि हमारे देश में जनसंख्या कैसे व्यवहार करेगी. मुख्य बात यह है कि अगले वर्ष भारत की धरती पर अधिक शावक होंगे. 

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'पिछले साल नामीबिया से लाए गए थे चीता'

बताते चलें कि बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट के तहत कुल 20 चीता को नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से दो बैचों में कूनो में लाया गया था. नामीबिया से पिछले साल सितंबर में चीता आए थे. जबकि दूसरे बैच में इस साल फरवरी में दक्षिण अफ्रीका से चीता लाए गए थे. मार्च के बाद से इनमें से छह वयस्क चीतों की विभिन्न कारणों से मौत हो गई है. मई में मादा नामीबियाई चीता से पैदा हुए चार शावकों में से तीन की अत्यधिक गर्मी के कारण मौत हो गई. अन्य शावक को देखभाल में पाला जा रहा है.

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