राज्यसभा में एक अहम सवाल के जवाब में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने जानकारी दी कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का कोई प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन नहीं है. उन्होंने सवाल के जवाब में यह भी बताया कि जजों के रिटायरमेंट के बाद 'कूलिंग ऑफ' पीरियड का भी कोई प्रस्ताव नहीं है, जिससे रिटायर्ड जजों को तुरंत राजनीति में आने से रोका जा सके.
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने प्रश्नकाल के दौरान कहा कि कई जजों को रिटायरमेंट के बाद कार्यकारी और राजनीतिक भूमिकाएं दी जाती हैं, जो हितों के टकराव के सवाल को उठाता है. उन्होंने सुझाया कि ज्यूडिशरी की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए जजों को रिटायरमेंट के बाद कम से कम दो साल के लिए किसी भी राजनीतिक या कार्यकारी भूमिका में नहीं आना चाहिए.
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क्या है जजों की रिटायरमेंट एज?
मौजूदा समय में सुप्रीम कोर्ट के जज 65 साल की उम्र में रिटायर होते हैं, जबकि हाईकोर्ट के जज 62 वर्ष की उम्र में रिटायर होते हैं, जबकि जिला जजों की रिटायरमेंट एज 60 वर्ष होती है.
कांग्रेस सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान एक संवैधानिक संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया था, जिसमें हाईकोर्ट के जजों की रिटायरमेंट उम्र को सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर करने का प्रस्ताव था. हालांकि, यह विधेयक सदन में विचार के लिए नहीं लिया गया और समाप्त कर दिया गया.
AAP सांसद राघव चड्ढा ने पूछा था ये सवाल
कानून मंत्री मेघवाल ने जवाब में कहा कि जजों के नियुक्ति की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 124, 217, 224 और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से संबंधित एक ज्ञापन प्रक्रिया के आधार पर होती है. उन्होंने AAP सांसद के सुझाव को एक राजनीतिक एंगल देने की कोशिश बताया.
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कानून मंत्री ने कहा कि राघव चड्ढा मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन का हवाला दे रहे थे, जिसमें एक प्रस्ताव पारित किया गया था कि जजों की रिटायरमेंट एज बढ़ाई जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि चड्ढा संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट का भी हवाला दे रहे थे, जिसमें कहा गया था कि हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 से बढ़ाकर 65 की जानी चाहिए.