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12वीं शताब्दी में शुरुआत, हिंदुओं के साथ भी मिलता है कनेक्शन... विवाद के बीच जानिए भारत में वक्फ किए जाने का पूरा इतिहास

भारत में वक्फ की शुरुआत 12वीं शताब्दी में इस्लाम के आगमन और 13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ मानी जा सकती है. इतिहासकार ग्रेगरी सी. कोज़लोव्स्की अपनी किताब "मुस्लिम एंडोमेंट्स एंड सोसाइटी इन ब्रिटिश इंडिया" में लिखते हैं कि भारत में पहला वक्फ 12वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में किया गया था.

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भारत में वक्फ का इतिहास कैसा रहा है, 12वीं सदी में पहली बार किया गया था वक्फ
भारत में वक्फ का इतिहास कैसा रहा है, 12वीं सदी में पहली बार किया गया था वक्फ

इस्लाम में एक धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था के रूप में वक्फ की व्यवस्था बीते एक हजार सालों से भारत में अर्थव्यवस्था और संस्कृति के साथ मौजूद रही है. यह सिस्टम भारत में इस्लाम की आमद के साथ आया और दिल्ली सल्तनत से लेकर मुगल साम्राज्य तक इसके विकास ने इसे एक महत्वपूर्ण संस्था बना दिया. इतिहासकारों और विद्वानों के अनुसार, वक्फ न केवल धार्मिक और परोपकारी उद्देश्यों के लिए स्थापित किया गया था, बल्कि यह मुस्लिम शासकों के राजनीतिक प्रभुत्व को प्रदर्शित करने का भी एक जरिया बना. 

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दिल्ली सल्तनत और वक्फ की शुरुआत
भारत में वक्फ की शुरुआत 12वीं शताब्दी में इस्लाम के आगमन और 13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ मानी जा सकती है. इतिहासकार ग्रेगरी सी. कोज़लोव्स्की अपनी किताब "मुस्लिम एंडोमेंट्स एंड सोसाइटी इन ब्रिटिश इंडिया" में लिखते हैं कि भारत में पहला वक्फ 12वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में किया गया था.

कब हुआ पहला वक्फ, दिलचस्प है वाकया
यह वक्फ घुरिद सुल्तान मुहम्मद इब्न-साम ने बनाया था, जिन्होंने मुल्तान शहर में एक मस्जिद के समर्थन के लिए एक गांव की आय को समर्पित किया था. कोज़लोव्स्की के अनुसार, यह कदम न केवल धार्मिक था, बल्कि राजनीतिक भी था. एक जीते गए इलाके में मस्जिद का निर्माण गैर-मुस्लिमों के लिए मुस्लिम शक्ति का एक स्थायी प्रतीक था. हर शुक्रवार की नमाज़ में सुल्तान के नाम का उल्लेख इस प्रभुत्व और उनकी धार्मिकता का साप्ताहिक घोषणापत्र बन गया.

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दिल्ली सल्तनत के दौरान सुल्तानों और उनके अमीरों ने मस्जिदों, मदरसों (शैक्षिक संस्थानों) और खानकाहों (सूफी आश्रमों) के समर्थन के लिए कई वक्फ स्थापित किए. इन वक्फों ने सामाजिक कल्याण और आर्थिक संरचनाओं को प्रभावित किया. ये संस्थाएं शहरी विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं और शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और आवास जैसी सुविधाएँ प्रदान करती थीं, जिससे समुदाय का कल्याण बढ़ता था.

वक्फ

सल्तनत काल में वक्फ का तेजी से हुआ विकास

डॉ. आमिर अफ़ाक़ अहमद फैज़ी अपनी पुस्तक "वक्फ रिकॉर्ड मैनेजमेंट इन इंडिया" में लिखते हैं कि दिल्ली सल्तनत काल में वक्फ का विकास अपने चरम पर था. इस काल में मस्जिदों, खानकाहों, मज़ारों (मकबरों), मदरसों और कब्रिस्तानों जैसे सार्वजनिक स्थानों का बड़े पैमाने पर निर्माण हुआ. इन वक्फों का उद्देश्य परोपकारी था और इन्हें आने वाली पीढ़ियों के लाभ के लिए डेवलप किया गया था. 

उदाहरण के लिए, जलियासर में हज़रत सय्यद शाह इब्राहिम मशहदी की दरगाह इस कड़ी की शुरुआती वक्फों में से एक थी. एक अन्य उदाहरण सुल्तान कुतुब उद्दीन के मकबरे के रखरखाव के लिए स्थापित वक्फ था, जिसका ट्रस्टी प्रसिद्ध अरब यात्री इब्न बतूता को सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने नियुक्त किया था. इब्न बतूता ने अपने विवरण में सुल्तान के वक्फ संस्थानों के प्रति झुकाव को रेखांकित किया है.

