समलैंगिक विवाह (Same Sex Marriage) को कानूनी मान्यता देने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में लगातार दूसरे दिन बुधवार को भी सुनवाई हो रही है. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. इससे पहले केंद्र सरकार ने एक और हलफनामा देकर SC से कहा है कि कोई भी फैसला देने से पहले केद्र को राज्यों के साथ परामर्श की प्रक्रिया को पूरा करने का समय दिया जाए. केंद्र ने इस मामले में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी पार्टी बनाने की मांग की है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह इस मामले में सुनवाई जारी रखेगा.
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कानून द्वारा संचालित समाज में बदलाव के बारे में बात की. उन्होंने कहा, सेम सेक्स मैरिज करने वाले कपल्स के माता पिता ने भी संघर्षों के बाद उनके रिश्तों को स्वीकार कर लिया है. सामाजिक कलंक और बहिष्करण को मिटाने की जरूरत है. इतना ही नहीं मुकुल रोहतगी ने नेपाल सुप्रीम कोर्ट और अमेरिकी कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया.
याचिकाकर्ताओं की ओर से मुकुल रोहतगी ने क्या दलीलें दीं?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने फिर सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र की बात कही. उन्होंने कहा कि जब तक राज्य इसमें सीधे न जुड़े तब तक इस पर सुनवाई करना उचित नहीं है.
- याचिकाकर्ताओं की ओर से मुकुल रोहतगी ने अपनी दलील 377 के अपराध के दायरे से बाहर किए जाने के मुद्दे से शुरू की. उन्होंने कहा, समलैंगिकों को गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार, निजता का सम्मान और अपनी इच्छा से जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए.घरेलू हिंसा और परिवार और विरासत को लेकर भी कोर्ट की गाइड लाइन स्पष्ट हैं. हमें ये घोषणा कर देनी चाहिए ताकि समाज और सरकार इस तरह के विवाह को मान्यता दे.
- मुकुल रोहतगी ने कहा, इसमें आ रही कानूनी अड़चनों के मद्देनजर कानून में पति और पत्नी की जगह जीवनसाथी यानी स्पाउस शब्द का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 14 के मुताबिक समानता के अधिकार की भी रक्षा होती रहेगी.
- इससे पहले 13 मार्च को चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले को पांच जजों की संवैधानिक बेंच को ट्रांसफर कर दिया था. अब सीजेआई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल, जस्टिस रविंद्र भट, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच इस मामले पर सुनवाई कर रही है.
- मुकुल रोहतगी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 के मुताबिक, समानता के अधिकार के तहत हमें विवाह को मान्यता मिलनी चाहिए. क्योंकि सेक्स ओरिएंटेशन सिर्फ महिला -पुरूष के बीच नहीं, बल्कि समान लिंग के बीच भी होता है.
- मुकुल रोहतगी ने कहा कि 377 हटाकर सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया. लेकिन बाहर हालात जस के तस हैं. समलैंगिकों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए.
- रोहतगी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने के लिए अंतरजातीय और अंतर-धार्मिक जोड़ों के अधिकार की रक्षा की है.
- ''समलैंगिक विवाह की गैर-मान्यता भेदभाव है, जो LGBTQIA+ जोड़ों की गरिमा और एटीएम संतुष्टि की जड़ पर आघात करती थी. LGBTQ+ नागरिक देश की आबादी में 7 से 8% हिस्सेदारी रखते हैं.''
- रोहतगी ने नवतेज जौहर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें समलैंगिक कृत्यों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था. उन्होंने कहा, पुट्टास्वामी का फैसला, जिसमें निजता के अधिकार और पसंद और चयन के अधिकार पर जोर दिया गया था. विशेष विवाह अधिनियम भारत के संविधान के अधिकार से बाहर है, यह समान लिंग वाले जोड़ों और विपरीत लिंग के जोड़ों में भेदभाव करता है.
- मुकुल रोहतगी ने कहा, समान-लिंग वाले जोड़ों को दोनों कानूनी अधिकारों से वंचित करता है, जैसे संपत्ति को गोद लेने और विरासत में लेने के साथ-साथ सामाजिक मान्यता और स्थिति जो विवाह से प्रवाहित होती है, यह अदालत शफीन जहां के मामले में अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने के मौलिक अधिकार के मुद्दे पर पहले ही फैसला दे चुकी है. पसंद का अधिकार, चुनने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
- सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, नवतेज के समय से लेकर अब तक हमारे समाज को व्यापक स्वीकृति मिली है. इसे हमारी यूनिवर्सिटी में स्वीकृति मिली है. हमारे विश्वविद्यालयों में अब सिर्फ शहरी बच्चे ही नहीं हैं, वे सभी क्षेत्रों से आते हैं. हमारे समाज ने समलैंगिक संबंधों को स्वीकार कर लिया है. पिछले पांच सालों में चीजें बदली हैं. एक स्वीकृति है जो शामिल है. हम इसके प्रति सचेत हैं.
