सुप्रीम कोर्ट जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सोमवार को अपना फैसला सुनाएगा. दो हफ्तों तक चली सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचार के लिए जो प्रमुख मुद्दे रहे थे वे निम्नलिखित हैं...
1. अनुच्छेद 370 (1) (डी) का उपयोग वैध रूप से अनुच्छेद 370 की व्याख्या को बदलने के लिए किया जा सकता है? जैसा कि राष्ट्रपति के आदेश सीओ 272 द्वारा ज्ञापित किया गया था.
2. क्या राष्ट्रपति शासन के दौरान उनकी सहमति के बिना अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का वैधानिक प्रस्ताव और सीओ 273 संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत जम्मू-कश्मीर के लोगों के मौलिक लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं?
3. क्या जम्मू और कश्मीर (पुनर्गठन) अधिनियम, 2019 संविधान के अनुच्छेद 3 और भाग III का उल्लंघन करता है?
अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के विरुद्ध तर्क देने वाली याचिकाओं में मुख्य रूप से दो चुनौतियां उठाई गईं. पहली तो राष्ट्रपति के आदेशों की संवैधानिकता से संबंधित है, जबकि दूसरी चुनौती जम्मू और कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने को लेकर है. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस अनुच्छेद के सन्दर्भ में कुछ भी सीधे नहीं किया जा सकता, न ही अप्रत्यक्ष रूप से किया जा सकता.
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सहमति के बिना, संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 370 में अप्रत्यक्ष रूप से संशोधन किया है. इसे 'संविधान सभा' के स्थान पर 'विधानसभा' द्वारा स्थापित करके सक्षम बनाया गया था. दूसरे, उनका तर्क है कि जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत असंवैधानिक था.
यह अनुच्छेद संसद को नए राज्य बनाने और मौजूदा राज्यों की सीमाओं को बदलने या संशोधित करने का अधिकार देता है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अनुच्छेद 3 संसद को संघीय लोकतांत्रिक राज्यों को केंद्र शासित प्रदेश जैसे कम प्रतिनिधि वाले रूप में डाउनग्रेड करने की शक्ति नहीं देता है. याचिकाकर्ताओं ने आगे तर्क दिया कि संघीय लोकतंत्र में, स्वायत्त स्वशासन का अधिकार, विशेष रूप से संवैधानिक और राजनीतिक स्थिति के संबंध में, संविधान के भाग III के तहत एक मौलिक अधिकार है और कानून द्वारा स्थापित उचित प्रक्रिया के बिना इसे छीना नहीं जा सकता है.
28 अगस्त, 2019 को पूर्व CJI जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने इन याचिकाओं को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया था. 1 अक्टूबर, 2019 को जस्टिस एनवी रमणा, जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी , जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की 5 जजों की संविधान पीठ ने 14 नवंबर, 2019 से मामले की सुनवाई करने का फैसला किया. ये याचिकाएं पांच जजों की संविधान पीठ के सामने रखी गईं. पीठ ने 2 मार्च, 2020 को इन याचिकाओं को और बड़ी बेंच को सौंपने से इनकार कर दिया.
इसके बाद 11 जुलाई, 2023 को CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने मामले की सुनवाई 2 अगस्त 2023 से करने का फैसला किया. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 16 दिनों की बहस में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के ऐतिहासिक, संवैधानिक और राजनीतिक पहलुओं पर विचार किया. वकीलों ने 370 को निरस्त करने से पहले प्रमुख चार मामलों पर जोर दिया जो निम्न हैं.
प्रेम नाथ कौल बनाम भारत संघ (1959)
यह उन मामलों मे से एक था जो अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की भूमिका से संबंधित था. अनुच्छेद 370 (1) के अनुसार, भारत के राष्ट्रपति जम्मू और कश्मीर संविधान सभा की सहमति के बाद, जम्मू और कश्मीर में भारत के संविधान के प्रावधानों को लागू कर सकते हैं. इस मामले में बिग लैंडेड एस्टेट्स एबोलिशन एक्ट, 1950 की वैधता को चुनौती दी गई थी. महाराजा युवराज करण सिंह ने संपत्ति मालिकों से भूमि जोतने वालों को हस्तांतरित करके कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कानून बनाया.
