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Ratan Tata: मर्सिडीज से डील के लिए जर्मनी गए थे रतन टाटा... लौटे तो JRD ने कहा- आज मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ नया है, अब TATA Empire तुम संभालो!

Ratan tata news: अफसोस की टाटा ग्रुप की उस बोर्ड मीटिंग को रिकॉर्ड करने के लिए उस दिन कोई कैमरा नहीं था. जिस दिन जेआरडी ने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के सामने घोषणा की थी कि वे टाटा समूह की चेयरमैनशिप से इस्तीफा दे रहे हैं और अब ये कुर्सी रतन टाटा की दी जा रही है. बकौल रतन टाटा उस दिन Jay ने यादों के आर्काइव को फिर से सजीव कर दिया था. वे गुजरे आधी सदी की कहानी कह रहे थे.

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रतन टाटा जेआरडी टाटा के साथ (Photo- India today)
रतन टाटा जेआरडी टाटा के साथ (Photo- India today)

रतन टाटा जब भी JRD टाटा से मिलते तो JRD का पहला वाक्य होता- Well... what's new? रतन उन्हें कंपनी की और इंडस्ट्री की नई बातें बताते फिर चीजें आगे बढ़ती. बात एक ऐसे ही मुलाकात की है. रतन टाटा उस दिन का काम शुरू होने से पहले JRD से मिलने गए. JRD यानी कि जहांगीर रतनजी दादा भाई टाटा. इन्होंने ही टाटा मोटर्स की स्थापना की. ये वाकया तब का है जब जेआरडी टाटा ग्रुप के चेयरमैन थे. 

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तो किस्सा यूं है कि रतन टाटा जेआरडी से मिलने गए. हमेशा की तरह जेआरडी ने रतन टाटा से पूछा- Well... what's new? यहां हम आपको बता दें कि रतन टाटा अपने मेंटॉर और बॉस JRD को सिर्फ Jay कहकर बुलाते थे. जेआरडी के सवाल के जवाब में रतन ने कहा- Jay मैं आपसे रोज मिलता आ रहा हूं, लेकिन जब से मैं आपसे आखिरी बार मिला तब से लेकर अभी तक कुछ भी नया नहीं है. इसके बाद जेआरडी ने कहा- वेल मेरे पास कुछ है जो नया है. 

इसके बाद जेआरडी ने रतन टाटा से जो कुछ कहा उसने आधुनिक भारत के सबसे बड़े औद्योगिक साम्राज्य में तरंगें ला दी. 

पद्म विभूषण रतन नवल टाटा आज हमारे बीच नहीं रहे. 86 साल की उनकी जिंदगी भारत के एक सुस्त कृषि प्रधान देश से तेज रफ्तार औद्योगिक राष्ट्र बनने का कालखंड है. भारत की इस ग्रोथ स्टोरी में टाटा समूह की भागीदारी स्टील के फ्रेम की तरह है. जिसने कई उद्योगों को फौलादी बैकबोन दिया है. जेआरडी और रतन टाटा इस स्टील फ्रेंम में पिलर की तरह फिट बैठते हैं. 

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रतन टाटा लॉस एंजिल्स से पढ़ाई खत्म कर मुंबई लौटे और 15 दिन के भीतर ही उनका डेस्टिनेशन पिघले हुए लोहे की गंध से भरा रहने वाला अविभाजित बिहार का छोटा सा शहर जमशेदपुर था. अमेरिका से ऑर्किटेक्चर की डिग्री लेकर आया ये इंजीनियर अब जेआरडी की फैक्ट्री में अपने करियर के शुरुआती कदम रख रहा था. 

हॉस्टल में ठहरता था टाटा टाइटल वाला लड़का

ध्यान रहे इस दौरान टाटा खानदान इस बात का खास ध्यान रख रहा था कि उन्हें कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं मिले. रतन टाटा ने 27 साल पहले अभिनेत्री सिमी ग्रेवाल के बेहद ही उम्दा कार्यक्रम 'Rendezvous with Simi Garewal' में खुद कहा था- "सबकी यही चिंता थी कि मेरे साथ कोई स्पेशल ट्रीटमेंट न किया जाए, इसलिए मुझे एप्रेनटिश हॉस्टल में रहने को कहा गया, टेल्को में मैंने 6 महीने तक शॉप फ्लोर पर काम किया. फिर कुछ सालों तक टिस्को में शॉप फ्लोर पर काम किया." 

