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यासीन मलिक: सैयद सलाहुद्दीन का बूथ एजेंट कैसे बना कश्मीर में आतंक का आका?

प्रतिबंधित संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के चीफ यासीन मलिक को दिल्ली कोर्ट ने बुधवार को टेरर फंडिंग मामले में सजा सुना दी. यासीन मलिक ने आरोपों को कबूल कर लिया था कि वह कश्मीर में आतंकी गतिविधियों में शामिल था.

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यासीन मलिक को कोर्ट आज सजा सुना सकता है.
यासीन मलिक को कोर्ट आज सजा सुना सकता है.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • यासीन मलिक को उम्रकैद की सजा सुनाई गई
  • दो अलग-अलग मामलों में सुनाई गई है सजा
  • कोर्ट ने 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया

तारीख थी 13 अक्टूबर 1983. जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में भारत और वेस्ट इंडीज के बीच क्रिकेट मैच चल रहा था. लंच ब्रेक हुआ. तभी कुछ लोग पिच के पास चले गए और उसे खराब करने की कोशिश की. इस मामले में 12 लोगों पर मुकदमा चलाया गया. ये पूरा कांड जिस संगठन ने किया था, उसका नाम था 'ताला पार्टी.'

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दो साल बाद 13 जुलाई 1985 को ख्वाजा बाजार में नेशनल कॉन्फ्रेंस की रैली हो रही थी. इस रैली में 70 लड़के पहुंचे और पटाखे फोड़ दिया. सबको लगा कि बम विस्फोट हुआ है. चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई. नेशनल कॉन्फ्रेंस ने एक 19 साल के लड़के को पकड़ लिया. इस लड़के का नाम था- यासीन मलिक. 

वो यासीन मलिक, जिसने जम्मू-कश्मीर में आतंक को बढ़ाया. कश्मीर की आजादी की वकालत करता रहा. बम-बारूद और बंदूक के दम पर डर फैलाता रहा. आज उसी यासीन मलिक की सजा का ऐलान हो गया. यासीन मलिक पर आतंकी घटनाओं से जुड़ने और कश्मीर घाटी में माहौल खराब करने की साजिश रचने का दोष सिद्ध हुआ है. 

मलिक पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (UAPA) की धारा 16 (आतंकी गतिविधि), धारा 17 (आतंकी फंडिंग), धारा 18 (आतंकी गतिविधि की साजिश) और धारा 20 (आतंकवादी गिरोह या संगठन का सदस्य होना) सहित आईपीसी की धारा 120-B (आपराधिक साजिश) और 124-A (राजद्रोह) के तहत केस दर्ज किया गया था. ये मामला 2017 का है. यासीन मलिक ने खुद अपना गुनाह कबूल किया है. 

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यासीन मलिक अभी तिहाड़ जेल में बंद है. वो पहली बार जब जेल गया था, तब उसकी उम्र मात्र 17 साल थी.

ये 'ताला पार्टी' की कहानी क्या है...?

यासीन मलिक का जन्म 3 अप्रैल 1966 को श्रीनगर के मयसूमा इलाके में हुआ था. मयसूमा बहुत भीड़भाड़ वाला इलाका है. इसके दक्षिण में लाल चौक पड़ता है और पश्चिम से झेलम नदी बहती है. 

यासीन मलिक दावा करता है कि 80 के दशक में उसने हिंदुस्तानी सेना का अत्याचार देखा था, जिसने उसे हथियार उठाने को मजबूर किया. वो दावा करता है कि उस समय उसने टैक्सी ड्राइवरों पर सेना की हिंसा देखी थी. 

इस कथित हिंसा का जवाब देने के लिए यासीन मलिक ने एक संगठन बनाया. इसका नाम रखा- 'ताला पार्टी.' ये संगठन हिंसा करने और माहौल बिगाड़ने की अक्सर कोशिश करता रहता था. 1983 के भारत बनाम वेस्ट इंडीज के मैच में भी रुकावट डाली थी. उस हरकत में यासीन मलिक तो शामिल नहीं था, लेकिन उसके संगठन ने इसे अंजाम दिया था. इस मामले में 28 साल बाद 2011 में अदालत का फैसला आया और सभी 12 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया. 
 

