प्रख्यात इतिहासकार प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा भी कोरोना के क्रूर प्रहार से इस दुनिया से विदा हो गए. बिहार में जन्म, पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे से स्कूली शिक्षा से लेकर फ्रांस की राजधानी पेरिस तक उच्च शिक्षा हासिल करने वाले प्रोफेसर वर्मा ने इतिहास लेखन को एक नई ऊंचाई दी. लेकिन वामपंथी विचारधारा के प्रति उनकी अगाध निष्ठा की वजह से शायद राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे.
प्रो. लाल बहादुर वर्मा का रविवार रात निधन हो गया. उनका इलाज देहरादून के एक अस्पताल में चल रहा था. वह लंबे समय तक इलाहाबाद में रहे तकरीबन चार वर्ष पहले देहरादून शिफ्ट हो गए थे.
प्रखर इतिहासकार और सुयोग्य शिक्षक
प्रो.वर्मा मौजूदा दौर के उन गिने-चुने लोगों में से थे जिनकी पुस्तकें देश के अधिकतर विश्वविद्यालयों के किसी न किसी पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही हैं. लाल बहादुर वर्मा की पुस्तकों और लेखों को पढ़कर बहुत से लोगों को अपना इतिहास-बोध विकसित करने में मदद मिली थी. उनकी प्रतिबद्धता और जनपक्षधरता के लोग कायल थे. एक मार्क्सवादी विचारक, प्रखर इतिहासकार, सुयोग्य शिक्षक और संपादक के रूप में प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा हमेशा याद किये जाएंगे.
वर्मा इतिहास के एक्टिविस्ट तो थे ही, इतिहासबोध उनका मिशन था. अपनी किताबों से वह एक तरह ख्वाब पैदा करते थे. वह ख्वाब था समानता और आजादी का. वह इतिहास, साहित्य, नाटक, गीत, शोध- शिक्षण, आंदोलन, यात्राएं, आत्मकथा और तमाम मुहिमों के जनक थे. वह एक साथ वैश्विक चिंतक, इतिहासकार, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं बुद्धिधर्मी थे.
इलाहाबाद का उनका घर कितने ही छात्रों के लिए एक अलग तरह का कॉफी हाउस था, जहां अलग-अलग मतों को मानने वाले, अलग-अलग इलाकों से आये छात्र-छात्रायें खुलकर अपनी बात कहते थे. अपने स्टूडेंट्स को वे बेहद सहजता से उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, विविधता, जनतान्त्रिक मूल्य को समझा देते. वे एक ऐसे प्रोफेसर थे जो गीत, संगीत, भोजन, स्वाद से लेकर किसी भी विषय पर बिना अगले को किसी कमतरी का अहसास कराये अपनी बातों में शामिल कर सकते थे.
इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष
लाल बहाुदर वर्मा, गोरखपुर विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष रहे और शहर की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों में अपना योगदान देते रहे. वहां से इलाहाबाद गए.
प्रोफेसर वर्मा फ्रांस से 1970 के दशक में भारत आये, जबकि वो आराम से वहां भी पढ़ा सकते थे. वो गोरखपुर विश्वविद्यालय में आ गये और युवाओं के साथ मिलकर एक नये तरह समाज के निर्माण के लिए, साथ ही प्रखर बौद्धिक गतिविधियों के लिए काम करते रहे. प्रोफेसर वर्मा जब गोरखपुर विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर थे. उन दिनों उनके संपादकत्व में निकलने वाली पत्रिका 'भंगिमा' प्रगतिशील सोच के छात्रों, अध्यापकों और लेखकों-कवियों के बीच काफी चर्चित थी. लाल बहादुर वर्मा जी की जितनी प्रवाहमय अंग्रेजी या फ्रेंच थी, उतनी ही तरलता से बिना क्लिष्ट हुए वे हिंदी भी बोलते थे.
कस्बे के स्कूल से पेरिस तक का सफर
पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे से स्कूली शिक्षा हासिल करने से लेकर पेरिस तक पहुंचने वाले प्रोफेसर वर्मा की विद्वता हैरान करने वाली थी. 10 जनवरी 1938 को बिहार के छपरा जिले में जन्मे प्रो. वर्मा ने प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद 1953 में हाईस्कूल की परीक्षा गोरखपुर से पास जयपुरिया स्कूल, आनंदनगर से की थी.
उन्होंने साल 1957 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के सेंट एंड्र्यूज कॉलेज से स्नातक किया. इस दौरान वह छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे. लखनऊ विश्वविद्यालय से 1959 में स्नातकोत्तर करने के बाद 1964 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि हासिल की. 1968 में फ्रेंच सरकार की छात्रवृत्ति पर पेरिस में आलियास फ्रासेज में फ्रेंच भाषा की शिक्षा हासिल की. गोरखपुर और मणिपुर विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य करने के बाद 1990 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अध्यापन कार्य करते हुए यहीं से रिटायर हुए.
वह ‘इतिहासबोध’ पत्रिका बहुत दिनों तक प्रकाशित करने के बाद अब इसे बुलेटिन के तौर पर समय-समय पर प्रकाशित कर रहे थे. प्रो.वर्मा की हिन्दी, अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा में डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. उनकी प्रमुख कृतियों में 'यूरोप का इतिहास', ‘इतिहास के बारे में’ 'आधुनिक विश्व का इतिहास' आदि शामिल हैं. इसके अलावा कई किताबों का अंग्रेजी और फ्रेंच में अनुवाद भी हुआ. बीसवीं सदी के लोकप्रिय इतिहासकार एरिक हाब्सबॉम की इतिहास शृंखला ‘द एज आफ रिवोल्यूशन’ का अनुवाद काफी चर्चित रहा.