दुनिया अभी कोरोना महामारी की दर्दनाक और भयावह यादों से उबरी भी नहीं थी कि ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस (HPMV) नाम के एक नए वायरस ने दस्तक दे दी है. चीन में HPMV वायरस के कारण हेल्थ इमरजेंसी जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है. भारत में भी इस वायरस से संक्रमित कुछ मरीज मिले हैं, लेकिन राहत की बात है कि यह कोरोना जितना खतरनाक नहीं है. ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस इंसान के श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है. छोटे बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों को HPMV ज्यादा प्रभावित करता है.
खांसी, बुखार, शरीर दर्द, गले में खराश, नाक बहना या नाक का जाम हो जाना इत्यादि HPMV के लक्षण हैं. ऐसे लक्षणों वाले व्यक्ति के कॉन्टैक्ट में आने से बचना, भीड़भाड़ वाली जगहों पर फेस मास्क पहनना, साबुन से लगातार हाथ धोना, सैनिटाइजर का उपयोग करना इस वायरस से बचाव के सामान्य उपाय हैं. कोरोना और HPMV के अलावा पिछले एक दशक में दुनिया ने SARS, MERS, इबोला, Zika जैसे वायरसों का सामना किया है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस धरती ने 10 करोड़ से अधिक वायरसों को झेला है. आइए जानते हैं वायरस (विषाणु) की हिस्ट्री...
धरती पर जीव-जंतुओं से ज्यादा वायरस हैं
नेशनल जियोग्राफिक के अनुसार धरती पर इस समय करोड़ों वायरस एक्टिव हैं. इनमें से कुछ ही वायरस ऐसे हैं, जो इंसान के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डाल सकते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर की वायरोलॉजिस्ट सारा सॉयर कहती हैं, 'वायरस हमारी दुनिया में नहीं रहे हैं बल्कि हम वायरस की दुनिया में रह रहे हैं. उन्होंने हमें जीवनदान दिया हुआ है. पृथ्वी पर मौजूद कुल जीव-जंतुओं की आबादी वायरस की संख्या की तुलना में कुछ भी नहीं है. किस्मत अच्छी है कि सभी वायरस हमें नुकसान नहीं पहुंचाते. क्योंकि वायरस बेहद चुनिंदा कोशिकाओं (Cells) पर ही हमला करते हैं.'
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यहां एक बात स्पष्ट होनी चाहिए कि वायरस अकेले जीवित नहीं रह सकते. उन्हें जिंदा रहने के लिए एक शरीर की आवश्कता होती है, जिसे विज्ञान की भाषा में होस्ट कहते हैं. शरीर से यह मतलब नहीं कि सिर्फ इंसानी शरीर, किसी भी जीव-जंतु में वायरस जीवित रह सकते हैं. यानी वायरस एक तरह के परजीवि होते हैं, जिसे अंग्रेजी में पैरासाइट कहते हैं. पैरासाइट का अर्थ होता है- जीवित रहने के लिए किसी दूसरे पर आश्रित होना. हर वायरस की अपनी प्रकृति होती है, कोई इंसानों को प्रभावित करता है तो कुछ जीव-जंतुओं के लिए हानिकारक हो सकते हैं. यह जरूरी नहीं है कि इंसानों को प्रभावित करने वाला वायरस जीव-जंतुओं के लिए भी हानिकारक हो. वैसे ही जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालने वाला वायरस जरूरी नहीं है कि इंसानों को भी उसी तरह प्रभावित करे.
इंसान के शरीर में ही करीब 38 लाख वायरस हैं
दुनिया में कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां वायरस न हों. इंसान के शरीर में ही करीब 38 लाख वायरस मौजूद हैं. तो सोचिए दुनियाभर के बाकी जीव-जंतुओं में कितने वायरस होंगे. वायरस के जन्म का इतिहास वायरोलॉजिस्ट्स (विषाणुविज्ञानी) और सेल बायोलॉजिस्ट्स (जीवविज्ञानी) के लिए एक आकर्षक लेकिन काफी उलझाऊं विषय रहा है. वायरसों की विविधता के कारण, जीवविज्ञानी इस बात को लेकर संघर्ष करते रहे हैं कि इन्हें कैसे वर्गीकृत किया जाए और उनकी Life Tree (जन्म का इतिहास) कैसे निर्धारित की जाए. वायरस आनुवंशिक तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले हो सकते हैं, जिन्हें कोशिकाओं के बीच घूमते रहने की क्षमता प्राप्त होती है. वे मुक्त रहने वाले उन जीवों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, जो समय के साथ परजीवी बन गए. वैज्ञानिकों का मानना वायरस जीवन के अग्रदूत हो सकते हैं. यानी पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत वायरस से हो सकती है.
