श्रीराम 14 वर्षों के बाद अयोध्या लौटे. भरत ने पैरों पर गिरकर उनका स्वागत किया. कुलगुरु ने श्रीराम का राज्य अभिषेक किया और समूची अयोध्या जय सियाराम के उद्घोष से गूंज उठी. दीपों से जगमगाती अयोध्या, नाचती-गाती खुशियां मनाती अयोध्या, ढोल-ताशे बजाती अयोध्या और अपने राम की रामधुन में डूबती जाती अयोध्या... अहा! इस दृश्य के क्या कहने... विश्वास ही नहीं होता कि इतना सब कुछ जो इन आंखों के आगे हो रहा था, वह सिर्फ 100*60 के एक मंच पर हो रहा था.
समझना मुश्किल हो गया कि नेपथ्य में बजते 'जय राम रमा रमनं समनं' पर खड़े होकर झूम रही भीड़ उन दर्शकों की है, जो सिर्फ एक नृत्य नाटिका देखने आए थे या फिर इस समूची दर्शक दीर्घा को ही इस नृत्यनाटिका में अयोध्या वासी बनने का किरदार दे दिया गया था. ये सब कुछ श्रीराम भारतीय कला केंद्र के यशस्वी कलाकारों की कलासिद्धि और उसकी सार्थकता ही थी कि उन्होंने लगभग तीन घंटे के अपने जादुई प्रदर्शन में भक्ति की शक्ति का वो सुंदर रूप प्रस्तुत किया कि, जब दर्शकों की आंखें एक लंबे समय बाद घुप्प अंधेरे से उजाले में खुलीं तो उन आंखों में 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का सूत्रवाक्य आकार ले रहा था. अब किसी का कोई और परिचय था ही नहीं, वहां हर बाला सीता थी और हर बच्चा राम था. 'सिया राम मैं सब जग जानी...' को मंच पर एक नाटिका के जरिए जीवंत होते देखा जा सकता था.
श्रीराम के पूरे जीवन चरित का मंचन
नाटिका, जो श्रीराम और देवी सीता का पूरा जीवन चरित है. जो मंच पर काव्य रूप में गाई जाने वाली नृत्य की विभिन्न भाव भंगिमा के साथ प्रस्तुत की जाने वाली एक लयबद्ध गाथा है. गाथा... जो सार्थक करती है बाबा तुलसी की वो बात, जिसमें उन्होंने कहा था, 'हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहि सुनहिं बहु बिधि सब संता.' यानि कि हरि (श्रीराम) अनंत हैं और इसी तरह उनकी गाथा भी अनंत है, जिसे संत अलग-अलग तरीकों से कहते हैं. यहां रामकथा को अलग-अलग तरीकों से कहे जाने की बात पर जोर दिया गया है. सदियों से रामकथा हर रूप में सामने आती रही है. कोई इसे कहानी की तरह सुना रहा है. कोई गीत की तरह गुनगुना रहा है, कोई कैनवस पर इसके रंग बिखेर रहा है, किसी ने इसे अभिनय तो किसी ने इसे नटनर्तन का विषय बना लिया है.
नृत्य नाटिका के जरिए रामकथा का मंचन
श्रीराम भारतीय कला केंद्र ने भी रामकथा को नृत्य नाटिका में तब्दील किया है और वह हर रोज इस ओपन थियेटर वाले मंच पर इसका प्रदर्शन कर रहे हैं. बीते 3 अक्टूबर से शुरू हुआ ये 'महायज्ञ' आनी वाली 26 अक्टूबर तक जारी रहने वाला है. शाम 6 बजते-बजते मंडी हाउस के कॉपर्निकस मार्ग पर भीड़ जुटने लगती है और 6:30 बजते-बजते दर्शक दीर्घा में कला के कद्रदान जुट जाते हैं. फिर तो 'श्री राम चंद्र कृपालु भजमन...' का जो कीर्तन गान शुरू होता है, वह तकरीबन रात के सवा 9 बजे तक 'सियावर राम चंद्र की जय' के उद्घोष में बदल जाता है.
लव-कुश की कथा से शुरू होती है कहानी
'राम राज बैठे त्रैलोका, हर्षित भए गये सब सोका' का असल मतलब क्या है, इसे जानना-समझना है तो आपको भी श्रीराम भारतीय कला केंद्र की उसी दर्शक दीर्घा का हिस्सा बनना होगा, जो लवकुश के साथ राम धुन गाती है और रामकथा सुनते-सुनते जिसकी आंखें भर आती हैं. फिर यही भीड़ देवताओं की कतार के साथ बैकुंठ पहुंचती है और उनके साथ 'जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता । गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता.' गाते हुए, नृत्य करते हुए महाविष्णु को नींद से जगाती है. उनसे धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेने की प्रार्थना करती है.
