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सांसद इंजीनियर राशिद के संसद सत्र में शामिल होने का मामला, दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

NIA ने बारामुला सांसद राशिद इंजीनियर की संसद सत्र में शामिल होने के लिए कस्टडी पैरोल मांगने की याचिका का विरोध किया, यह कहते हुए कि गिरफ्तार सांसदों को ऐसी अनुमति का अधिकार नहीं. दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है.

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राशिद इंजीनियर (PTI)
राशिद इंजीनियर (PTI)

बारामुला से सांसद राशिद इंजीनियर की संसद सत्र में शामिल होने के लिए कस्टडी पैरोल की मांग का NIA ने कड़ा विरोध किया है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) का कहना है कि राशिद के पास यह अधिकार नहीं है कि वे संसद सत्र में शामिल होने के लिए कस्टडी पैरोल मांग सकें. NIA ने जोर दिया कि सांसद के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही चल रही हो तो उन्हें मिलने वाले विशेष अधिकार और दायित्व लागू नहीं हो सकते. हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है.

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NIA ने सुरेश कलमाड़ी के मामले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि गिरफ्तार या कानूनी रूप से हिरासत में रहने वाले सांसद को सदन की कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती. यह मामला संसद की प्रभुता को भी प्रभावित करता है.

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सुरेश कलमाडी के मामले से अलग है राशिद का मामला!

कोर्ट ने राशिद इंजीनियर के वकील की इस दलील पर विचार किया कि यह अदालत के विवेक में है कि वे उन्हें संसद सत्र में शामिल होने की अनुमति दे. राशिद के वकील ने दावा किया कि उनका मामला सुरेश कलमाडी के मामले से अलग है और वह सुरक्षा के लिए खतरा नहीं हैं, लेकिन NIA की दलील थी कि राशिद संसद की कार्यवाही में शामिल होने के माध्यम से गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं.

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फोन का इस्तेमाल कर रहे थे राशिद- एनआईए

कोर्ट ने पूछा कि राशिद सुरक्षा के लिए कैसे खतरा हैं, जिसका जवाब देते हुए NIA ने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर से सूचना मिली थी कि वह फोन का इस्तेमाल कर रहे थे. इससे संबंधित सुरक्षा चिंताएं हैं जिनका समाधान करना मुश्किल है. NIA का यह भी दावा है कि अगर राशिद को कस्टडी पैरोल दी जाती है, तो उसकी सुरक्षा के लिए सशस्त्र बलों को लगाना होगा, जो संसद भवन के नियमों के खिलाफ है.

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कोर्ट का अंतिम फैसला देना बाकी

NIA के इस कड़े विरोध के बावजूद, अदालत ने अभी तक इस याचिका पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है. जैसे ही यह मुद्दा कानूनी प्रक्रिया में आगे बढ़ता है, देश भर के लोग इस पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यह निर्णय सांसदों के अधिकारों और न्यायपालिका की भूमिका की सीमा पर नए आयाम पेश कर सकता है.

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