यह नक्शा बताता है कि लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी का मार्ग क्या हुआ करता था और किस राह से यह गुजरती थी.
मान्यता है कि सरस्वती लुप्त होकर जमीन के अंदर बह रही है, जबकि आईआईटी का शोध कहता है कि नदी बह नहीं रही है बल्कि उसकी भूमिगत घाटी में जल का बड़ा भंडार है.
वैज्ञानिक साक्ष्य और उनके इर्द-गिर्द घूमते ऐतिहासिक, पुरातात्विक और भौगोलिक तथ्य पाताल में लुप्त सरस्वती की गवाही दे रहे हैं.
वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर लुप्त नदी घाटी से लगातार बड़े पैमाने पर बोरवेल के जरिये पानी निकाला जाता रहा तो पाताल में पैठी नदी हमेशा के लिए सूख जाएगी क्योंकि उसमें नए पानी की आपूर्ति नहीं हो रही है.
कालीबंगा के इलाके की इस मिट्टी का इस्तेमाल क्रिकेट की पिच बनाने के लिए भी किया जाता है.
राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के कालीबंगा गांव में मिले थे हड़प्पा सभ्यता के अवशेष.
कालीबंगा के इन ढूहों के चारों तरफ खड़े खेत सरस्वती की सूखी घाटी में लहलहा रहे हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि कोई 4,000 साल पहले सतलुज नदी पश्चिम में खिसककर सिंधु में मिलने लगी और सरस्वती को पानी देने वाले ग्लेशियर के अवरुद्ध होने से नदी लुप्त हो गई.
भू-जल का लेवल अच्छा होने की वजह से यहां पानी जल्द ही मिल जाता है. फसलों के लहलहाने की एक वजह इसे भी माना जाता है.
आईआईटी ने अभी भले ही पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में साउंड रेसिस्टिविटी से सरस्वती का नक्शा तैयार किया हो लेकिन अभी राजस्थान के बाकी हिस्से और गुजरात अपनी बारी की प्रतीक्षा में खड़े हैं. सैटेलाइट इमेज दिखाती है कि सरस्वती की घाटी हरियाणा में कुरुक्षेत्र, कैथल, फतेहाबाद, सिरसा, अनूपगढ़, राजस्थान में श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, थार का मरुस्थल और फिर गुजरात में खंभात की खाड़ी तक जाती थी.
अध्ययन के आगे बढऩे पर नदी की बाकी दफन हो चुकी घाटी के मिलने की प्रबल संभावनाएं हैं. राजस्थान के जैसलमेर जिले में बहुत से ऐसे बोरवेल हैं, जिनसे कई साल से अपने आप पानी निकल रहा है. ये बोरवेल 1998 में मिशन सरस्वती योजना के तहत भूमिगत नदी का पता लगाने के लिए खोदे गए थे.
आईआईटी की कालगणना अभी बाकी है. यानी आने वाले दिनों में कुछ और रोमांचक जानकारियां मिल सकती हैं.
राजस्थान भूजल विभाग के वैज्ञानिक डॉ. एन.डी. इणखिया कहते हैं कि यह सरस्वती का पानी है या नहीं, यह तो जांच के बाद ही कहा जा सकता है. लेकिन नलकूपों से निकले पानी को भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने 3,000 से 4,000 साल पुराना माना था.