इस मामले में मुख्य मुद्दा यह था कि क्या जम्मू-कश्मीर के महाराजा के पास भारत के प्रभुत्व में शामिल होने के बाद कानून बनाने का विधायी अधिकार है? इस मामले में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उनकी जमीन पर उनका अधिकार है और अदालत से अधिनियम को शून्य और निष्क्रिय घोषित करने का अनुरोध किया. उन्होंने तर्क दिया कि अनुच्छेद 370 के परिणामस्वरूप महाराजा के पास कोई विधायी अधिकार नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस अधिनियम को बरकरार रखते हुए पुष्टि की कि महाराजा के पास इसे अधिनियमित करने के लिए आवश्यक विधायी शक्तियां थीं.
तथ्य यह है कि यह स्थिति 1956 में जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू होने से पहले की परिस्थितियों से संबंधित थी. संविधान सभा 1957 में भंग कर दी गई थी. फिर भी, बेंच ने जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की भूमिका पर टिप्पणियां कीं. संविधान सभा के फैसले में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की राष्ट्रपति की शक्तियों पर भी टिप्पणी की गई. इसमें कहा गया कि अनुच्छेद 370 (3) राष्ट्रपति को एक सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा घोषित करने के लिए अधिकृत करता है कि यह अनुच्छेद लागू नहीं होगा या केवल निर्दिष्ट अपवादों के साथ ही लागू होगा या संशोधन के साथ. लेकिन इस शक्ति का प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा तभी किया जा सकता है जब राज्य की संविधान सभा उस संबंध में सिफारिश करती है.
पूरनलाल लखनपाल बनाम भारत के राष्ट्रपति (1961)
इसके बाद अगला मामला पूरनलाल लखनपाल बनाम भारत के राष्ट्रपति (1961) का है. इस मामले में राष्ट्रपति के एक आदेश ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन करके केवल अप्रत्यक्ष चुनावों के माध्यम से लोकसभा में जम्मू और कश्मीर का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति दी. संशोधन में जम्मू-कश्मीर से छह लोगों के प्रतिनिधित्व की अनुमति दी गई. राष्ट्रपति को जम्मू-कश्मीर विधानमंडल से परामर्श के बाद इन सदस्यों का चयन करने का अधिकार दिया गया. कोर्ट के सामने मुद्दा यह था कि जम्मू और कश्मीर में लागू करते समय भारत के संविधान के प्रावधानों को संशोधित करने की राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा क्या है?
इस मामले मे याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि राष्ट्रपति ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का उल्लंघन किया. लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य पर उसे लागू करते समय संविधान के प्रावधानों में आमूलचूल परिवर्तन नहीं कर सके. उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रपति ने नामांकन के स्थान पर प्रत्यक्ष चुनाव की जगह ले ली, जो अनुच्छेद 370(1) के तहत उचित नहीं था. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि राष्ट्रपति के पास भारतीय संविधान के प्रावधानों को संशोधित करने की व्यापक शक्तियां हैं. पीठ ने याचिकाकर्ताओं के आमूलचूल परिवर्तन वाले तर्क को खारिज करते हुए कहा कि इस अनुच्छेद में संशोधन शब्द का इस्तेमाल किया गया है. 370(1) को संविधान के संदर्भ में व्यापकतम अर्थ दिया जाना चाहिए. उस अर्थ में इसमें एक संशोधन शामिल है. इसे ऐसे संशोधनों तक सीमित नहीं किया जा सकता है जो कोई आमूलचूल परिवर्तन नहीं करते हैं.