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किस चीज से बने होते हैं वायरस
हम जानते हैं कि वायरस काफी विविध हैं. वायरस में न्यूक्लिक एसिड के छोटे सीक्वेंस होते हैं, जो उनके जेनेटिक मैटेरियल के रूप में राइबोन्यूक्लिक एसिड (RNA) या डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (DNA) हो सकते हैं. अन्य सभी जीवों के विपरीत जिनमें डीएनए हमेशा एक डबल-स्ट्रैंडेड संरचना होती है, वायरस यूनिक होते हैं. उनकी DNA और RNA संरचनाएं विविध हो सकती हैं. कुछ वायरस जैसे- पोलियोवायरस में आरएनए जीनोम होते हैं, हर्पीसवायरस में डीएनए जीनोम होते हैं. इसके अलावा, कुछ वायरस (जैसे इन्फ्लूएंजा वायरस) में सिंगल-स्ट्रैंडेड जीनोम होते हैं, जबकि अन्य (जैसे चेचक के वायरस) में डबल-स्ट्रैंडेड जीनोम होते हैं. हालांकि, वायरसों में कुछ समान विशेषताएं होती हैं: सभी वायरस आम तौर पर काफी छोटे होते हैं, जिनका आकार 200 नैनोमीटर (nm) से कम होता है. यानी उन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता. वायरस अन्य जीवों की तरह प्रजनन की प्रक्रिया से पैदा नहीं होते बल्कि खुद की क्लोनिंग करते हैं. उन्हें जीवित रहने के लिए होस्ट सेल की जरूरत होती है, यानी किसी शरीर की. यह शरीर इंसानी या किसी भी जीव-जंतु का हो सकता है. वायरस होस्ट सेल के भीतर ही अपना क्लोन बना सकते हैं. किसी भी ज्ञात वायरस में राइबोसोम नहीं होता है, जो कोशिका की प्रोटीन बनाने वाली ट्रांसलेशनल मशीनरी का एक आवश्यक घटक है.
वायरस का रिप्रोडक्शन खतरनाक क्यों होता है?
बाकी जीव-जंतु अपना वंश बढ़ाने के लिए प्रजनन की प्रक्रिया अपनाते हैं. लेकिन वायरस ऐसा नहीं करता है. वायरस का रिप्रोडक्शन बढ़ना यानी उसकी आबादी में इजाफा. जितना ज्यादा रिप्रोडक्शन होगा... उतना ज्यादा संक्रमण फैलेगा. किसी वायरस को रिप्रोडक्शन करने के लिए या आसान भाषा में समझें तो अपना वंश आगे बढ़ाने के लिए किसी साथी की जरूरत नहीं होती. यानी वायरस में न नर होते हैं और न मादा. ये अपना क्लोन बनाते हैं. अपने ही शरीर से जेनेटिक मैटेरियल निकाल कर कई वायरस पैदा कर देते हैं. वायरस का वंश बढ़ने का मतलब और अधिक संक्रमण. वायरस जितने ज्यादा क्लोन बनाएंगे संक्रमण दर उतना अधिक होगा. वायरस का रिप्रोडक्शन न्यूक्लियर चेन रिएक्शन की तरह होता है यानी 1 से 3, 3 से 9, 9 से 81... इस तरह उनकी संख्या बेहिसाब तेजी से बढ़ती है.
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इसके अलावा वायरस म्यूटेट भी करते हैं यानी अपना स्वरूप बदलते हैं. कोई वायरस जितना ज्यादा म्यूटेट करेगा, उसके उतने ही वेरिएंट पैदा होंगे. कोरोना भी इसी तरह का वायरस था. वह लगातार म्यूटेट हो रहा था और अलग-अलग वेरिएंट सामने आ रहे थे. अगर म्यूटेट करने वाला वायरस हानिकारक हुआ तो यह मेडिकल साइंस के लिए चुनौती बन जाता है. मेडिकल साइंटिस्ट जब तक एक वायरस को कंट्रोल करने का उपाय ढूंढते हैं, वह अपना रूप बदल लेता है. फिर जो दवा पहले वायरस को कंट्रोल करती है, वह उसके म्यूटेशन को कंट्रोल करने में सक्षम नहीं होती. यहीं पर मेडिकल साइंस के सामने चुनौती आती है कोई ऐसी दवा बनाने की जो ओरिजिनल वायरस और उसके सभी म्यूटेंट्स को मार सके. यही कारण था कि पहली की तुलना में कोरोना की दूसरी वेव ने दुनिया में ज्यादा तबाही मचाई थी. वो तो भला हो वैज्ञानिकों का जिन्होंने बहुत कम समय के अंदर कोरोना वायरस और उसके सभी वेरिएंट को काबू करने वाला वैक्सीन बना सके. वरना दुनिया में और तबाही मचती.
धरती पर वायरस कहां से आये?
वायरस कहां से आये इसका उत्तर देना आसान सवाल नहीं है. इस सवाल को लेकर वायरोलॉजिस्ट्स का मत अलग-अलग है. तीन मुख्य हाइपोथिसिस (परिकल्पनाएं) व्यक्त की गई हैं: 1. प्रोग्रेसिव या एस्केप हाइपोथिसिस में कहा गया है कि वायरस आनुवंशिक तत्वों से उत्पन्न हुए हैं जिन्होंने कोशिकाओं के बीच घूम सकने की क्षमता प्राप्त की है. 2. रिग्रेसिव या रिडक्शन हाइपोथिसिस का दावा है कि वायरस सेलुलर जीवों के अवशेष हैं; और 3. वायरस-फर्स्ट हाइपोथिसिस में कहा गया है कि वायरस अपने वर्तमान सेलुलर होस्ट के साथ पूर्व में या साथ-साथ विकसित होते हैं. एक विचार यह भी है कि वायरस ने ही जीवन को जन्म दिया है. संभवतः सभी वायरस एक ऐसे तंत्र से उत्पन्न हुए हैं जिसका अभी तक खुलासा नहीं हो सका है. माइक्रोबायोलॉजी, जीनोमिक्स और स्ट्रक्चरल बायोलॉजी जैसे क्षेत्रों में इस विषय पर रिसर्च चल रहा है और हम उम्मीद कर सकते हैं कि वायरस कहां से आए, इस बुनियादी प्रश्न का कोई प्रमाणिक उत्तर हमें भविष्य में जरूर मिल सकेगा.