राम जन्म, ताड़का वध, अहिल्या उद्धार, सिया स्वयंवर का भावपूर्ण मंचन
रामकथा के इस अनूठे आयाम को समझने के लिए आपको दर्शकों की उस कतार का हिस्सा होना होगा, जो अयोध्या में राम जन्म होने पर बधाई गीत पर झूमती है. उनके साथ 'गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्प काल विद्या सब पायी.' का साक्षी बनती है और फिर अगले ही पल यही दर्शक दीर्घा विश्वामित्र ऋषि के साथ राम-लखन को लेकर वन में चली जाती है. ताड़का वध, अहिल्या उद्धार, धनुष यज्ञ, सिया स्वयंवर, धनुष भंग, विवाह जैसी लीलाओं को इन्हीं आंखों से देखती है. आंखें जो धनुष भंग देखकर हर्षित हो जाती हैं तो यही आंखें सीता की विदाई का गीत सुनकर जनक जी के साथ रो पड़ती हैं. दृष्य न बदलता तो विचार और भाव न जाने कब तक मिथिला में ही रुके रह जाते.
पल में शृंगार रस, पल में वियोग... कथा के आयाम से बदलता है नृत्य का भाव
नाटिका में बड़ा भाव परिवर्तन तब होता है, जब मंथरा की कुटिल बुद्धि कैकेयी पर छा जाती है. यहां नृत्य और छंद का ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है कि आप वाह करें या आह, मन और बुद्धि में इसे लेकर संग्राम सा छिड़ जाता है. क्रोधरस का स्थायी भाव धीरे-धीरे करुण रस में तब्दील हो जाता है. दशरथ की एंट्री तो शृंगार रस के साथ होती है, लेकिन पल भर में इस शृंगार को वियोग का गीत छिन्न-भिन्न कर देता है.
राम वनगमन देख, दर्शकों की भी भर आई आंखें
यहां दीपक का हल्का होकर धीरे-धीरे बुझ जाना एक रूपक है. जैसे आत्मा धीरे-धीरे शरीर छोड़ती है, जैसे अंधकार धीरे-धीरे प्रकाश को निगल लेता है और जैसे तेज लहरें, बांध के किनारे को धीरे-धीरे करके काट डालती हैं. इसी तरह राम, भाई लखन और पत्नी सीता सहित वन को चले गए. जैसे अयोध्या वहीं की वहीं स्तब्ध खड़ी रह गई, दर्शक भी वहीं जम से गए. जो अब तक हर दृष्य पर ताली बजाकर उस प्रस्तुति की महिमा का बखान कर रहे थे, वन गमन देखकर उनकी बुद्धि कुंद पड़ गई. वह क्या कहें और क्या करें कि स्थिति में चले गए. जैसे कि मंच पर नृत्य थम सा गया और सिर्फ करुण रस भरा राग शेष रहा, दर्शक भी रुक से गए.
भरत मिलाप ने किया भाव विभोर
पर यह नाटक का सबसे उच्च आयाम नहीं था. अभी तो कई दृष्य ऐसे बाकी थे, जिनमें दृष्टि की यही स्थिति होने वाली थी. भरत जब वन में राम को मनाने पहुंचते हैं तो दोनों भाइयों के बीच का प्रेम एक बार फिर हमें विभोर कर देता है. फिर आंखें तुरंत हमें हमारी गिरहबान में झांकने को कहती हैं. कहती हैं कि रामकथा को आदर्श मानने वाले, क्या तुममें है कोई भरत से स्नेही, क्या तुम करते हो अपने बड़े भाई का ऐसा मान-ऐसा सम्मान? क्या तुमने दिया है छोटों को ऐसा प्यार? अगर रामकथा देखते -सुनते ये सवाल आपको नहीं झकझोरते हैं तो यकीन मानिए कि आप सनातनी नहीं, धार्मिक नहीं, रामकथा के आदर्श के उपासक नहीं, आप भक्त नहीं, आप असल में भारतीय ही नहीं.
