सुप्रीम कोर्ट ने 56 साल बाद दाखिल की गई अर्जी को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर पांच हजार रुपए का जुर्माना लगाया. अदालत ने कहा कि कोर्ट के किसी आदेश पर पुनर्विचार के लिए विशेष अनुमति याचिका यानी एसएलपी दाखिल नहीं की जा सकती. सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने कानूनी प्रक्रिया के तहत मिलने वाले अधिकार का दुरुपयोग करते हुए अदालत का समय बर्बाद करने के मकसद से ही यह अर्जी दायर की है.
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के एक मामले में करीब दो साल यानी 647 दिन बाद अपील दायर करने पर सीबीआई को फटकार लगाई थी. तब जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने जांच एजेंसी को कहा था कि ऐसी व्यवस्था बनाएं कि अपील समय सीमा में ही दाखिल की जाय. एजेंसी ने कोविड संकट की दलील दी तो पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि कोविड लॉकडाउन तो 2020 के मार्च में लगा, जबकि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला जून 2019 में ही आया था.
'एजेंसी आठ महीने क्या करती रही?'
बहरहाल, इस मामले में हुआ यह कि बिहार की अनीता देवी बनाम संजय कुमार और अन्य के बीच संपत्ति विवाद पर निचली अदालत ने 1965 में फैसला सुनाया था. उस पर पटना हाईकोर्ट में अपील की गई. अपील खारिज हो गई. उस पर 56 साल बाद पुनर्विचार याचिका लगाई गई. उसे इतने वषों बाद सुनने से हाईकोर्ट ने इंकार कर दिया. पटना हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के लिए एसएलपी दायर की गई. कोर्ट ने उसे खारिज कर जुर्माना ठोंक दिया.
पांच हजार रुपये का लगाया जुर्माना
मजस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने कहा कि 56 साल पहले 1965 में जब हाईकोर्ट में पहली अपील में फैसला सुनाया गया तब किसी भी पक्ष ने आपत्ति नहीं जताई थी. प्रतिवादी का निधन हो चुका था. लेकिन अब 56 साल बाद इस मामले में फिर से अपील दायर करने का कोई मतलब नहीं रह जाता. पटना हाईकोर्ट ने इतने दशकों की देरी से आने के आधार पर अपील खारिज कर दी तो याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया. सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर पांच हजार रुपए जुर्माना लगाया और चार हफ्ते में जुर्माने की रकम सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड वेलफेयर फंड में जमा करने का आदेश दे दिया.