इसी बीच 11 फरवरी 1984 को आतंकी मकबूल भट को फांसी पर चढ़ा दिया गया. ताला पार्टी ने इस फांसी का जमकर विरोध किया. जगह-जगह मकबूल भट के समर्थन में पोस्टर लगाए गए. इस मामले में यासीन मलिक को गिरफ्तार कर लिया गया. वो 4 महीने तक सलाखों के पीछे रहा. 

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जेल से रिहा होने के बाद 1986 में ताला पार्टी का नाम बदलकर इस्लामिक स्टूडेंट लीग (ISL) रख दिया गया. यासीन मलिक इसका महासचिव बना. कश्मीर की आजादी की लड़ाई में आईएसएल उभरकर सामने आया. अशफाक मजीद वानी, जावेद मीर और अब्दुल हामीद शेख जैसे आतंकी इसके सदस्य थे. 

फिर आया वो दौर, जिसने सबकुछ बदल दिया

कश्मीर घाटी में पाकिस्तान की वजह से माहौल हमेशा खराब ही रहता था. तनाव बना रहता था. हिंसा होती रहती थी. तभी तारीख आई 7 मार्च 1986. केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी. उन्होंने जम्मू-कश्मीर की गुलाम मोहम्मद शेख की सरकार को बर्खास्त कर दिया. राज्य में राज्यपाल शासन लागू हो गया.
आठ महीने बाद मार्च 1986 में फारूख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने हाथ मिला लिया. मार्च 1987 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए. इसके बाद घाटी में सबकुछ बदल गया. कश्मीर के लिए ये चुनाव टर्निंग प्वॉइंट साबित हुआ.

चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी और इत्तेहादुल-उल-मुसलमीन जैसी अलगाववादी पार्टियां साथ आईं और मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (MUF) बनाया. इस गठबंधन ने कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के खिलाफ चुनाव लड़ा. इस चुनाव में श्रीनगर अमीराकदल सीट से मोहम्मद युसुफ शाह MUF का उम्मीदवार था. यासीन मलिक ने युसुफ शाह के समर्थन में प्रचार किया. ये वही मोहम्मद युसुफ शाह था, जिसने आगे चलकर हिजबुल मुजाहिद्दीन नाम का आतंकी संगठन बनाया. आज उसे सैयद सलाहुद्दीन के नाम से जाना जाता है.

 

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उस दौर में MUF की रैलियों में जमकर भीड़ आती थी. MUF की जीत लगभग तय मानी जाती थी. लेकिन जब नतीजे आए तो कुछ अलग ही हुआ. MUF की बुरी हार हुई. युसुफ शाह भी हार गया. जानकार मानते हैं कि इसी चुनाव ने कश्मीर घाटी में अलगाववाद और आतंकवाद को हवा दी. हालांकि, यासीन मलिक इससे इनकार करता है. उसने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था, 'मैं आपको साफ कर दूं. 1987 के चुनाव में हुई धांधली के कारण हमने हथियार नहीं उठाए थे. हम 1987 से पहले भी वहां थे.'

1987 के चुनाव के बाद घाटी के हालात बदल गए. हिंसक घटनाएं बढ़ गईं. गैर-मुस्लिमों पर हमले होने लगे. मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के ज्यादातर उम्मीदवार बाद में आतंकी बन गए. 1988 में यासीन मलिक जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानी JKLF से जुड़ गया. यासीन मलिक के इशारे पर इस संगठन ने घाटी में जबरदस्त आतंक फैलाया. युवाओं को बहकाकर उनसे हथियार उठवाए गए. 

सालों पहले यासीन मलिक ने बीबीसी को इंटरव्यू दिया था. इस इंटरव्यू में जब उससे पूछा गया कि उसने कितने लोगों को मारा है, तो उसने जवाब दिया, 'ये मायने नहीं रखता कि मैंने कितने लोगों को मारा है. सरकार ने मेरे खिलाफ 11 केस दर्ज किए हैं और 11 साल में वो एक भी केस में ट्रायल शुरू नहीं कर सकी है.'

