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राजनीति

कभी मनमोहन के डिप्टी, कभी मनमोहन के सर...ऐसा था प्रणब का पॉलिटिकल करियर

प्रणब मुखर्जी का लंबी बीमारी के बाद निधन
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पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया है. भारतीय राजनीति में छह दशकों का लंबा सफर तय करने वाले प्रणब मुखर्जी ने राजधानी दिल्ली के सैन्य अस्पताल में अंतिम सांस ली. वो पिछले कई दिनों से बीमार थे और बीते दिनों प्रणब मुखर्जी कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे, उनकी सर्जरी भी हुई थी.

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प्रणब मुखर्जी देश की सबसे कद्दावर राजनीतिक हस्तियों में से एक थे. उनके लंबे राजनीतिक करियर की शुरुआत इंदिरा गांधी के दौर में हुई थी. इंदिरा की कैबिनेट में वो नंबर दो की हैसियत रखते थे. इतना ही नहीं बाद में वो मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री रहते हुए नंबर दो की हैसियत पर थे और बाद में राष्ट्रपति बनकर उनके सर भी बने. प्रणब मुखर्जी केंद्र में वित्त, रक्षा, विदेश जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभालने के बाद जुलाई 2012 से जुलाई 2017 तक भारत के राष्ट्रपति रहे.

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प्रणब मुखर्जी ने 1969 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय राजनीति में एंट्री ली थी. वे कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा के लिए चुने गए. 1973 में वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए और उन्हें औद्योगिक विकास विभाग में उपमंत्री की जिम्मेदारी दी गई. इसके बाद वह 1975, 1981, 1993, 1999 में फिर राज्यसभा के लिए चुने गए.

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1980 में वे राज्यसभा में कांग्रेस के नेता बनाए गए. इस दौरान मुखर्जी को सबसे शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री माना जाने लगा. प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में वे ही कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करते थे. प्रणब मुखर्जी इंदिरा गांधी की कैबिनेट में वित्त मंत्री थे. 1984 में यूरोमनी मैगजीन ने प्रणब मुखर्जी को दुनिया के सबसे बेहतरीन वित्त मंत्री के तौर पर सम्मानित किया था.

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उनके राजनीतिक जीवन में दो बार ऐसे मौके आए जब वे प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए. साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था. वे पीएम बनने की इच्छा भी रखते थे, लेकिन राजीव गांधी को प्रधानमंत्री चुन लिया गया. इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो राजीव गांधी और प्रणब मुखर्जी बंगाल के दौरे पर थे, वे एक साथ विमान से आनन-फानन में दिल्ली लौटे.

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राजीव कैबिनेट में जगह नहीं मिलने से दुखी होकर प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस छोड़ दी और अपनी अलग पार्टी बनाई. प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया, लेकिन ये पार्टी कोई खास असर नहीं दिखा सकी. जब तक राजीव गांधी सत्ता में रहे प्रणब मुखर्जी राजनीतिक वनवास में ही रहे. इसके बाद 1989 में राजीव गांधी से विवाद का निपटारा होने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया. 

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साल 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तो प्रणब मुखर्जी का कद बढ़ा. 1998 में कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी ने संभाली तो प्रणब मुखर्जी उनके साथ मजबूती से खड़े रहे.

 

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साल 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई. इस दौरान प्रणब मुखर्जी ने वित्त से लेकर विदेश मंत्रालय तक का कार्यभार संभाला और पार्टी के संकट मोचक की भूमिका में रहे. 2012 में कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया और वो देश के 13वें राष्ट्रपति चुने गए. 26 जनवरी 2019 को मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया.

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