संपत प्रकाश बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य (1968)
इस मामले में भारत के राष्ट्रपति ने जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 35 (सी) के आवेदन को बढ़ाने का आदेश जारी किया. अनुच्छेद 35(सी) एक विशेष प्रावधान था जो राज्य में मौलिक अधिकारों के दावों से निवारक निरोध कानूनों को प्रतिरक्षा प्रदान करता था. मूल रूप से, अनुच्छेद 35 (सी) को 1954 में राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से डाला गया था, जिसे बाद में 1959 और 1964 में बढ़ाया गया था. यहां मामला यह था कि क्या राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के विघटन के बाद अनुच्छेद 370 (1) के तहत किसी आदेश के आवेदन को बढ़ा सकते हैं? इस मामले मे याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अनुच्छेद में केवल अस्थायी प्रावधान थे जो राज्य की संविधान सभा द्वारा संविधान बनाकर अपना काम पूरा करने के बाद प्रभावी नहीं रहे.
वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने 8वें दिन भी ऐसी ही दलील दी. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राष्ट्रपति की 'संशोधन' शक्ति को मामूली बदलावों तक ही सीमित रखा जाना चाहिए, यह मुद्दा पहले पूरनलाल लखनपाल में सुलझाया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया कि जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा भंग होने के बाद भी अनुच्छेद 370 अस्तित्व में रहेगा. उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 370(3) स्पष्ट रूप से निर्देश देता है कि अनुच्छेद 370 केवल राज्य की संविधान सभा की सिफारिश पर ही लागू नहीं होगी. उनका मानना था कि संविधान सभा द्वारा [विघटन के समय] ऐसी कोई सिफारिश नहीं की गई थी. दूसरे शब्दों में, अनुच्छेद 370 स्थायी था.
मकबूल दमनू बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य (1972)
इस मामले में कहा गया कि भारत के राष्ट्रपति ने एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 370 की व्याख्या में 'सदर-ए-रियासत' वाक्यांश को जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल के संदर्भ के रूप में समझा जाना चाहिए. सदर-ए-रियासत राज्य का निर्वाचित प्रमुख होता था. इस मामले में याचिकाकर्ता को जम्मू और कश्मीर निवारक हिरासत (संशोधन) अधिनियम, 1967 के तहत हिरासत में लिया गया था, जिसे जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल की सहमति के बाद अधिनियमित किया गया था. यहा मामला यह था कि क्या याचिकाकर्ता की हिरासत अवैध थी? क्योंकि इसे कानून के अनुसार नहीं किया गया था?
याचिकाकर्ता ने इस मामले मे तर्क दिया कि उसे एक कानून के तहत हिरासत में लिया गया था जो राज्यपाल की सहमति लेने के बाद बनाया गया था, न कि सदर-ए-रियासत, जो भारत के संविधान के तहत राज्य का मान्यता प्राप्त प्रमुख था. इसके अलावा, सदर-ए-रियासत के स्थान पर राज्यपाल को केवल भारत के संविधान में संशोधन के माध्यम से ही लागू किया जा सकता है. केंद्र और जम्मू-कश्मीर राज्य ने तर्क दिया कि सदर-ए-रियासत ने जम्मू-कश्मीर के संविधान में एक संशोधन को मंजूरी दी, जिसने राज्यपाल को सक्षम प्राधिकारी और राज्य का प्रमुख बना दिया.
सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने माना कि राज्यपाल सदर-ए-रियासत का ही उत्तराधिकारी है. इसके अलावा, वे संघ के इस तर्क से सहमत थे कि जम्मू-कश्मीर संविधान में संशोधन के अनुसार, राज्यपाल राज्य का प्रमुख था, जिसे सदर-ए-रियासत द्वारा अनुमोदित किया गया था. अनुच्छेद 370 पर सुनवाई में एक बार सासंद मोहम्मद अकबर लोन के भाषणों पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाते हुए उनसे हलफनामा मांगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लोन हलफनामा दाखिल कर कहें कि वह भारत के संविधान और संप्रुभता को स्वीकार करते हैं और जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है.