रतन टाटा (फाइल फोटो- इंडिया टुडे)

रतन टाटा आयरन इंडस्ट्री में बेहद कठिन माने जाने वाले लोहे की उबलती भट्ठी को भी मैनेज करने में रहे. उन्होंने कहा था- मैं कई प्रोडक्शन डिपार्टमेंट में रहा, ब्लास्ट फ्यूरेंस में रहा, वहां काम किया, जहां स्टील को पिघलाया जाता है वहां रहा. टेल्को के सारे काम को समझा, उस समय ये बेहद कठिन था. रतन टाटा ने कहा कि उन्होंने टेल्को की पूरी कार्य प्रणाली को समझा और ये उनके स्किल और कैपासिटी को बढ़ाने में काफी फायदेमंद रहा. 

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कार से नहीं साइकिल से ऑफिस जाओ

रतन टाटा के लिए टाटा टाइटल कोई विशेषाधिकार लेकर नहीं लाया. रतन टाटा ने इंटरव्यू में कहा था कि टाटा टाइटल एक तरह से उनके लिए नुकसानदायक ही रहा. उन्होंने कहा था- 'एक ऐसे व्यक्ति से नजरिये से समझिए जो लॉस एंजिल्स से आया था, उसे कहा गया कि कार लेकर जमशेदपुर नहीं जा सकते हो, साइकिल से आस-पास जाया करो...मेरे अंदर विद्रोह की भावना आ गई और मैं पैदल ही काम करने जाता था.' गौरतलब है कि रतन उस समय मात्र 25 साल के थे. रतन टाटा ने कहा था कि कई बार मैंने लौट आने की सोची, लेकिन परिस्थितियां ऐसी होती चली गईं. 

इसी माहौल में रतन टाटा की लोहे बनाने और गलाने वाली फैक्ट्री में निखर-निखर कर 'कुंदन' हुए. ये वो दौर था जब जेआरडी टाटा ग्रुप के चेयरमैन थे. इसी दौरान रतन टाटा ने नेल्को की जिम्मेदारी ली और इस कंपनी का कायापलट कर दिया. 

जब JRD ने चुना अपना वारिस

फिर वो वक्त आया जब विजनरी, पारखी और इंडस्ट्री के माहिर सौदागर जहांगीर रतनजी दादा भाई टाटा ने अपने व्यापारिक सम्राज्य के लिए अपने उत्तराधिकारी को चुना. जेआरडी ने टाटा ग्रुप की कमान रतन टाटा को देने का फैसला किस आधार पर किया ये तो जानना बड़ा मुश्किल है. लेकिन ये काम किन परिस्थितियों में हुआ इस जिक्र स्वयं रतन टाटा ने कई बार किया है. 

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रतन टाटा ने कहा था, "हम लोग दोनों जमशेदपुर में थे. मुझे किसी मर्सडीज बेंज के साथ कुछ डील के लिए जर्मनी के स्टूगर्ट शहर जाना पड़ा. जब मैं वापस आया तो मुझे पता चला कि उन्हें हार्ट में किसी तरह की समस्या थी और वे ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में थे. वे वहां एक सप्ताह तक रहे."

रतन टाटा की तस्वीर (फाइल फोटो)

बता दें कि ये लगभग 1990 की कहानी है. जेआरडी तबतक 87 साल के हो चुके थे. 

रतन टाटा के अनुसार वे जेआरडी से रोज मिलने जाते थे. एक शुक्रवार को वे अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आ गए.  अगले सोमवार को रतन टाटा जेआरडी से मिलने उनके ऑफिस गए. रतन के मुताबिक जेआरडी मीटिंग की शुरुआत हमेशा एक ही लाइन से करते थे वो लाइन होती थी- Well... what's new? उस सोमवार को भी जेआरडी ने वही सवाल किया. इसके जवाब में रतन टाटा ने कहा कि वे हमेशा उनसे मिलते आ रहे हैं, लेकिन जब वो उनसे आखिरी बार मिले और आज के बीच नया कुछ भी नहीं है. 

