अंग्रेजों के ज़माने का एक कानून जो देश की आजादी के बाद पिछले 75 साल में नहीं बदला, क्या अब बदलेगा? हम बात कर रहे हैं राजद्रोह कानून की. सत्ता बदली, कई प्रधानमंत्री बदले लेकिन नहीं बदला तो राजद्रोह का ये कानून. 1870 में लागू हुए इस कानून को भारत के स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने के लिए लाया गया था. 152 साल पुराना ये कानून धीरे-धीरे सत्ता का हथियार बन गया. अब सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि अंग्रेजों के जमाने के कानून का आजाद भारत में क्या काम है? इस पर केंद्र सरकार की अपनी दलील है और विपक्ष के अपने अलग तीखे आरोप.
सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद अब सरकार भी ये मान रही है कि राजद्रोह के कानून को बदलने का समय आ गया है इसलिए इस कानून में बदलाव पर विचार किया जा रहा है. कानून मंत्री किरन रिजिजू अब राजद्रोह कानून में बदलाव का समर्थन कर रहे हैं. हालांकि इससे पहले केंद्र सरकार ने राजद्रोह कानून को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट से इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करने का अनुरोध किया था. सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख को देखते हुए अब सरकार ने राजद्रोह कानून में बदलाव का मन बना लिया है.
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सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में सरकार ने कहा है कि प्रधानमंत्री की धारणा है कि ऐसे समय में जब हमारा देश आजादी के 75 वर्ष का जश्न मना रहा है, हमें औपनिवेशिक बोझ को दूर करने की दिशा में काम करना चाहिए. उसी भावना के अनुरूप 2014-15 से अबतक 1500 से अधिक पुराने कानून खत्म किए जा चुके हैं. ये ऐसे कानून थे जो औपनिवेशिक मानसिकता को जन्म देते थे. आज के भारत में इनका कोई स्थान नहीं था. सुप्रीम कोर्ट के रुख को देख सरकार ने राजद्रोह कानून में बदलाव की बात तो कर दी लेकिन विपक्ष का सवाल है कि राजद्रोह कानून में बदलाव कब तक पूरे होंगे. इसे लेकर सरकार की तरफ से कोई समय सीमा नहीं दी गई है.
सॉलिसीटर जनरल ने कोर्ट में क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हम राजद्रोह कानून पर दोबारा विचार कर रहे हैं. आप सुनवाई टाल सकते हैं. याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल ने इस दलील का विरोध किया. सिब्बल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कानून की संवैधानिक वैधता को परख रहा है. कोर्ट की कार्यवाही इसलिए नहीं रोकी जा सकती कि सरकार उस पर विचार करने की बात कर रही है. इसके आगे कपिल सिब्बल ने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि हम जितनी जल्दी राजद्रोह कानून से छुटकारा पा लें, उतना अच्छा है. इस पर सॉलिसिटर जनरल ने पलटवार करते हुए कहा कि हम वही करने की कोशिश कर रहे हैं जो पंडित नेहरू तब नहीं कर सके थे.
सरकार भी मान रही बदलाव की जरूरत
राजद्रोह कानून में बदलाव की जरूरत है, ये बात अदालत भी मानती है और सरकार के साथ विपक्षी दल भी. इस कानून के इतिहास पर गौर करें तो अपने मूल स्वरूप में ही ये कानून बोलने की आजादी के खिलाफ बनाया गया था. ऐतिहासिक तथ्यों का जिक्र किया जाए तो इंग्लैंड में राजा एडवर्ड-1 के जमाने में स्टैच्यूट ऑफ वेस्टमिंस्टर 1275 को कोडिफाई किया गया था. उस वक्त इंग्लैंड में बोलने की आजादी पर नियंत्रण के कुछ प्रावधान किए गए थे. इसे राजद्रोह कानून का सबसे शुरुआती स्वरूप कहा जा सकता है. इसके बाद 1837 में ब्रिटिश राजनेता थॉमस मैकाले ने एक मसौदा तैयार किया लेकिन 1860 में जब IPC यानी इंडियन पीनल कोड बना तो उसमें राजद्रोह कानून को शामिल नहीं किया गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा- इस कानून की जरूरत नहीं
सवाल ये भी है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को ये क्यों कहना पड़ा कि देश को राजद्रोह कानून की जरूरत नहीं है. इसके लिए हमें 2016 से 2020 तक, यानी पांच साल में राजद्रोह कानून के तहत गिरफ्तारी और आरोप सिद्ध होने के आंकड़े को समझना होगा. साल 2016 में राजद्रोह कानून के तहत 73 लोगों को हिरासत में लिया गया. इनमें से सिर्फ 33 फीसदी लोगों पर ही आरोप सिद्ध हुआ. साल 2017 में सबसे ज्यादा कुल 228 लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनमें से सिर्फ 16.7 फीसदी केस सही पाए गए. इसी तरह साल 2018 और 2019 में 56 और 99 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किए गए लेकिन 2018 में 15.4 फीसदी और 2019 में सिर्फ 3.3 फीसदी लोगों के खिलाफ आरोप साबित हुए.
