अगले कुछ दिनों में पराली जलाने की घटनाओं में तेजी आने की संभावना को देखते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पराली जलाने वाले किसानों पर जुर्माना दोगुना कर दिया है. संशोधित जुर्माना 5,000 रुपये से लेकर 30,000 रुपये प्रति घटना तक है, जो कि अपराधी के खेत के आकार पर निर्भर करता है.
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (EPA), 1986 में “कमजोर” दंड का जिक्र करते हुए इसकी खूब आलोचना की थी. इसके बाद केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने दिल्ली और आसपास के इलाकों में खराब होती हवा की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में कदम उठाते हुए पराली जलाने पर जुर्माना दोगुना कर दिया.
जुर्माना हुआ दोगुना
उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली सरकार इन नियमों को तत्काल प्रभाव से लागू करेगी. बुधवार को अधिसूचित नियमों में स्पष्ट किया गया है कि दो एकड़ से कम कृषि भूमि वाले किसानों को पराली जलाते हुए पाए जाने पर प्रति घटना 5,000 रुपये का जुर्माना देना होगा. पहले यह जुर्माना 2500 का था. वहीं 2 से 5 एकड़ तक जो जुर्माना पहले 5 हजार का था उसे अब 10 हजार कर दिया गया है. इसके अलावा जिनके पास पांच एकड़ से ज़्यादा ज़मीन है, उन्हें प्रति घटना 30,000 रुपये का भुगतान करना होगा, पहले यह 15000 था.
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वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग वसूलेगा जुर्माना
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को नियमों के तहत गलती करने वाले किसानों पर जुर्माना (पर्यावरण मुआवजा) लगाने का अधिकार दिया गया है. आयोग ने गुरुवार को दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकारों द्वारा नियुक्त सभी नोडल/पर्यवेक्षी अधिकारियों को संशोधित दरों के अनुसार जुर्माना लगाने और वसूलने के लिए अधिकृत किया है.
अगर किसी किसान को पराली जलाते हुए पाया जाता है, तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा और उसे 30 दिनों के भीतर भरना अनिवार्य होगा. उल्लंघन करने वालों को जुर्माना या तो नकद या डिमांड ड्राफ्ट के रूप में या इलेक्ट्रॉनिक मोड के माध्यम से संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या प्रदूषण नियंत्रण समितियों के खाते में "चालान की तारीख से 30 दिनों के भीतर" जमा करना होगा.
6 राज्यों में 4 लाख केस
चालू धान कटाई के मौसम में पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है, लेकिन अभी भी यह छह राज्यों में चार लाख मामलों के करीब पहुंच गया है. एक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब से सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं, जहां 74% से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं. 6 राज्यों में दर्ज किए गए 400,461 मामलों में से पंजाब में 296,670 मामले दर्ज किए गए, उसके बाद मध्य प्रदेश में 50,242 मामले दर्ज किए गए.
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कंसोर्टियम फॉर रिसर्च ऑन एग्रोइकोसिस्टम मॉनिटरिंग एंड मॉडलिंग फ्रॉम स्पेस (CREAMS) के अनुसार, चालू सीजन की शुरुआत से पहले, पंजाब में पराली जलाने के 75% से अधिक मामले दर्ज किए गए थे. कुल 387,946 मामलों में से 291,629 मामले पंजाब में दर्ज किए गए थे. चालू सीजन में कम पराली जलाने के मामलों के साथ, पंजाब ने अपना हिस्सा 1% कम कर दिया है. CREAMS द्वारा 15 सितंबर से 30 नवंबर तक सैटेलाइट डेटा का उपयोग करके पराली जलाने को रिकॉर्ड कर रहा है.
पंजाब और हरियाणा को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में वायु गुणवत्ता खराब होने की वजह से विभिन्न एजेंसियों की आलोचना का सामना करना पड़ा है, लेकिन हरियाणा में मध्य प्रदेश की तुलना में पराली जलाने के कम मामले दर्ज किए गए हैं, जो 24,361 है.
सियासी वजह से रद्द हो जाता है मामला और जुर्माना
दरअसल पराली जलाने पर पेनाल्टी का प्रावधान तो पहले भी था लेकिन फिर भी मामलों में उतनी कमी नहीं आई जितनी उम्मीद की जा रही थी. केंद्र सरकार ने जो फैसला लिया उससे कितना फायदा होगा, यो तो आने वाले समय में ही देखने को मिलेगा. लेकिन अतीत में यह देखने को मिला है कि पराली जलाने के मामले तो दर्ज हो जाते हैं लेकिन बाद में राज्य सरकार पीछे कदम खींच लेती है.
हाल ही में हरियाणा के कृषि निदेशक ने प्रदेश में पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराने के आदेश जारी कर दिए. जब सीएम सैनी के सामने यह मामला उठा तो उन्होंने साफ कह दिया कि ऐसा कोई फैसला लागू नहीं होगा. इसी तरह पंजाब सरकार ने 2021 में तो पराली जलाने से संबंधित जुर्माना माफ कर दिया था और 2022 में भी एफआईआर रद्द कर थी.
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प्रदूषण में पराली का रोल
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) के विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली में 1 से 15 नवंबर के बीच प्रदूषण का चरम होता है, जब पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं की संख्या बढ़ जाती है. पराली जलाने के पीछे मुख्य कारणों में धान-गेहूं का फसल चक्र, लंबी अवधि की धान की किस्मों की खेती, मशीनों से कटाई, जिसके कारण पराली खेतों में ही रह जाती है, मजदूरों की कमी और पराली के लिए बाजार की कमी शामिल है.