रामकथा के मंचन का अलग ही उत्साह
मेरे ठीक पीछे एक जर्मन दंपति अपने छोटे से परिवार के साथ थे. राम दरबार के सज जाने पर जब जय श्रीराम का उद्घोष हुआ तो उनके 10 वर्षीय बेटे ने भी बड़े उत्साह से हाथ उठाकर कहा, जॉय स्रीराम... मैं सहसा पीछे मुड़ा तो उसके पिता मुझे देखकर मुस्कुराए. मैंने उनसे पूछा, आपको ये कैसा लगा? उन्होंने कहा... स्पीचलेस... रियली रियली माइंड ब्लोइंग, और उन्होंने श्रद्धा से हाथ जोड़कर सिर झुका लिया.
1957 से लगातार हो रहा है लीला का मंचन
आपको यकीन नहीं होगा, नवरात्रि के इस पावन समय में देशभर के गली-मुहल्लों तक में रामलीलाएं हो रही हैं, इस बीच राजधानी दिल्ली के दिल में एक मंच ऐसा भी है जिस पर बीते सात दशकों से श्रीराम कथा सुनाई, दिखाई और गाई जा रही है. 1952 में इस प्रस्तुति के विचार का बीज बोया गया और जब 1957 में पहली बार श्रीराम नृत्य नाटिका का जो अंकुर फूटा तो वह आज एक बड़े छतनार में विकसित हो चुका है और साल दर साल पुष्पित-पल्लवित हो रहा है.
नवरस, नवताल, नृत्य और छंद की विधा का अनूठा संगम है नाटिका
यह भावपूर्ण मंचन न सिर्फ रामकथा की आत्मा को संजोए हुए है, बल्कि इसके साथ नवरस, नवलय, नवताल, नवनृत्य और छंद की प्राचीन विधा भी सुरक्षित-संरक्षित हो रही है. ये एक जरिया भी है, जिससे मयूरभंज छऊ और कलरिपयट्टू जैसी प्राचीन मार्शल आर्ट वाली नृत्य विधाएं लुप्त होने से न सिर्फ बची हैं बल्कि बड़ी आसानी से पीढ़ी दर पीढ़ी समय के नए कर्णधारों को विरासत के तौर पर मिल रही हैं.
क्या कहते हैं कलाकार?
नृत्य नाटिका में श्रीराम का किरदार निभाने वाले कलाकार राजकुमार शर्मा बताते हैं कि यह नृत्यनाटिका महज ढाई घंटे का एक शो नहीं है, बल्कि जीवन दर्शन है. वह कहते हैं कि 25 सालों से श्रीराम के रूप में उन्हें दर्शकों का प्रेम मिल रहा है और यह रामकृपा ही है कि इसमें कभी कोई बाधा नहीं आती है, बल्कि साल-दर-साल यह नाटिका और परिष्कृत होती जा रही है. सिर्फ नाटिका की प्रस्तुति ही नहीं बल्कि यहां नजर आ रही हर एक बारीकी और खूबसूरती इससे जुड़े कलाकारों की ही देन है. इसमें उनका खुद का ही श्रम समाहित है. नाटिका की कोरियाग्राफी भी राजकुमार शर्मा खुद करते हैं.
मंच सज्जा, वस्त्रसज्जा, रूप सज्जा सभी में कलाकारों का योगदान
उनकी इसी बात को सीता का किरदार निभा रहीं ऋतुपर्णा दास और विस्तार से बताती हैं. वह कहती हैं कि मैं जब से इस नाटिका से जुड़ी हूं और लगभग 10 सालों का एक लंबा समय हो चला है तो मैं पाती हूं कि हमपर सिर्फ रामकथा कहने भर की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसके साथ ही हम भारतीय शास्त्र परंपरा की एक विधा को भी जीवित रख रहे हैं. यह शास्त्र भरत मुनि की नाट्यविधा से निकलता है. जिसमें नृत्य का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. इसके अलावा मंच सज्जा, वस्त्रसज्जा, रूप सज्जा यह भी नाटक से जुड़ी विधा हैं, जो हमें सिखायी जाती हैं. वह बताती हैं कि ये गहने खुद कलाकारों ने बनाए हैं. ये मोतियों की माला, ये मुकुट, ये बाजूबंद, मांगटीका सभी कुछ वैसा बनाने की कोशिश की गई है, जैसा संस्कृतियों और सभ्यताओं में वर्णन है. इसमें प्राचीनता के साथ-साथ देशज की मौजूदगी का खूब ख्याल रखा गया है.
