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समलैंगिक विवाह पर केंद्र सरकार 'सख्त' भी, 'नरम' भी... अब सुप्रीम कोर्ट में कही ये बात

समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को आठवें दिन भी सुनवाई हुई. सीजेआई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में पांच जजों की संवैधानिक बेंच इस पर सुनवाई कर रही है. केंद्र का कहना है कि सरकार समलैंगिकों को बिना मान्यता के उनकी समस्याओं पर विचार करने को तैयार हो गई है. 

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सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को आठवें दिन भी समलैंगिक विवाह (Same Sex Marriage) मामले की सुनवाई हुई. इस दौरान सेम सेक्स मैरिज को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा बयान दिया है. केंद्र अब समलैंगिकों को बिना मान्यता के उनकी समस्याओं पर विचार करने को तैयार हो गई है. 

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केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि सरकार समलैंगिकों की समस्याओं पर पॉजिटिव तरीके से सोच रही है. सरकार कैबिनेट सचिव स्तर के अधिकारियों की कमेटी बनाने को भी तैयार है. इस समिति के समक्ष समलैंगिक लोगों की समस्याओं को रखा जा सकता है. हालांकि, समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के विरोध में सरकार के रुख में कोई बदलाव नहीं हुआ है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समलैंगिक विवाह को मान्यता का मुद्दा हम तय करेंगे. इस संवेदनशील कानूनी मुद्दे पर संविधान पीठ तय करेगी कि सेम सेक्स मैरिज को मान्यता दी  जा सकती है या नहीं.

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि कुछ नहीं मिलने की तुलना में कुछ पाना उपलब्धि होगी. अदालत एक साथ रहने के अधिकार को मंजरी देना सुनिश्चित कर सकता है. हम ऐसी स्थिति नहीं चाहते जहां कुछ भी हाथ में न हो.

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जस्टिस एस रवींद्र भट ने याचिकाकर्ताओं को याद दिलाया कि अमेरिका के कानून में बदलाव लाने में आधी सदी लग गई थी. हमारे फैसले से भी आपके आंदोलन का अंत नहीं होगा क्योंकि उसके बाद सरकार को ही आगे का काम करना होगा. दरअसल वैचारिक मसले पर पूरी तरह से विधायी बदलाव की जरूरत है.

अदालत का कहना है कि ऐसे में सरकार जो देने को राजी हुई है, उसे याचिकाकर्ता स्वीकार कर लें. इससे आगे सरकार से गुहार लगाएं.

सेम सेक्स मैरिज मामले में मध्य प्रदेश सरकार की ओर से राकेश द्विवेदी ने कहा कि अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. क्योंकि अगर समलैंगिक जोड़े अपने जोड़ीदार से इतर अगर किसी रिश्ते में रहते हुए किसी और समलैंगिक से विवाह कर लें तो क्या होगा? क्या ये अपराधों की सूची में एक और संख्या बढ़ाने जैसा नहीं होगा? उससे निपटने के कानूनी उपाय क्या होंगे? 

लिहाजा इन सामाजिक और कानूनी पेचीदिगियों के मद्देनजर बदलते समाज में इस तरह की शादियों को मंजूरी देने के लिए विधायिका में बहस के जरिए राय करने की जरूरत है.

क्या है मामला?

दरअसल, दिल्ली हाईकोर्ट समेत अलग-अलग अदालतों में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग को लेकर याचिकाएं दायर हुई थीं. इन याचिकाओं में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के निर्देश जारी करने की मांग की गई थी. पिछले साल 14 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट में पेंडिंग दो याचिकाओं को ट्रांसफर करने की मांग पर केंद्र से जवाब मांगा था.

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इससे पहले 25 नवंबर को भी सुप्रीम कोर्ट दो अलग-अलग समलैंगिक जोड़ों की याचिकाओं पर भी केंद्र को नोटिस जारी की था. इन जोड़ों ने अपनी शादी को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर करने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की थी. इस साल 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को एक कर अपने पास ट्रांसफर कर लिया था.

याचिकाओं में क्या है मांग?

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को डिक्रिमिनलाइज कर दिया था. यानी भारत में अब समलैंगिक संबंध अपराध नहीं हैं. लेकिन अभी भारत में समलैंगिक विवाह की अनुमति नहीं मिली है. ऐसे में इन याचिकाओं में स्पेशल मैरिज एक्ट, फॉरेन मैरिज एक्ट समेत विवाह से जुड़े कई कानूनी प्रावधानों को चुनौती देते हुए समलैंगिकों को विवाह की अनुमति देने की मांग की गई है.

- समलैंगिकों की मांग है कि अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार LGBTQ (लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर) समुदाय को उनके मौलिक अधिकार के हिस्से के रूप में दिया जाए. एक याचिका में स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग की गई थी, ताकि किसी व्यक्ति के साथ उसके सेक्सुअल ओरिएंटेशन की वजह से भेदभाव न किया जाए. 

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