भारत सरकार ने शुक्रवार को देश की तीन प्रमुख हस्तियों को भारत रत्न देने का ऐलान किया, जिनमें भारत के 10वें प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिम्हा राव का नाम भी शामिल है. नरसिम्हा राव को देश में किए गए आधुनिक आर्थिक सुधारों, लाइसेंस राज की समाप्ति के लिए जाना जाता है. 1991 में भारत को दुनिया के बाज़ार के लिए खोला गया, तो नरसिम्हा राव ही प्रधानमंत्री थे.
देश को आर्थिक सुधारों के युग में प्रवेश कराने का श्रेय नरसिम्हा राव सरकार को ही जाता है. नरसिम्हा राव 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक (कुल 1,791 दिनों तक) भारत के प्रधानमंत्री रहे. एक नजर उनके जीवन पर:-
पी. रंगा राव के बेटे पीवी नरसिम्हा राव का जन्म 28 जून 1921 को करीमनगर में हुआ था. उन्होंने हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी, बॉम्बे यूनिवर्सिटी और नागपुर यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की.
नरसिम्हा राव का राजीनीतिक करियर
एक किसान और वकील रहे राव ने राजनीति में कदम रखा और कई महत्वपूर्ण पद और विभाग संभाले. नरसिम्हा राव 1951 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के सदस्य बने और 1957 में मंथनी सीट (अब तेलंगाना के पेद्दापल्ली जिले में) से जीतने के बाद आंध्र प्रदेश विधानसभा पहुंचे.
वे आंध्र प्रदेश सरकार में 1962-64 तक कानून एवं सूचना मंत्री; 1964-67 तक कानून और सेटलमेंट; 1967 में स्वास्थ्य और चिकित्सा, और 1968-71 तक शिक्षा विभाग का कार्यभार संभाला. इसके बाद नरसिम्हा राव 1971-73 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. बाद में उन्होंने 1975-76 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव का पद भी संभाला. राव 1957-77 तक आंध्र प्रदेश विधान सभा के सदस्य रहे. इसके बाद वो 1977-84 तक लोकसभा के सदस्य रहे. राव दिसंबर 1984 में रामटेक से आठवीं लोकसभा के लिए चुनकर आए.
प्रधानमंत्री पद की शपथ के समय नहीं थे लोकसभा सांसद
1991 के आम चुनाव (10वीं लोकसभा) में कांग्रेस ने 232 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की. हालांकि, उस साल राव ने चुनाव नहीं लड़ा था. बाद में राजीव गांधी की हत्या के बाद जब नरसिम्हा राव ने 21 जून, 1991 को पीएम के रूप में शपथ लिया तब वो संसद के सदस्य नहीं थे. कुछ महीने बाद उन्होंने आंध्र प्रदेश के नंदयाल से उपचुनाव लड़ा और जीत कर लोकसभा पहुंचे.
आर्थिक संकट से देश को बाहर निकाला
1991 में जब राव भारत के प्रधानमंत्री बने, तब देश कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रहा था जिसमें सबसे बड़ी समस्या आर्थिक संकट थी. राव की नेतृत्व वाली सरकार ने आर्थिक सुधार को लेकर कई फैसले लिए और 24 जुलाई 1991 को तब के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने अपने पहले बजट में देश के सामने आर्थिक सुधारों का रोडमैप रखा.
उथल-पुथल भरा रहा कार्यकाल
हालांकि नरसिम्हा राव ने अपने कार्यकाल में बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम भी देखा, जब वो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे तब 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था. इस घटना से कुछ महीने पहले ही लोकसभा में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर उन्होंने अपने बयान में कहा था की ''कांग्रेस मस्जिद को तोड़े बिना मंदिर निर्माण के पक्ष में है.''
भारत सरकार में संभाला ताकतवर मंत्रालय
1984 के आम चुनाव में राव महाराष्ट्र के रामटेक से चुनाव लड़े और बड़े अंतर जीतकर आए. बाद में राजीव गांधी सरकार में राव योजना आयोग (अब नीति आयोग) के उपाध्यक्ष नियुक्त किये गए, जहां वो 1985 की शुरुआत तक रहे. इसके बाद वह राजीव मंत्रिमंडल में शामिल हुए और सरकार में कई प्रमुख विभाग संभाले. नरसिम्हा राव 14 जनवरी 1980 से 18 जुलाई 1984 तक भारत के विदेश मंत्री; 19 जुलाई 1984 से 31 दिसंबर 1984 तक देश के गृह मंत्री और 31 दिसंबर 1984 से 25 सितंबर 1985 तक भारत के रक्षा मंत्री रहे. इसके बाद उन्होंने 25 सितंबर, 1985 को मानव संसाधन विकास मंत्री बनाए गए.
कांग्रेस हारी लेकिन राव जीते
1996 के आम चुनाव में कांग्रेस हार गई. उस चुनाव में राव ने दो लोकसभा क्षेत्रों नंद्याल और बेरहामपुर से चुनाव लड़ा था. राव को दोनों सीटों से जीत मिली. हालांकि बाद में उन्होंने बेरहामपुर सीट को चुना.
संगीत, साहित्य और सिनेमा में थी रूचि
नरसिम्हा राव अनेक चीजों में रूचि रखते थे, जिसमें संगीत, सिनेमा और थिएटर उन्हें काफी पसंद था. उन्हें भारतीय दर्शन और संस्कृति, कथा और राजनीतिक टिप्पणी लिखने, नई भाषाएं सीखने और तेलुगू और हिंदी में कविताएं लिखने में दिलचस्पी थी. उन्होंने विश्वनाथ सत्यनारायण के नमी तेलुगु उपन्यास 'वेई पदगालु' का हिंदी अनुवाद 'सहस्रफन' को भी प्रकाशित किया था.