रावण के किरदार में कथकली नृत्य की झलक
रावण का किरदार निभा रहे घनश्याम खिंची कहते हैं कि उन्होंने तो इस नृत्य नाटिका के साथ 4 दशकों का लंबा जीवन जी लिया है. अब तो यह नाटिका नहीं उनका जीवन बन गई है. घनश्याम बनारस घराने की नृत्य परंपरा से ताल्लुक रखते हैं और खुद भी कत्थक, कथकली और छऊ नृत्य के परंपरागत नर्तक हैं. नृत्यपरंपरा का उनका ये ज्ञान रावण की भूमिका करने में उनके लिए सहयोगी भी सिद्ध होता है. दरअसल पूरी नाटिका के दौरान जब रावण व अन्य राक्षसों के युद्ध वाले दृष्य दिखाए जाते हैं तो उसकी खूबसूरती कथकली नृत्य ही है. कथकली नृत्य करने वाले कलाकार के चेहरे पर भाव के अनुसार भारी रंगीन मेकअप होता है. रावण की दक्षिण भारतीय परंपरा दिखाने के लिए ऊंचा मुकुट, भारी कुंडल भी उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बनते हैं. इसके बाद मंच पर कथकली नृत्य के जरिए युद्ध का जो रंग निखरकर आता है, ऐसा लगता है कि वाकई आप रणभूमि में हैं.
नाटिका के भाव को शब्द देते हैं अलग-अलग प्रकृति के शास्त्रीय राग
घनश्याम अपनी रूप सज्जा खुद ही करते हैं. इसके लिए प्राकृतिक लेप जैसे हल्दी, चंदन, पीला सिंदूर और प्राकृतिक काजल का इस्तेमाल होता है. वह बताते हैं कि नाटिका के सभी किरदार रूपसज्जा खुद करते हैं और इसमें एक-दूसरे की मदद भी करते हैं. कलाकार इतने पारंगत हो चुके हैं कि एक एंट्री के बाद ही दूसरी एंट्री के लिए भी तुरंत ही रूप सज्जा कर लेते हैं. एक बार नाटिका जो शुरू हुई फिर तो मृदंग की थाप के साथ पैरों की चाप संतुलन बनाती जाती है और जैसे-जैसे उंगलियों में हलचल होती, आंखों की पुतलियां तक उसी इशारों में घूम जाती हैं. इनके साथ ही राग का सामंजस्य... भक्ति रस है तो राग पीलू और तिलंग. आह्लाद है तो भूपाली और खमाज, करुणा, वियोग और विषाद तो राग भैरव-भैरवी, जब जैसी प्रकृति तब वैसा राग और वैसे ही भाव.
जटायु की मृत्यु नाटिका में करुण रस का उच्चतम बिंदु
राजकुमार शर्मा बताते हैं कि वैसे तो हर दृष्य ही अपने आप में अद्भुद हैं, लेकिन जब जटायु रावण से लड़ते-लड़ते गिर जाता है और फिर श्रीराम की बांहों में दम तोड़ देता है तो ये दृष्य ऐसा है कि जब सेकेंड की कुछ गिनती तक सारे स्वर थम जाते हैं, सारा नृत्य रुक जाता है. सब स्थिर हो जाता है. ये कुछ पल मानव संस्कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं, जो बताते हैं कि हम इतिहास में इतनी समृद्ध व्यवस्था वाले रहे हैं, जहां प्रकृति के हर हिस्से और किस्से से हमारा जुड़ाव रहा है. ये हमारा इतिहास है जो हमें वर्तमान में भी इतना ही उन्नत बनने की प्रेरणा देता है.
अद्भुद है 'श्रीराम' नृत्य नाटिका का इतिहास
इतिहास की बात निकली है तो इस नृत्य नाटिका के इतिहास को भी जान लेते हैं. श्रीराम भारतीय कला केंद्र की चेयरपर्सन और पद्मश्री से सम्मानित शोभा दीपक सिंह, जो इस नृत्य नाटिका की भी निर्माता और निर्देशक हैं, वह बताती हैं कि 'उनकी मां, सुमित्रा चरत राम, ने 1952 में श्रीराम भारतीय कला केंद्र की स्थापना की थी. 1957 में उन्होंने ही रामकथा पर आधारित इस नृत्य रामलीला की शुरुआत की थी. मैं अपनी मां के साथ हमारे घर के बेसमेंट में रिहर्सल देखा करती थी, जहां इंदिरा गांधी भी अक्सर हमारे यहां आती थीं. पहले यह प्रस्तुति फिरोज शाह कोटला के मैदान में होती थी और मुझे याद है कि पंडित नेहरू ने कोटला मैदान में ही इसके पहले शो का उद्घाटन भी किया था.' इसके बाद साल 1969 से वह व्यक्तिगत तौर पर इससे जुड़ी हैं और लगातार इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं.