- चीफ जस्टिस ने कहा कि वह पहले इस मामले को समझने के लिए याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनना चाहेंगे. दलीलें सुनने के बाद ही फैसला लिया जाएगा. इस पर मेहता ने कहा कि यह मामला पूरी तरह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है. हमने इस पर आपत्ति जताते हुए एक आवेदन दिया है कि क्या इस मामले में अदालतें दखल दे सकती हैं या ये सिर्फ संसद का एकाधिकार है?
सरकार की ओर से क्या कहा गया?
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि समलैंगिक विवाह पर संसद को फैसला लेने दीजिए. इस पर सीजेआई ने कहा कि हम इंचार्ज हैं और हम तय करेंगे कि किस मामले पर सुनवाई करनी है और किस तरह करनी है.
क्या है मामला?
दरअसल, दिल्ली हाईकोर्ट समेत अलग-अलग अदालतों में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग को लेकर याचिकाएं दायर हुई थीं. इन याचिकाओं में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के निर्देश जारी करने की मांग की गई थी. पिछले साल 14 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट में पेंडिंग दो याचिकाओं को ट्रांसफर करने की मांग पर केंद्र से जवाब मांगा था.
इससे पहले 25 नवंबर को भी सुप्रीम कोर्ट दो अलग-अलग समलैंगिक जोड़ों की याचिकाओं पर भी केंद्र को नोटिस जारी की था. इन जोड़ों ने अपनी शादी को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर करने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की थी. इस साल 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को एक कर अपने पास ट्रांसफर कर लिया था.
याचिकाओं में क्या है मांग?
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को डिक्रिमिनलाइज कर दिया था. यानी भारत में अब समलैंगिक संबंध अपराध नहीं हैं. लेकिन अभी भारत में समलैंगिक विवाह की अनुमति नहीं मिली है. ऐसे में इन याचिकाओं में स्पेशल मैरिज एक्ट, फॉरेन मैरिज एक्ट समेत विवाह से जुड़े कई कानूनी प्रावधानों को चुनौती देते हुए समलैंगिकों को विवाह की अनुमति देने की मांग की गई है.
- समलैंगिकों की मांग है कि अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार LGBTQ (लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर) समुदाय को उनके मौलिक अधिकार के हिस्से के रूप में दिया जाए. एक याचिका में स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग की गई थी, ताकि किसी व्यक्ति के साथ उसके सेक्सुअल ओरिएंटेशन की वजह से भेदभाव न किया जाए.
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
- केंद्र सरकार समलैंगिक विवाह की अनुमति देने के खिलाफ है. इस मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर सभी याचिकाओं को खारिज करने की मांग की थी. केंद्र ने कहा था, भले ही सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को डिक्रिमिनलाइज कर दिया हो, लेकिन इसका मतलब ये नहीं याचिकाकर्ता समलैंगिक विवाह के लिए मौलिक अधिकार का दावा करें.
- केंद्र ने समलैंगिक विवाह को भारतीय परिवार की अवधारणा के खिलाफ बताया है. केंद्र ने कहा कि समलैंगिक विवाह की तुलना भारतीय परिवार के पति, पत्नी से पैदा हुए बच्चों की अवधारणा से नहीं की जा सकती. कानून में उल्लेख के मुताबिक भी समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं दी जा सकती. क्योंकि उसमे पति और पत्नी की परिभाषा जैविक तौर पर दी गई है. उसी के मुताबिक दोनों के कानूनी अधिकार भी हैं. समलैंगिक विवाह में विवाद की स्थिति में पति और पत्नी को कैसे अलग-अलग माना जा सकेगा?
- कोर्ट में केंद्र ने कहा था, समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने से गोद लेने, तलाक, भरण-पोषण, विरासत आदि से संबंधित मुद्दों में बहुत सारी जटिलताएं पैदा होंगी. इन मामलों से संबंधित सभी वैधानिक प्रावधान पुरुष और महिला के बीच विवाह पर आधारित हैं.
भारत में समलैंगिकता अपराध नहीं
6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि समलैंगिकता अपराध नहीं है. उस समय कोर्ट ने कहा था कि समलैंगिकों के वही मूल अधिकार हैं, जो किसी सामान्य नागरिक के हैं. सबको सम्मान से जीने का अधिकार हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को निरस्त कर दिया था. जिसके बाद आपसी सहमति से दो समलैंगिकों के बीच बने संबंधों को अपराध नहीं माना जाता.