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कर्नाटक में CM का मुद्दा तो सुलझ गया अब कांग्रेस के सामने कैबिनेट गठन की बड़ी चुनौती

कर्नाटक में शानदार जनादेश मिलने के बावजूद कांग्रेस को सीएम का नाम फाइनल करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी. अब पार्टी के सामने कैबिनेट गठन को लेकर भी कई चुनौतियां हैं. कई नेता तो ऐसे हैं तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों सरकारों में मंत्री रहे हैं.

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कांग्रेस के लिए कैबिनेट गठन को लेकर भी है चुनौती
कांग्रेस के लिए कैबिनेट गठन को लेकर भी है चुनौती

कर्नाटक में शानदार जीत हासिल करने के बाद भी कांग्रेस को अब कैबिनेट गठन करने में कई तरह की चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है. मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद के लिए नेताओं का चुनाव कर पार्टी ने एक चुनौती से तो पार पा लिया है लेकिन अगली चुनौती फिर से सामने खड़ी है और वो है मंत्रिपरिषद का गठन. ऐसा माना जा रहा है कि कुछ मंत्री, मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के साथ पद की शपथ लेंगे जबकि अन्य को कुछ दिनों बाद मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा.

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अधिकांश चाहते हैं मंत्री पद

अगर कांग्रेस के 135 निर्वाचित विधायकों और पार्टी के एमएलसी के प्रोफाइल पर नजर मारें तो उनमें से 60 नेता ऐसे हैं जो किसी ना किसी तरह मंत्री बनना चाहते हैं. दिलचस्प बात यह है कि इनमें चालीस से ज्यादा विधायक और 4-5 एमएलसी पहले कांग्रेस और फिर बीजेपी सरकार में मंत्री रह चुके हैं. संविधान के अनुसार कर्नाटक के लिए मंत्रिपरिषद की अधिकतम संख्या 34 हो सकती है. ऐसे में जो पूर्व में मंत्री रह चुके हैं, उनमें से भी सभी को समायोजित करना मुश्किल होगा. इसके अलावा, कई नए लोग भी हैं जो मंत्रालय में सेवा करने के इच्छुक हैं. मुख्यमंत्री और पार्टी नेतृत्व अनुभव के साथ दिग्गजों का संतुलन सुनिश्चित करना चाहेंगे. 

पांच कारकों को नहीं कर सकते नजरंदाज

पिछला अनुभव और मौजूदा रुझान बताते हैं कि ऐसे पांच स्पष्ट कारक हैं जो मंत्री पद की चाह रखने वाले विधायकों की योग्यता मापेंगे-

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- सबसे पहले जो भी मंत्री बनेगा उसके सामने पार्टी के प्रमुख वादों को लागू करने और एक प्रभावी शासन सुनिश्चित करना चुनौती होगी. कई बार, दुर्भाग्य से, इस कारक को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है और अन्य कारक हावी हो जाते हैं.

- मंत्रालय में प्रतिनिधित्व में क्षेत्रीय संतुलन सुनिश्चित करना दूसरा कारक है. कित्तूर कर्नाटक और बेंगलुरु शहर के अलावा पुराने मैसूर क्षेत्र से हालिया समय में कई मंत्री बने हैं.  कल्याण कर्नाटक और मध्य कर्नाटक भी तटीय कर्नाटक की तरह पर्याप्त प्रतिनिधित्व की उम्मीद कर रहे होंगे.  इनमें से कुछ जिले ऐसे हैं जिनमें कांग्रेस ने असाधारण रूप से अच्छा प्रदर्शन किया है और उम्मीद की जा सकती है कि उन जिलों का प्रतिनिधित्व अधिक होगा, वो भी तब जब लोकसभा चुनाव में एक साल से कम का समय बचा है.

- एक तीसरा कारक जो मंत्रियों की पसंद को प्रभावित करेगा वह है सही जाति संतुलन सुनिश्चित करना.  कांग्रेस ने इन्द्रधनुषी सामाजिक गठबंधन को एक साथ लाकर चुनाव जीता जिसमें प्रमुख जातियाँ - लिंगायत और वोक्कालिगा पर्याप्त प्रतिनिधित्व चाहते हैं. अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जातियों का भी पार्टी को खूब वोट मिला है और यहां से पहले से ही डिप्टी सीएम की मांग उठ रही थी. इन समुदायों को उचित संख्या में वरिष्ठ पदों के साथ मंत्रालय में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना भी चुनौती होगी. 

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- चौथा कारक नए चेहरों के साथ वरिष्ठता को संतुलित करना है. यहीं कांग्रेस नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. करीब एक चौथाई विधायक पूर्व में मंत्री रह चुके हैं, उनमें से प्राथमिकता तय करना एक मुश्किल काम होगा. संतुलन कायम करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा. उम्मीदवारों का चयन करते समय किसी भी पार्टी ने महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया. यह भी सवाल है कि क्या कांग्रेस विभागों का आवंटन करते समय महिलाओं को परंपरागत सांकेतिक प्रतिनिधित्व देगी.

- अंत में, कांग्रेस को अतीत में काफी गुटबाजी का सामना करना पड़ा था.  पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों को प्रतिनिधित्व देना और सबको साथ लेकर चलना भी पार्टी के लिए चुनौती से कम नहीं है. 

पोर्टफोलियो बंटवारा भी निभाएगा अहम रोल

जब मंत्री पदों का बंटवारा हो जाएगा तो फिर अगली चुनौती होगी विभागों का बंटवारा. मंत्रालय में किसे क्या विभाग मिलना चाहिए, यह तय करने में भी अक्सर खूब माथापच्ची होती है.  ऊपर जिन पांच कारकों का जिक्र किया गया है, वो भी पोर्टफोलियो का बंटवारा करते समय अहम रोल अदा करेंगे.  सरकार के वादों को लागू करने के लिए पोर्टफोलियो की अहमियत और ज्यादा होगी क्योंकि सरकार के प्रदर्शन का आकलन संबंधित मंत्रालयों से जुड़ा होगा. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी  नेतृत्व कैसे इस चुनौती से निपटता है.

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(इनपुट- संदीप शास्त्री)

 

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