 

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जब देश के गृहमंत्री की बेटी का अपहरण हुआ

1987 के चुनाव के बाद कुछ समय के लिए यासीन मलिक पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चला गया. वहां उसने आतंक की ट्रेनिंग ली. 1989 में वो वापस लौट आया और आकर कत्लेआम मचाने लगा. यासीन मलिक के इशारे पर घाटी जलने लगी.

ये वो दौर था जब देश में राजनीतिक अस्थिरता भी चल रही थी. बोफोर्स घोटाले के आरोप लगने पर राजीव गांधी चुनाव हार गए थे. केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार आ गई थी. वीपी सिंह की सरकार को सत्ता संभाले अभी हफ्ताभर भी नहीं बीता था कि कुछ ऐसा हुआ जिसने देश को हिलाकर रख दिया. 

वो तारीख थी 8 दिसंबर 1989. उस समय देश के गृहमंत्री थे मुफ्ती मोहम्मद सईद. सईद दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक (यहां गृह मंत्रालय) में अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे थे. उनकी बेटी रूबिया सईद एमबीबीएस का कोर्स पूरा करके श्रीनगर में इंटर्नशिप कर रही थी. हॉस्पिटल से ड्यूटी करने के बाद जब वो लौट रही थीं, तभी रास्ते में कुछ आतंकियों ने उनको अगवा कर लिया. इस किडनैपिंग का मास्टरमाइंड था अशफाक वानी. इसे अंजाम दिया था जेकेएलफ के आतंकियों ने.

रूबिया की किडनैपिंग से देश में हड़कंप मच गया. देश की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाला व्यक्ति अपनी बेटी की सुरक्षा करने में नाकाम रहा था. दिल्ली से श्रीनगर तक बैठकों का दौर शुरू हो गया. शुरुआत में जेकेएलएफ ने रूबिया की रिहाई के बदले 20 आतंकियों की रिहाई की मांग की. बाद में बात 7 आतंकियों की रिहाई पर आ गई. 5 दिन बीत चुके थे, लेकिन रूबिया अब तक आतंकियों के चंगुल से छूट नहीं पाई थी.

 

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13 दिसंबर की दोपहर को सरकार और आतंकियों के बीच समझौता हुआ. रूबिया की रिहाई के बदले 5 आतंकियों को छोड़ा गया. शाम 5 बजे रूबिया को छोड़ दिया गया. उसी रात 12 बजे विशेष विमान से रूबिया को दिल्ली लाया गया. रूबिया के बदले आतंकियों की रिहाई का विरोध भी हुआ. 

इस घटना ने आतंकियों का जोश बढ़ा दिया. कश्मीर की सड़कों पर नारेबाजी होने लगी. जश्न मनाया जाने लगा. पूरी घाटी में आजादी के नारे गूंजने लगे. 'हम क्या चाहते! आजादी' और 'जो करे खुदा का खौफ, वो उठा ले क्लाश्निकोव' जैसे नारे सड़कों पर सरेआम लगाए जा रहे थे. 

रूबिया सईद के अपहरण के मामले में टाडा कोर्ट ने यासीन मलिक, अशफाक वानी, जावेद मीर, मोहम्मद सलीम, याकूब पंडित और अमानतुल्लाह खान को आरोपी बनाया था.

इस घटना के लगभग डेढ़ महीने बाद 25 जनवरी 1990 को यासीन मलिक और उसके साथी आतंकियों ने श्रीनगर में वायुसेना के जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग की. इसमें वायुसेना के चार जवान शहीद हो गए थे.

 

नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली

घाटी में सरेआम कत्लेआम मचता रहा. गैर-मुस्लिमों को मारा जाने लगा या उन्हें भगा दिया गया. ये सब यासीन मलिक के इशारे पर हो रहा था. मार्च 1990 में सुरक्षाबलों ने अशफाक वानी को मार गिराया. अगस्त 1990 में यासीन मलिक को भी घायल हालत में गिरफ्तार कर लिया गया. उसकी गिरफ्तारी के बाद जेकेएलएफ के ज्यादातर आतंकी या तो मारे गए या पकड़ लिए. आखिरकार मई 1994 में मलिक को रिहा कर दिया गया.

