उत्तर प्रदेश की सियासत के केंद्र में इन दिनों सपा विधायक आजम खान हैं, जो सीतापुर जेल में 26 महीने से बंद हैं. सपा प्रमुख अखिलेश यादव से आजम खान की जब से नाराजगी की बात सामने आई है, दूसरे दलों के नेताओं का जेल में उनसे मिलने का सिलसिला शुरू हो गया है. आजम खान ने शिवपाल यादव से लेकर कांग्रेस नेता प्रमोद कृष्णम से तो मुलाकात की, लेकिन सपा विधायक रविदास मल्होत्रा को बैरंग वापस कर दिया. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आजम खान अब अखिलेश यादव से अलग नई सियासी राह तलाश रहे हैं? अगर हां, तो उनके पास क्या-क्या राजनीतिक विकल्प हैं?
आजम खान के खिलाफ जो 78 मुकदमे दर्ज हुए थे, उनमें से 77 में उन्हें अलग-अलग अदालतों से जमानत मिल चुकी है. जो एक मामला बचा हुआ है, उसमें भी सुनवाई पूरी हो चुकी है. हाईकोर्ट ने अपना जजमेंट रिजर्व कर रखा है.
आजम खान लंबे वक्त से जेल में हैं, लेकिन सपा प्रमुख अखिलेश यादव महज एक बार उनसे मिलने गए. उनकी रिहाई के लिए भी पार्टी लड़ती हुई नजर नहीं आई. ऐसे में आजम खान के जेल से बाहर आने से पहले ही उन्हें लेकर सियासी तानाबना बुना जाने लगा है. पिछले छह दिन में आजम खान से लेकर उनके परिवार से नेताओं की मुलाकात का सिलसिला जारी है.
आजम खान से नजदीकियां बढ़ा रहें कई नेता
राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ने रामपुर जाकर आजम परिवार से मुलाकात की तो अखिलेश के खिलाफ बगावत का झंडा उठाने वाले शिवपाल यादव शुक्रवार को सीतापुर जेल में आजम खान से मिले. ऐसे ही सोमवार को कांग्रेस नेता प्रमोद कृष्णम ने जेल पहुंचकर आजम खान से मुलाकात की. दलित नेता चंद्रशेखर आजाद भी आजम खान से मिलने के लिए तैयार बैठे हैं तो असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने तो आजम खान को अपनी पार्टी में शामिल होने का न्योता तक भेज दिया है.
सपा का एक प्रतिनिधिमंडल विधायक रविदास मल्होत्रा और सचिव अनुज मिश्रा की अगुवाई में रविवार को सीतापुर जेल पहुंचा था, लेकिन आजम खान ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया. ऐसे में आजम खान का सपा नेताओं से न मिलना, साफ संकेत है कि अब आजम खान की सपा से दूरी बन रही है. अब मुद्दा सपा द्वारा आजम का साथ छोड़ने, मुस्लिमों की बात न करने तक पहुंच गई है. ऐसे में सभी विपक्षी दलों की नजर आजम खान के बहाने 20 फीसदी मुस्लिम वोट पर है. आजम सूबे के मुस्लिमों के बड़े नेता माने जाते हैं. ऐसे में आजम अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए सपा से अलग होने का कोई फैसला लेते हैं तो उनके सामने ये छह संभावित विकल्प नजर आते हैं.
1. बसपा के हाथी पर सवारी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को बुरी हार मिली, जबकि मुसलमानों को टिकट देने में मायावती आगे रहीं. चुनाव हारने के बाद मायावती ने कहा था कि मुसलमान अगर सपा के बजाय बसपा का साथ देते तो बीजेपी को हराया जा सकता था. उन्होंने दलित-मुसलमान गठजोड़ बनाने की बात भी कही. नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बीएसपी से बाहर जाने के बाद कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा मायावती के पास नहीं है, जिसके जरिए मायावती मुस्लिम वोटों को साध सकें. ऐसे में आजम खान के लिए बसपा सियासी विकल्प बन सकती है.
हालांकि आजम खान खुलकर मायावती का विरोध करते रहे हैं. आजम खान और मायावती के जिस तरह से तेवर हैं, उससे नहीं लगता कि दोनों की सियासी पटरी बैठ पाएगी. लेकिन ये भी सच है कि राजनीति को संभावनाओं का खेल माना जाता है.
2. जयंत चौधरी से मिलाएंगे हाथ?
आजम खान के परिवार से आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी ने रामपुर जाकर मुलाकात की. इस दौरान जयंत ने कहा था कि आजम खान के परिवार से उनका बहुत पुराना रिश्ता है. उनके पिता चौधरी अजीत सिंह उनके बहुत अच्छे दोस्त थे. ऐसे में उनकी जिम्मेदारी थी कि वो आजम खान के परिजनों से मिलें. आजम खान ने अपनी शुरुआती राजनीति जयंत के दादा चौधरी चरण सिंह के सानिध्य में शुरू की थी. बाद में वे मुलायम सिंह के साथ हो गए. ऐसे में आजम के लिए आरएलडी एक मजबूत ठिकाना बन सकती है.
