बीते महीने हुए सिलक्यारा सुरंग हादसे पर जांच जारी है और जल्द ही इसका कारण सामने आ जाएगा कि आखिर सुरंग कैसे ढही और 41 मजदूर कैसे फंस गए. वहीं सरकारी अधिकारियों ने मीडिया को बताया कि, उत्तरकाशी की इस सिल्क्यारा परियोजना के लिए ऐसा कोई जरूरी नहीं है कि, इस स्थान पर एक एस्केप सुरंग का अनिवार्य रूप से निर्माण किया जाए.
अधिकारियों ने कहा कि इस तरह के प्रावधान की कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि इस एक ट्यूब को एक डिवाइडर वॉल के जरिए दो परस्पर जुड़े गलियारों में बांटा गया है. एक हिस्सा किसी भी आपातकालीन स्थिति में एस्केप सुरंग के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है. क्योंकि डिवाइडर की दीवार में दूसरी तरफ जाने के लिए हर 500 मीटर पर 'निकास द्वार' होंगे. उन्होंने कहा कि आग लगने या किसी अन्य आपात स्थिति में वाहनों और यात्रियों से बाहर निकलने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भागने की सुरंग या भागने का मार्ग, ऑपरेशन शुरू होने के बाद काम में आता है.
अधिकारी ने आगे कहा कि सड़क सुरंगों पर अंतर्राष्ट्रीय मानक ईयू निर्देश के अनुसार, एक अलग एस्केप सुरंग अनिवार्य होने का कोई विशेष उल्लेख नहीं है. सुरक्षित क्षेत्र के लिए एक अलग भागने का मार्ग पर्याप्त माना जाता है. सीमा सड़क संगठन के अतिरिक्त महानिदेशक आर के धीमान के नेतृत्व में विशेषज्ञ समिति, एडीशनल डीजी, बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन, प्रोफेसर केएस राव, IIT Delhi, प्रोफेसर एके श्रीवास्तव, दिल्ली टेक्नॉलॉजिकल यूनिवर्सिटी और इंडियन रेलवे के अधिकारी ने साइट का दौरा पूरा कर लिया है, जल्द ही अंतिम रिपोर्ट सौंपेंगे.
यहां तक कि संसद में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के एक सवाल के जवाब में कि क्या सरकारी दिशानिर्देश 1.5 किमी से अधिक लंबी सुरंगों के लिए आपातकालीन निकास की सिफारिश करते हैं, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने बुधवार को कहा कि ऐसी कोई सिफारिश नहीं है. भारतीय सड़क कांग्रेस के दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा, "भूमि की उपलब्धता, यातायात की मात्रा, सुरंग की लंबाई और जैसे विभिन्न कारकों को ध्यान में रखते हुए, यातायात सुरंगों के नजदीक एक अलग सर्विस टनल पर डिजाइन चरण में विचार किया जा सकता है."
Report: चेतन भूटानी