ओडिशा के बालासोर में हुए भीषण हादसे के बाद रेलवे की सुरक्षा और कवच सिस्टम को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों के दौरान सुरक्षा कार्यों पर रेलवे के खर्च में कमी के बारे में काफी कुछ कहा गया. लेकिन इंडिया टुडे को मिले वित्तीय आंकड़ों की एक्सक्लूसिव जानकारी से पता चलता है कि दक्षिण पूर्व क्षेत्रीय रेलवे जहां बालासोर ट्रेन हादसा हुआ, वहां एंटी कॉलिजन सिस्टम (कवच) के लिए आवंटित बजट में से एक पैसा भी खर्च नहीं किया गया.
दक्षिण पूर्व रेलवे के लिए पूंजीगत व्यय मद में 468.90 करोड़ रुपये की लागत को मंजूरी दी गई थी जिसमें- कम आवाजाही वाले रेलवे नेटवर्क (1563 आरकेएम) (2020-21 में होने वाले कार्य) पर स्वदेशी ट्रेन टक्कर बचाव प्रणाली (कवच) के लिए यह पैसा करने का प्रावधान था लेकिन मार्च 2022 इसमें एक रुपया भी खर्च नहीं किया गया. इसी तरह इसी जोन के एक अन्य सेक्टर में दक्षिण पूर्व रेलवे में ट्रेन टक्कर बचाव प्रणाली (1563 आरकेएम) (2020-21 होने वाले कार्य) में कम कम आवाजाही वाले रेलवे नेटवर्क पर दीर्घकालिक विकास प्रणाली के लिए लगभग 312 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे लेकिन मार्च 2022 तक कोई पैसा खर्च नहीं किया गया और न ही 2022-23 के लिए परिव्यय लिया गया.
इसी प्रकार हेडर सिगनलिंग एवं टेलीकम्युनिकेशन के तहत दक्षिण पूर्व रेलवे के लिए 208 करोड़ की लागत स्वीकृत की गई थी. यह पैसा सबसे ज्यादा अवाजाही वाले रेलवे के रूट पर स्वचालित ब्लॉक सिगनलिंग, केंद्रीकृत यातायात नियंत्रण और ट्रेन टक्कर बचाव प्रणाली ( 2021-22 के लिए होने कार्य) के लिए खर्च होना था लेकिन आज तक कोई पैसा खर्चा नहीं किया गया.
रेल मंत्रालय के सूत्रों ने कहा है कि बजट इसलिए खर्च नहीं हुआ क्योंकि इस क्षेत्र में अभी तक सुरक्षा कार्यों के लिए कोई टेंडर नहीं निकाले गए. डेटा का विश्लेषण 2023-24 के लिए सरकार के अपने बजट दस्तावेजों से किया गया है. लेकिन इन निष्क्रिय निधियों की स्थिति से पता चलता है कि भारत में सबसे अधिक आवाजाही वाले रेल नेटवर्क में एंटी ट्रेन टक्कर प्रणाली (कवच) को लागू करने की प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है.
कवच के कार्यान्वयन को लेकर कहा जाता है कि इस पर रेलवे बोर्ड का सबसे अधिक फोकस है. सबसे अधिक आवाजाही वाले रेलवे मार्गों और नई दिल्ली-मुंबई तथा नई दिल्ली-हावड़ा खंड सर्वोच्च प्राथमिकता हैं क्योंकि उनमें दुर्घटनाओं की संभावना अधिक होती है और यहां ट्रेनें एक-दूसरे के करीब चलती हैं. दक्षिण पूर्व रेलवे ज़ोन जैसे अत्यधिक उपयोग किए जाने वाले नेटवर्क दूसरी प्राथमिकता हैं और तीसरी प्राथमिकता वो मार्ग हैं जहां यात्रियों की संख्या बहुत ज्यादा रहती है.
अनुसंधान डिजाइन और मानक संगठन (आरडीएसओ) ने तीन फर्मों- मेधा सर्वो ड्राइव्स, एचबीएल और केर्नेक्स को भारत में कवच उपकरण प्रदान करने के लिए मंजूरी दी है. बताया जा रहा है कि दो और कंपनियां इस पर काम कर रही हैं.
आपको बता दें कि ओडिशा के बालासोर में बहानगा बाजार स्टेशन के पास ये हादसा हुआ था. हादसे में 275 लोगों की मौत हो गई. अभी इनमें से 187 शवों की पहचान नहीं हो पाई है. उधर, रेलवे ने मामले में सीबीआई जांच की मांग की है. विपक्ष इस हादसे को लेकर लगातार केंद्र पर हमलावर है और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का इस्तीफा मांग रहा हैं