जयंत चौधरी सपा के साथ मिलकर यूपी विधानसभा चुनाव लड़े थे, लेकिन कुछ खास नहीं कर सके. इसके बाद भी सपा के साथ आरएलडी का गठबंधन बना हुआ है, लेकिन जयंत इन दिनों जाट-मुस्लिम-दलित कॉम्बिनेशन बनाने में जुटे हैं. इस कोशिश में आजम खान अहम किरदार अदा कर सकते हैं, क्योंकि पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड में जाट-मुस्लिम मतदाता काफी अहम भूमिका में हैं. इस इलाके में सपा की जीत में भी जाट-मुस्लिम का ही रोल रहा है. आजम खान का प्रभाव इसी इलाके में है और जयंत के साथ जाने में भी उन्हें किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए.
3.कांग्रेस का हाथ थामेंगे आजम?
मौजूदा समय में मुस्लिमों के मुद्दों पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ही खुलकर बोलते हैं. इसके लिए उन्हें फजीहत भी झेलनी पड़ी है. ऐसे में आजम खान सपा का साथ छोड़ते हैं तो कांग्रेस का हाथ पकड़कर 2024 में मुसलमानों को एकजुट करने का जिम्मा ले सकते हैं. कांग्रेस नेता प्रमोद कृष्णम ने सोमवार को जेल में जाकर आजम से मुलाकात भी की. हालांकि आजम खान की राजनीति शुरू से ही कांग्रेस विरोधी रही है. एक बड़ी वजह यह भी है कि रामपुर का नवाब परिवार कांग्रेसी है, जिसका विरोध आजम करते रहे हैं. आजम के खिलाफ कांग्रेसी नेताओं ने ही मुकदमे दर्ज कराए हैं, जिनमें नवाब काजिम अली खान मुख्य रहे हैं, जो पूर्व सांसद नूरबानों के बेटे हैं. वैसे भी सूबे में कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है.
4. ओवैसी से मिलाएंगे हाथ?
मुसलमानों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर लड़ रही इस समय एआईएमआईएम इकलौती पार्टी है. ओवैसी खुलकर योगी-मोदी का विरोध करते आए हैं. मुसलमानों में भी ओवैसी बंधुओं के लिए क्रेज बन रहा है. आजम खान की राजनीति भी मुस्लिम केंद्रित रही है. असदुद्दीन ओवैसी लगातार आजम खान को अपनी पार्टी में आने का न्योता दे रहे हैं. ऐसे में आजम खान ओवैसी से हाथ मिलाकर मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की कवायद कर सकते हैं. यूपी में 20 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जो करीब 140 विधानसभा सीटों पर असर रखते हैं. अगर दोनों साथ आते हैं तो इसका फायदा एआईएमआईएम और आजम दोनों को ही मिलेगा.
5.शिवपाल के साथ जाएंगे आजम?
यूपी चुनाव के बाद से ही अखिलेश यादव के खिलाफ शिवपाल यादव ने मोर्चा खोल रखा है. प्रगतिशील समाजवादी पार्टी को शिवपाल यादव दोबारा से खड़ा करने में जुटे हैं. शिवपाल यादव ने आजम से सीतापुर जेल में मुलाकात की है और अखिलेश से लेकर मुलायम सिंह तक पर सवाल खड़े किए हैं. शिवपाल ने कहा कि आजम खान की रिहाई के लिए सपा ने न तो कोई संघर्ष किया और न ही लोकसभा-राज्यसभा में आवाज उठाई. बता दें कि शिवपाल और आजम खान ने एक-साथ मुलायम सिंह के चेहरे के साथ सूबे की सियासत की है. सपा की सरकारों में मुख्यमंत्री के अलावा इन दोनों नेताओं की तूती बोलती ही नजर आती थी. यानी दोनों का पुराना साथ रहा है.
6. आजम खान क्या अपनी अलग पार्टी बनाएंगे?
आजम खान अगर सपा से अलग होते हैं तो उनके सामने एक विकल्प यह भी है कि वे अपनी अलग पार्टी बनाएं. आजम अपनी पार्टी बनाकर बीजेपी के खिलाफ एक अलग मोर्चा बनाने की दिशा में कदम उठा सकते हैं. आजम खान सूबे में शिवपाल, जयंत चौधरी, असदुद्दीन ओवैसी, ओम प्रकाश राजभर के साथ मिलकर एक संयुक्त मोर्चा बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं. हालांकि, आजम खान 2009 में भी सपा से अलग हुए थे, लेकिन तब न तो कोई पार्टी बनाई थी और न ही किसी दल में गए थे. ऐसे में आजम खान क्या सियासी कदम उठाएंगे ये तो आने वाले वक्त में ही पता चल सकेगा?