राजधानी में बारिश ने पिछले 18 साल के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं. इतनी ज्यादा बारिश होने के पीछे मौसम वैज्ञानिक सोमा सेन का कहना है कि ये सब कुछ क्लाइमेट चेंज की वजह से हो रहा है. कई शोध से साफ हुआ है कि भारी बारिश, असमय बारिश या फिर बारिश ना होने की घटनाओं की फ्रीक्वेंसी का बढ़ जाने के पीछे क्लाइमेंट चेंज से सीधा संबंध होता है. हाल के दिनों में बादल फटने यानि 'क्लाउडबर्स्ट' या 'फ्लैश फ्लड' की घटनाएं भी बढ़ी हैं. जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में बादल फटने से 7 लोगों की मौत हो गई और 40 से ज्यादा लापता हो गए.
मौसम वैज्ञानिक सोमा सेन ने बताया कि जब भारी मात्रा में नमी वाले बादल एक जगह इकट्टठा होते हैं तो उनमें मौजूद बूंदो के भार की वजह से बादल की डेंसिटी बढ़ जाती है और अचानक तेज बारिश शुरू हो जाती है. इसे ही बादल फटना कहते हैं. मौसम विभाग की ओर से कई तरह के सुझाव दिए जाते हैं. मसलन बारिश के मौसम में ढलानों पर ना जाएं और समतल जमीन वाले इलाको में ही रहें.
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वज्रपात की फ्रीक्वेंसी आजकल ज्यादा हो गई है. वज्रपात (आकाशीय विजली) गिरने के कारण हर साल 3000 हजार लोगों की मौतें होती हैं. ये दो तरह की होती हैं. पहली क्लाउड टू क्लाउड लाइटनिंग जो सालों साल चलती रहती हैं. क्लाउड टू ग्राउंड लाइटनिंग होती है. इसे ही आकाशीय बिजली कहते हैं. मिट्टी के साथ जो करंट का इलेक्ट्रिक डिस्चार्ज होता है उसी समय वज्रपात होता है. पिछले 20 सालों में वज्रपात की घटनाएं बढ़ी हैं. इससे संबंधित मौतों का आंकड़ा भी बढ़ा है.
मौसम वैज्ञानिक सोमा सेन का कहना है कि जब भी वज्रपात हो तो सबसे बड़ा बचाव है किसी पक्के स्ट्रक्चर में सुरक्षा लेनी चाहिए. क्लिफ यानी किसी चट्टान के पास नहीं होना चाहिए. क्योंकि ये आकाशीय बिजली को खींचने में मदद करती हैं. स्वीमिंग पूल, वॉटर बॉडी, या किसान अगर खेत सींच रहा है तो उसे पानी से तुरंत बाहर आ जाना चाहिए.
क्या है 30-30 रूल और मुर्गा पोज़
बिजली दिखने के 30 सेकेंड के अंदर आपको वज्रपात की आवाज़ सुनाई देती है. तो आपके आसपास बिजली कड़क रही है. सर को घुटनों के बीच लाकर मुर्गा पोज़ बना लाजिए. इलेक्ट्रॉनिक गुड का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
आंकड़े बताते हैं कि 2019 के मुकाबले लाइटनिंग की घटनाओं में करीब 23 फीसदी का इजाफा हुआ है. तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा और वेस्ट बंगाल लाइटनिंग की घटनाओं के लिए वलनरेबल माने गए हैं.