पराली जलाए जाने का मौसम आ गया है. साथ ही आ गया है उत्तर भारत के कुछ राज्यों के चीफ सेक्रेटरी के सुप्रीम कोर्ट के चक्कर लगाने का मौसम भी. सुप्रीम कोर्ट ने पराली जलाए जाने की बढ़ती घटनाओं के कारण बढ़ते वायु प्रदूषण के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा के चीफ सेक्रेटरी को तलब किया है.
इस मामले की वर्चुअल सुनवाई करते हुए मंगलवार को चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने मजाकिया अंदाज में वकीलों से पूछा- स्टबल बर्निंग से निकलने वाला धुआं क्या कोरोना वायरस को मार देगा? इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कोर्ट से कहा कि जी नहीं. पराली जलाने से वायु प्रदूषण के कारण कोरोना महामारी और विकराल रूप ले लेगी.
इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील श्याम दीवान ने कहा कि इसे पूरी तरह से रोकने और कारगर विकल्प अपनाने के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत है. सैटेलाइट से जंगल की आग की निगरानी होती है. ऐसा यहां भी हो. पराली जलाने वाले किसान को उसकी फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य का कुछ हिस्सा रोकने पर भी विचार हो सकता है. सीजेआई ने कहा कि हम इस मसले पर फिलहाल तो नोटिस जारी करते हैं. फिर तय करेंगे कि इससे निजात पाने को क्या ठोस किया जा सकता है.
इन कुर्सियों पर बैठे बाबू पिछले साल और उससे भी पिछले कुछ वर्षों में कोर्ट के चक्कर लगा चुके हैं. हर साल रिपोर्ट बनती है. कोर्ट के सामने लंबी-चौड़ी लुभावनी योजनाएं, तकनीक का बखान किया जाता है. किसान कल्याण पराली योजना जैसी स्कीम, विदेशों से आयातित मशीनें और उनके चमत्कारिक काम की जानकारी कोर्ट को दी जाती रही है.
किसानों को पराली के सुरक्षित और आसान निपटान के लिए बजट भी कोर्ट को बताया जाता रहा है. खूब सपने बताए जाते हैं. फिर अगले साल सितंबर के आखिरी हफ्तों से जब जलती पराली का धुआं वायु प्रदूषण बढ़ने लगता है, तब सभी जागते हैं और फौरन बाबू तलब किए जाते हैं. हर साल पराली जलती है, हर साल मुकदमे आते हैं. हर साल अदालत लगती है, आदेश सुनाए जाते हैं. हर साल योजनाएं बनती हैं, हर साल बजट बन जाता है. हर साल पराली जलती है.