बीते विधानसभा चुनावों के रिज़ल्ट जहां बीजेपी के लिए सौगात बनकर आए. वहीं दो मेजर हिंदी भाषी राज्यों, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से, कांग्रेस को हाथ धोना पड़ा. भूपेश बघेल की कुर्सी तो गई ही लेकिन राजस्थान, जहां अशोक गहलोत ने वादों और योजनाओं की झड़ी लगा दी थी, वहां भी जादूगर का जादू फेल हो गया. ये हार अशोक गहलोत के लिए इसलिए भी भारी थी, क्योंकि सचिन पायलट और उनके बीच चल रहे टसल के बावजूद, पार्टी ने चुनावों में गहलोत को ही आगे किया था. इसके अलावा जब इंडिया गठबंधन के नेताओं ने कांग्रेस से राजस्थान में अपने लिए सीट्स मांगी और साथ लड़ने का प्रस्ताव दिया, तो इससे भी गहलोत पीछे रहे उनका आत्मविश्वास पार्टी के लिए उम्मीद थी कि जादूगर इस बार राजस्थान में सत्ता बदल जाने के रिवाज़ की काट करेंगे. और कुर्सी पर बने रहेंगे. लेकिन हुआ इसका उलट. सवाल उठना लाज़िमी है कि दर्जन भर से ज़्यादा वेलफेयर स्कीम लेकर आने के बावजूद गहलोत कहां चूक गए और हार के बाद अशोक गहलोत का भविष्य क्या होगा? 'आज का दिन' में सुनने के लिए क्लिक करें.
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Come fall in love with learning.. कभी देश के सबसे बड़े एडटेक प्लेटफॉर्म बायजूज़ की ये टैगलाइन थी. लेकिन बायजूज़ ने अपनी एक के बाद एक फेल होती बिज़नेस स्ट्रैटिजीज़ से कुछ नहीं सीखा. हालात आज ये हैं कि कंपनी के फाउंडर बायजू रवींद्रन को अपना घर गिरवी रखना पड़ा ताकि कर्मचारियों की फंसी हुई सैलरी दी जा सके. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट कह रही है कि 15 हज़ार कर्मचारियों की अटकी सैलरी देने के लिए रवींद्रन ने बैंगलुरू में परिवार के स्वामित्व वाले दो घर और अंडर कंस्ट्रक्शन विला गिरवी रख दिया. इससे वो 100 करोड़ रुपए उधार ले रहे हैं. दिक्कत सिर्फ इतनी नहीं है, भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड भी इस कंपनी के खिलाफ कोर्ट में है क्योंकि कंपनी ने बोर्ड को 158 करोड़ रूपए की ड्यू पेमेंट नहीं की, तो क्या बायजूज़ के दिवालिया होने तक बात जा पहुंची है, मामला इतना खऱाब हुआ कैसे? 'आज का दिन' में सुनने के लिए क्लिक करें.
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2021 में हथियारबंद तालिबानियों की काबुल में एंट्री हुई और पलक झपकते ही अफगानिस्तान का सीन बदल गया. सड़कें, स्कूल, कॉलेज, दुकान, ऑफिस, हर जगह से महिलाओं को ऐसे गायब किया गया जैसे वो कभी थी ही नहीं. जो भी उनकी नाफरमानी करता हुआ दिखा, वो अक्सर फिर दिखा ही नहीं. तालिबान की कट्टरता और बिखरी हुई व्यवस्था देखकर सभी देश उससे अलग हो गए. किसी ने आज तक तालिबान को अफगानिस्तान की सरकार के तौर पर मान्यता नहीं दी. सिवाय एक देश के. जो है हमारा पड़ोसी, चाइना. चीन ने औपचारिक रूप से अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को डिप्लोमैटिक मान्यता दे दी है. तालिबान ने बिलाल करीमी को बीजिंग में अपना राजदूत चुना था, जिसे चीनी सरकार ने अब हरी झंडी दे दी. इसे लेकर चाइनीज फॉरन मिनिस्ट्री के स्पोक्सपर्सन वांग वेनबिन ने मीडिया से कहा कि अफगानिस्तान को इंटरनेशनल कम्यूनिटी से अब अलग नहीं रखना चाहिए. गौरतलब है कि काबुल में तख्तापलट के बाद से ही किसी देश ने अब तक अफगानिस्तान से डिप्लोमटिक रिलेशन्स कायम नहीं किए थे, यहां तक की पाकिस्तान ने भी नहीं. लेकिन अब चीन ने ये पहल कर दी है. मगर जैसा कि कहा जाता है there are no free lunches, तो चाइना ने इस फैसले के जरिए अपने कौन से हित साधे हैं, उनका ये फैसला भारत के लिए कन्सर्निंग होना चाहिए या हमें इससे फर्क नहीं पड़ेगा? 'आज का दिन' में सुनने के लिए क्लिक करें.