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इल्तुतमिश का युग: वक्फ का स्वर्णिम काल
दिल्ली सल्तनत में इल्तुतमिश का शासन वक्फ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है. डॉ. फैज़ी लिखते हैं कि इल्तुतमिश के काल में न केवल मौजूदा वक्फों को संरक्षित किया गया, बल्कि कई नए वक्फ भी स्थापित किए गए. इस दौरान बदायूं में 'शम्सी मस्जिद' का निर्माण हुआ, जिसकी देखरेख सुल्तान के बेटे और बदायूं के गवर्नर रुक्न-अल-दीन फिरोज़ ने की थी. "तारीख-ए-फिरोज़ शाही" में दिल्ली सल्तनत के दौरान वक्फों की स्थापना, रखरखाव और मरम्मत का विस्तृत विवरण मिलता है. इल्तुतमिश ने मकबरों, जलाशयों, नहरों, सड़कों, सरायों, शहरों और शैक्षिक संस्थानों का निर्माण करवाया, जो वक्फ के माध्यम से संचालित होते थे. यह काल वक्फ के परोपकारी और सामाजिक विकास के पहलुओं को उजागर करता है.

वक्फ

मुगल काल में और बुलंद हुआ वक्फ का परचम
मुगल साम्राज्य के दौरान वक्फ का विकास और संगठनात्मक व्यवस्था अपने चरम पर पहुंच गई. मुगल सम्राटों और अभिजात वर्ग ने कई वक्फों को संरक्षण दिया, जो सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव के साधन बन गए. शाहजहां ने 1640 के दशक में ताजमहल के रखरखाव के लिए कई वक्फ स्थापित किए. कोज़लोव्स्की लिखते हैं कि इन वक्फों को कई गांवों की आय और ताजमहल परिसर में दुकानदारों से किराए के माध्यम से वित्त पोषित किया जाता था. इन फंडों से कर्मचारियों के वेतन और मुमताज़ महल की पुण्यतिथि के समारोहों का खर्च चलता था.

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मुगल काल में वक्फों ने धार्मिक और शैक्षिक संस्थानों के विशाल नेटवर्क को समर्थन दिया, जो साम्राज्य के सुदृढ़ और विशाल संगठनात्मक ढांचे को दिखाता था. सूफी संतों के मकबरों और दरगाहों को बनाए रखने में भी वक्फ की महत्वपूर्ण भूमिका थी. कोज़लोव्स्की के अनुसार, सम्राट अकबर ने फतेहपुर सीकरी के शेख सलीम चिश्ती की दरगाह के लिए उदार वक्फ स्थापित किए थे. 

अकबर का मानना था कि शेख सलीम की मेहरबानी से उनके सबसे बड़े बेटे, सलीम (बाद में जहांगीर) का जन्म हुआ था. अकबर और जहांगीर दोनों ने शेख सलीम के वंशजों को सरकारी पदों पर रखा और समाज में बड़े कुलीन और अभिजात वर्ग में उन्हें जगह दी. 

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हिंदू और मुस्लिम दोनों को लाभ
मुगल काल में वक्फ का दायरा केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं था. कोज़लोव्स्की के अनुसार, मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनों को वक्फ से अनुदान मिलते थे. यहां तक कि सबसे "कट्टर" सम्राटों ने भी संस्कृत विद्वानों (पंडितों), हिंदू पुजारियों, साधुओं और उनके मंदिरों या मठों को अनुदान दिए. इन मामलों में भी "वक्फ" शब्द का प्रयोग किया जाता था, भले ही यह गैर-मुस्लिम संस्थानों के लिए हो. हिंदुओं ने भी इस शब्दावली को अपनाया और कभी-कभी अपने खुद के द्वारा किए गए दान को वक्फ के रूप में ही वर्णित किया.

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ब्रिटिश काल में आया बदलाव
ब्रिटिश औपनिवेशिक युग में वक्फ के लिए एक परिवर्तनकारी दौर आया. ब्रिटिश प्रशासन ने वक्फ के पंजीकरण और विनियमन के लिए कानूनी ढांचा तैयार किया, जैसे कि 1923 का वक्फ अधिनियम और बाद के संशोधन. इन कानूनी परिवर्तनों का उद्देश्य वक्फ प्रशासन को व्यवस्थित करना था, लेकिन इससे नौकरशाही चुनौतियां और कुप्रबंधन भी बढ़ा.

वक्फ

इस तरह दिल्ली सल्तनत से लेकर मुगल काल तक, वक्फ ने धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक संस्थानों को समर्थन दिया है, साथ ही मुस्लिम शासकों के प्रभुत्व का प्रतीक भी रहा है. 

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