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इसी तरह साल 2020 में कुल 44 लोगों को हिरासत में लिया गया लेकिन आरोप 33.3 फीसदी लोगों के खिलाफ ही सिद्ध हो सके. आंकड़ों से साफ है कि राजद्रोह के केस दर्ज होने और आरोप सिद्ध होने के आंकड़ों में बड़ा फासला है. इससे ये भी संकेत मिलते हैं कि बड़ी संख्या में ऐसे केस अधूरी तैयारी के साथ दर्ज होते रहे होंगे. जब कुछ साबित नहीं होता तो ऐसे केस मुंह के बल गिरते हैं. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा.
क्या है राजद्रोह कानून?
आसान भाषा में समझें तो IPC की धारा 124 (A) के अनुसार, राजद्रोह एक अपराध है. राजद्रोह के अंतर्गत भारत में सरकार के प्रति मौखिक, लिखित या संकेतों और दृश्य रूप में घृणा या अवमानना या उत्तेजना पैदा करने के प्रयत्न को शामिल किया जाता है. हालांकि, इसके तहत घृणा या अवमानना फैलाने की कोशिश किए बिना की गई टिप्पणियों को अपराध की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाता. राजद्रोह गैरजमानती अपराध है. राजद्रोह के अपराध में तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और इसके साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है. इस कानून के तहत आरोपी व्यक्ति को सरकारी नौकरी करने से रोका जा सकता है.
कैसे अस्तित्व में आया राजद्रोह कानून
देश में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाजें तेज होने लगीं तो यहां वायसराय की एग्जिक्यूटिव काउंसिल के सदस्य जज जेम्स स्टीफन ने 1870 में IPC में संशोधन करवाकर राजद्रोह की धारा 124(ए) को शामिल कराया था. उसके बाद इस कानून का इस्तेमाल भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और भारतीय नेताओं के खिलाफ किया जाने लगा. शहीद भगत सिंह, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू सहित तमाम स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ अंग्रेजों ने इस कानून के तहत केस चलाया. शायद यही वजह रही होगी कि आजादी के बाद संविधान के निर्माण के समय 1948 में केएम मुंशी ने एक प्रस्ताव पेश किया और मूल संविधान से राजद्रोह शब्द हटा दिया गया. 26 नवंबर 1949 को जब देश का संविधान तैयार हुआ तो उसमें राजद्रोह शब्द नहीं था. हालांकि, IPC में सेडिशन का आर्टिकल 124 (ए) तब भी मौजूद रहा.
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देश की आजादी के बाद जब सरकार को महसूस होने लगा कि बोलने की आजादी पर कंट्रोल जरूरी है, तब 1951 में जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने पहला संविधान संशोधन किया. आर्टिकल 19 (2) के संशोधित प्रावधान लागू किए गए जिसमें बोलने की आजादी की छूट को सीमित करके कुछ और शर्तें जोड़ दी गईं. इनमें पब्लिक ऑर्डर, विदेशों से रिश्ते, अपराध के लिए उकसाने जैसी बातों को राजद्रोह कानून के दायरे में ले आया गया. 1971 में विधि आयोग ने जो 43वीं रिपोर्ट दी थी, उसमें सरकार, संविधान, विधायिका, न्यायपालिका सबको इसके दायरे में लाने की सिफारिश कर दी थी लेकिन तब कानून में बदलाव नहीं हुआ.
1951 में दर्ज हुआ था राजद्रोह का पहला मामला
देश की आजादी के बाद राजद्रोह का पहला केस साल 1951 में दर्ज हुआ था. 1951 में कट्टर सिख नेता तारा सिंह गोपीचंद ने करनाल और लुधियाना में भाषण दिए थे. उनके भाषणों के बाद उन पर राजद्रोह का केस कर दिया गया. उन्होंने देश के विभाजन का विरोध किया था और साथ ही ये भी कहा था कि अगर पाकिस्तान बनता है तो अलग पंजाब भी बनना चाहिए. तारा सिंह गोपीचंद बनाम स्टेट का ये केस 1951 में हाईकोर्ट तक गया. पंजाब हाईकोर्ट ने तब कहा था कि आईपीसी का सेक्शन 124 (ए) साफ तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध है और इसके प्रावधान संविधान के आर्टिकल 19 के तहत मिले अधिकारों के खिलाफ हैं. पंजाब हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद 1951 में ही पहला संविधान संशोधन किया गया और कुछ शर्तें जोड़ी गईं. इन शर्तों को इसलिए जोड़ा गया कि अभिव्यक्ति की आजादी को कुछ स्थितियों में सीमित किया जा सके.