कभी बांस के टुकड़ों से बनाए थे आभूषण, नाटिका में आज भी कायम है परंपरागत विधाएं
एक मीडिया रिपोर्ट में वह कहती हैं कि, हम कई महीने पहले से इसकी तैयारी शुरू कर देते हैं. ये तैयारी सिर्फ नाटक के रिहर्सल तक सीमित नहीं है, बल्कि सेट तैयार करने जैसे काम भी शामिल हैं. किरदारों के पोशाक लोगों पर सबसे पहले असर डालते हैं. हम सभी ने मिलकर बांस के टुकड़ों को घिसकर, कभी उन्हें रंग-रोगन करके सुंदर-सुंदर आभूषण बनाए हैं. जैसे बाजूबंद और करधनियां, फूल और ठप्पे. शूर्पणखा की नाक पर घाव दिखाने के लिए चुइंगगम लगाकर प्रयोग किया है. हथियार, तीर-कमान, तलवार के साथ प्रयोग किए हैं. राजकुमार शर्मा बताते हैं कि अब तो नई-नई टेक्निक आ गई हैं फिर भी हमने नाटिका में कई जगहों पर परंपरा को कायम रखा है. बेशक पर्दे की जगह अब एलईडी स्क्रीन ने ले ली है, लेकिन फिर भी दृष्य बदलने के लिए हम घुमावदार बड़े-बड़े पल्लों का प्रयोग करते हैं, जिनमें चित्रकारों ने अपनी जादुई कूचियों से रंग भरे हैं.
दर्शक भी बन जाते हैं नाटिका का हिस्सा
शोभा दीपक सिंह ने सेट, एनिमेशन, कपड़े और आभूषणों का पुनर्निर्माण और डिज़ाइन भारतीय शिल्प कौशल के अनुसार ही किया है. जो परंपरा को आधुनिकता के बीच एक पुल की तरह स्थापित है. इस बारे में शोभा दीपक सिंह कहती हैं, "श्री राम’ केवल रामायण का पुनर्कथन नहीं है. यह एक शैक्षिक उपकरण है, पीढ़ियों के बीच एक सामान्य संबंध और नृत्य, कविता, और डिजाइन में भारतीय प्रतिभा को पुष्पांजलि है. हर वर्ष यह देखना संतोषजनक होता है कि कैसे दर्शक इस कथा का हिस्सा बनते हैं और प्राचीन शिक्षाओं को आधुनिक प्रासंगिकता के साथ जोड़ते हैं.”
कई राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री रह चुके हैं नाटिका में अतिथि
1957 में अपनी शुरुआत के बाद से, इसके प्रदर्शन ने 10 लाख से अधिक दर्शकों को आकर्षित किया है, और अमूमन भारत के हर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने विरासत के संरक्षण के इस प्रयास को सराहा है. कला केंद्र की वीथिका (गैलरी) में उनकी तस्वीरें इस नाटिका के समृद्ध इतिहास की गवाही हैं. इसी साल श्रीराम मंदिर के उद्घाटन अवसर पर अयोध्या में 'श्रीराम' नृत्य नाटिका की विशेष प्रस्तुति दी गई थी.
मंच पर होने वाला अभिनय भर नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक यात्रा है नाटिका
कुल मिलाकर यह नृत्य नाटिका सिर्फ मंच पर होने वाली एक अभिनय गतिविधि नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक यात्रा है. जिसमें विरासत को संभालने की प्रतिबद्धता है. इसमें संस्कृति के प्रति आदर है और हर घर को रामायण जैसा आदर्श परिवार बनाने का संकल्प है. यह एक युक्ति भी है, जिससे एक ही मंच पर भरतनाट्यम, कत्थक, कथकली, छऊ और कलरियपट्टू जैसी विधाओं के दर्शन का सुख है और सुख इस बात का है कि रामकथा भी न सिर्फ जीवित है, बल्कि जीवंत है जिसके किरदार बीते 67 सालों से 'सत्यमेव जयते' का गान कर रहे हैं. क्या आप इस समूह गान का हिस्सा नहीं बनना चाहेंगे?