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जेल से रिहा होने के बाद यासीन मलिक ने हथियार डाल दिए. उसने हिंसा की बजाय बातचीत से मसला सुलझाने की बात कही. उसने राजनीतिक मध्यस्थता की बात की. उसने कहा कि कश्मीर मसले पर भारत और पाकिस्तान की सरकारों के बीच बातचीत में उसे भी शामिल किया जाए. लेकिन भारत को ये मंजूर नहीं था. 1995 में जम्मू-कश्मीर में जब विधानसभा चुनाव हुए, तो मलिक ने इसका विरोध किया. मलिक ने कहा कि भारत ने लोकतंत्र की आड़ में इसे कश्मीरियों पर थोंप दिया है.

ऐसा कहा जाता है कि पाकिस्तान ने जेकेएलएफ को फंडिंग करनी बंद कर दी थी. क्योंकि जेकेएलएफ पाकिस्तान के साथ कश्मीर के विलय का समर्थन नहीं करता था. जेकेएलएफ का एजेंडा था आजाद कश्मीर. न भारत का, न पाकिस्तान का. एक आजाद कश्मीर.

यासीन मलिक की ये दलील पीओके में बैठे जेकेएलएफ के आकाओं को पसंद नहीं आई. 1995 के आखिर में जेकेएलएफ के संस्थापक सदस्य अमानतुल्लाह खान ने यासीन मलिक को अध्यक्ष के पद से हटा दिया. बाद में मलिक ने भी उसे अध्यक्ष पद से हटा दिया. इससे जेकेएलएफ दो टुकड़ों में बंट गया.

राजनीति करता रहा यासीन मलिक

यासीन मलिक की जिंदगी कभी जेल के अंदर और कभी बाहर बीतती थी. अक्टूबर 1999 में यासीन मलिक को पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. जेल से अंदर-बाहर आते समय मलिक राजनीति करने लगा. वो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मुलाकात करने लगा. यहां तक कि मलिक ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी मुलाकात की थी. इस मुलाकात की तस्वीरें इंटरनेट पर मौजूद हैं.
 
2007 में यासीन मलिक ने 'सफर-ए-आजादी' नाम से एक कैंपेन शुरू किया. वो दुनियाभर में जाकर भारत के खिलाफ माहौल बनाता रहा. मलिक और उसके साथियों ने कश्मीर के साढ़े तीन हजार से ज्यादा गांवों और इलाकों में जाकर भारत के खिलाफ माहौल बनाया.

फरवरी 2013 में यासीन मलिक ने लश्कर-ए-तैयबा का सरगना मोहम्मद हाफिज सईद के साथ मंच साझा किया. इसका भी विरोध हुआ था. जनवरी 2016 में मलिक ने पाकिस्तान के तब के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को चिट्ठी लिखी थी, जिसमें उसने गिलगित-बल्टिस्तान का पाकिस्तान के साथ विलय का विरोध किया था.

 

पत्नी-बेटी के साथ होटल से बाहर किया

2009 में यासीन मलिक ने पाकिस्तान की रहने वाली मुशाल हुसैन से शादी कर ली. दोनों ने पाकिस्तान में ही शादी की. मुशाल हुसैन न्यूड पेंटिंग्स बनाने के लिए मशहूर है. 2012 में दोनों की एक बेटी हुई, जिसका नाम रजिया सुल्तान है. 

मुशाल हुसैन पाकिस्तान की रहने वाली हैं, लेकिन उनकी पढ़ाई विदेश में ही हुई. उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई की. उनके पिता एमए हुसैन जाने-माने अर्थशास्त्री हैं. उनकी मां रेहाना पाकिस्तानी मुस्लिम लीग की नेता रही हैं. 

4 दिसंबर 2013 को जेकेएलएफ ने दावा किया कि नई दिल्ली के एक होटल से मलिक, उसकी पत्नी और उसकी 18 महीने की बेटी को अलगाववादी विचारधारा के कारण निकाल दिया गया था. 

2017 में नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने यासीन मलिक समेत कई अलगाववादी नेताओं के खिलाफ टेरर फंडिंग का केस दर्ज किया. इन पर पाकिस्तान से पैसे लेकर कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद बढ़ाने का आरोप लगा. 19 मई 2022 को एनआईए कोर्ट ने यासीन मलिक को दोषी पाया.


 

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