कैसे राजनीतिक हथियार बन गया ये कानून
साल 1974 में बड़ा बदलाव हुआ और इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने अंग्रेजों के जमाने की CrPC 1874 की जगह CrPC 1973 लागू कर दिया. इसमें 124(ए) के तहत किए गए अपराध को संज्ञेय अपराध बना दिया गया. इसका नतीजा ये हुआ कि पुलिस को बिना वारंट के भी आरोपी को गिरफ्तार करने का अधिकार मिल गया. इसके बाद तो इस कानून का इस्तेमाल राष्ट्र की सुरक्षा और एकता की रक्षा की बजाय राजनीतिक हथियार के रूप में होने लगा. अंग्रेजों ने अपने ही बनाए इस कानून को 2009 में खत्म करने का फैसला किया. 2010 में इसे खत्म भी कर दिया लेकिन भारत में इसी कानून का और सख्त रूप आज तक लागू है.
क्या है केदारनाथ बनाम बिहार राज्य का मामला
केंद्र सरकार ने एक हलफनामा दायर कर सुप्रीम कोर्ट में केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के मामले का उल्लेख किया था और ये कहा था राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार की कोई जरूरत नहीं है. आइए जानते हैं कि ये मामला क्या है जिसमें आए फैसले की नजीर सरकार ने कोर्ट में दी. साल 1953 में फॉरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य केदारनाथ सिंह ने बिहार के बेगूसराय में एक जोरदार भाषण दिया था. राज्य की कांग्रेस सरकार के खिलाफ दिए उनके भाषण के लिए राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया. उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर कालाबाजारी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे.
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केदारनाथ ने अपने भाषण में कहा था, 'हमने अंग्रेजों को तो गद्दी से उखाड़ फेंका लेकिन कांग्रेस के गुंडों को चुन लिया. हमें इस सरकार को भी उखाड़ फेंकना होगा. एक और क्रांति जरूरी है जिसमें इन घूसखोरों और जमाखोरों को उखाड़ फेंकना होगा. तभी मेहनतकश और वंचितों का राज कायम होगा.' इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने अपने आदेश में कहा था कि सरकार की आलोचना या फिर प्रशासनिक कार्य पर टिप्पणी भर से किसी के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा नहीं बनता. कोर्ट ने कहा था कि राजद्रोह के मामले में हिंसा को उकसावा देने का तत्व मौजूद होना चाहिए, महज नारेबाजी नहीं. सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में ये भी कहा था कि राजद्रोह कानून का इस्तेमाल विशेष परिस्थिति में ही किया जा सकता है, खासकर जब देश की सुरक्षा और संप्रभुता खतरे में हो.
हर सरकार पर लगते रहे हैं दुरुपयोग के आरोप
राजद्रोह कानून के दुरुपयोग के आरोप देश की हर सरकार पर लगते आए हैं लेकिन पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई एक याचिका पर ये बहस और तेज हो गई. सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए तब कहा था कि देशद्रोह कानून का अंधाधुंध इस्तेमाल बढ़ई के हाथ में उस आरी की तरह है जो पेड़ की जगह पूरे जंगल को काट देती है.
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि दुर्भाग्य की बात है कि इस कानून को आजादी के 75 साल बाद तक जारी रखा गया है. सरकार कई अप्रचलित कानूनों को खत्म कर रही है. हम नहीं जानते कि वो इस कानून को क्यों नहीं देख रही है? इस कानून का जारी रहना संस्थानों के कामकाज और व्यक्तियों की स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है.
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद हमलावर हुई कांग्रेस
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद कांग्रेस ने राजद्रोह के मामले पर केंद्र सरकार को घेरना शुरू कर दिया. पिछले साल पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिंदबरम ने ट्वीट कर सरकार पर आरोप लगाया था कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद भी सरकार राजद्रोह कानून को निरस्त करने का कोई प्रस्ताव नहीं ला रही है. इस पर कानून मंत्री किरन रिजिजू ने कांग्रेस पर राजद्रोह कानून के गलत इस्तेमाल का आरोप तब भी लगाया था और आज भी लगा रहे हैं. कुल मिलाकर पिछले 75 साल में हर सरकार पर राजद्रोह कानून के दुरुपयोग के आरोप लगते आए हैं लेकिन अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है. इसलिए इसमें बदलाव की चर्चा शुरू हो गई है. हालांकि ये बदलाव कब तक होंगे, इसका जवाब सरकार को देना है.
सरकार को खोजना होगा कोर्ट के सवालों का जवाब
राजद्रोह कानून पर सुनवाई करते हुए 10 मई को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से तीन सवाल पूछे. चीफ जस्टिस एनवी रमना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि राजद्रोह कानून के मामले में कोर्ट ने नौ महीने पहले नोटिस जारी किया था. सरकार ने अब हलफनामा दिया है. आखिर आप कितना समय लेंगे? दूसरा सवाल ये था कि राजद्रोह के जो केस लंबित हैं और भविष्य में जो केस दर्ज किए जाने वाले हैं, उन पर अपना रुख स्पष्ट करें. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी पूछा कि जब तक केंद्र सरकार राजद्रोह कानून पर दोबारा विचार कर रही है. तब तक इस कानून को स्थगित क्यों नहीं रखा जा सकता? अब सरकार को इन सवालों के जवाब ढूंढने हैं. इनमें सबसे मुश्किल सवाल राजद्रोह कानून में बदलाव की समय सीमा को लेकर है.