इस पर जेआरडी जिन्हें रतन Jay कहकर बुलाते थे, ने कहा- 'मेरे पास कुछ है जो नया है, जो मैं तुम्हें बताना चाहता हूं, बैठ जाओ'. इसके बाद जेआरडी ने जो रतन टाटा से कहा उसे रतन की जुबानी ही सुनिए- 'मुझे जमशेदपुर में जो हुआ उसने मुझे निर्णय करने की वजह दी है कि मुझे टाटा ग्रुप की चेयरमैनशिप छोड़ देनी चाहिए. और मैंने फैसला किया है कि तुम्हें मेरी जगह लेनी चाहिए.'

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रतन टाटा के अनुसार उन्हें इस जानकारी को देने के बाद जेआरडी इस बेहद अहम मुद्दे को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के पास ले गए. 

इस इंटरव्यू में सिमी ग्रेवाल ने रतन टाटा को बताया था कि इस बोर्ड मीटिंग में जो लोग थे उन्हें पछतावा हो रहा था कि भारत के इस अदभुत कॉरपोरेट ऑनरशिप ट्रांसफर के पल को रिकॉर्ड करने के लिए उनके पास कैमरा नहीं थी. 

रतन टाटा ने उस समय के माहौल को बताया है- मैंने अपने कई साथियों को ये कहते हुए सुना है कि उस दिन इतिहास रचा गया था क्योंकि जेआरडी उस पद को छोड़ रहे थे जिसे उन्होंने 50 सालों तक संभाला था. इस पद के साथ कई भावनाएं जुड़ी थी, और अब वे चेयरमैनशिप किसी और को दे रहे थे. 

बोर्ड मीटिंग में यादों का आर्काइव

रतन टाटा बताते हैं कि जे ने इस मीटिंग में टाटा ग्रुप के साथ अपने सफर को बड़ी बारीकी से याद किया. ये भावुक करने वाला मौका था. उस पल को फिर से जीवंत करना उनके लिए मुश्किल है. रतन के अनुसार ये मौका आर्काइव से यादों को निकालकर उसे फिर से घटित कर देने जैसा था जो उन्होंने टाटा ग्रुप के साथ गुजारे थे. हम सभी द्रवित थे. ये एक युग की समाप्ति और नये काल का उदभव था. 

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बता दें कि 1991 में टाटा समूह की जिम्मेदारी रतन टाटा को देने के बाद नवंबर 1993 में जेआरडी टाटा का निधन हो गया. तब वो 89 वर्ष के थे.  

शुरुआत में तो JRD को जानते भी नहीं थे रतन टाटा

रतन टाटा के अनुसार वे अपनी किशोरावस्था में जेआरडी टाटा को जानते भी नहीं थे. बता दें कि रतन टाटा का जेआरडी टाटा से किसी भी तरह की सीधी रिश्तेदारी नहीं है. रतन इस बात को खुद कहते हैं. रतन टाटा के अनुसार उन्होंने जेआरडी को पहली बार तब जाना जब वे जमशेदपुर में थे. और इसकी एक अनोखी वजह थी. दोनों को ही जहाज उड़ाने का शौक था. और ये ऐसा शौक था जिसकी वजह से दोनों एक दूसरे के करीब आ गए. जेआरडी के कहने पर रतन टाटा ने जमशेदपुर में फ्लाइंग क्लब की स्थापना की. फिर धीरे-धीरे दोनों की बॉन्डिंग मजबूत होती चली गई. 

न्यू टेक्नॉलजी, इलेक्ट्रॉनिक्स, कम्प्यूटर का रोमांच

रतन के मुताबिक न्यू टेक्नॉलजी, इलेक्ट्रानिक्स, कम्प्यूटर ये ऐसी बातें थी जिन पर दोनों के बीच खूब बातें होती, ये दोनों का कॉमन ग्राउंड था. दोनों ही इन मुद्दों पर बात कर आने वाली दुनिया का रोमांच और चुनौतियां महसूस कर सकते थे.  

रतन टाटा ने कहा था कि जेआरडी से उन्होंने जो सबसे बड़ी बात सिखी थी वो थी न्याय की भावना (Sense of justice). रतन के अनुसार वे अपने करियर में इस मूल्य को हमेशा अपने साथ लेकर चलने की कोशिश करते थे. 

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