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बाबुल सुप्रियो: बैंकर से शुरुआत, मायानगरी में मकाम, 50 साल में अब सियासत से संन्यास

हुगली जिले में जन्में बाबुल सुप्रियो ने आसनसोल से चुनाव लड़ा और न सिर्फ लड़ा, बल्कि डोला सेन को 70 हजार वोट से अधिक के भारी अंतर से पटखनी भी दे दी. बस यहीं से सुप्रियो की सियासत का सितारा बुलंद हो गया.

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पूर्व केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो (फाइल फोटो)
पूर्व केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • साल 1992 में बैंक की नौकरी छोड़ किया था फिल्मी दुनिया का रुख
  • 2014 में पहली बार सांसद बनते ही सुप्रियो बने थे केंद्र सरकार में मंत्री

बंगाल की आसनसोल संसदीय सीट से सांसद बाबुल सुप्रियो ने राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया है. उन्होंने संसद की सदस्यता से भी इस्तीफा देने का ऐलान किया है. बाबुल सुप्रियो को जुलाई महीने में ही केंद्रीय मंत्रिमंडल से भी इस्तीफा देना पड़ा था. बंगाल चुनाव में हार के बाद उनकी राज्य नेतृत्व से नाराजगी की खबरें आम थीं. वहीं, राज्य का एक गुट हार के लिए बाबुल सुप्रियो को जिम्मेदार ठहरा रहा था.

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पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के एक छोटे से शहर उत्तरपाड़ा में 15 दिसंबर 1970 को जन्में बाबुल सुप्रियो ने लिलुआ के एक स्कूल से 12वीं तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीकॉम की डिग्री ली. बाबुल ने बीकॉम की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक बैंकर के तौर पर पेशेवर करियर की शुरुआत की लेकिन बैंकिंग में उनका मन नहीं रमा. साल 1992 में बाबुल सुप्रियो ने बैंक की नौकरी छोड़ दी और फिल्मी दुनिया का रुख कर लिया. इसके बाद जो हुआ वह इतिहास बन गया.

बाबुल सुप्रियो ने बांग्ला के साथ ही हिंदी फिल्म जगत के कई सुपरहिट गानों को भी अपनी आवाज दी. पार्श्व गायकी में बड़ा नाम बन चुके बाबुल सुप्रियो ने हिंदी और बांग्ला के साथ ही 11 अन्य भारतीय भाषाओं में भी गायन किया. उन्होंने बांग्ला भाषा की कई फिल्मों में लीड रोल भी किए. साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बाबुल सुप्रियो ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दामन थामा और मायानगरी से दिल्ली की राह पर निकल पड़े.

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बीजेपी ने भी बाबुल सुप्रियो को साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की आसनसोल सीट से टिकट देकर चुनावी रणभूमि में उतार दिया. 2014 में आसनसोल के रण बाबुल सुप्रियो को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की धाकड़ नेता डोला सेन को चुनौती देनी थी. इंडस्ट्रियल इलाके आसनसोल में डोला सेन को हराना तो दूर, चुनौती देना भी आसान नहीं था. डोला ट्रेड यूनियन नेता थीं और उनकी गिनती मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की करीबी, टीएमसी की धाकड़ नेताओं में होती थी.

बुलंद हुआ सुप्रियो की सियासत का सितारा

हुगली जिले में जन्मे बाबुल सुप्रियो ने आसनसोल से चुनाव लड़ा और न सिर्फ लड़ा, बल्कि डोला सेन को 70 हजार वोट से अधिक के भारी अंतर से पटखनी भी दे दी. बस यहीं से सुप्रियो की सियासत का सितारा बुलंद हो गया. पहली बार जीतकर बाबुल सुप्रियो संसद पहुंचे. सुप्रियो को एक ऐसे राज्य से, ऐसी जगह से जीतकर आने का इनाम भी मिला और उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री पद से नवाजा गया. तब वे केंद्र सरकार के सबसे युवा मंत्री भी थे.

क्यों खास थी बाबुल सुप्रियो की 2014 की जीत

बाबुल सुप्रियो की यह जीत इसलिए भी खास थी कि वे ऐसे राज्य से जीतकर आए जहां से बीजेपी केवल दो सीटें ही जीत सकी थी. दार्जिलिंग सीट पर बीजेपी को गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का समर्थन हासिल था, वहीं आसनसोल में बीजेपी अकेले दम लड़कर जीती थी और जीतने वाले बाबुल सुप्रियो थे. बाबुल ने लगातार दूसरी बार यानी साल 2019 के संसदीय चुनाव में भी अपने प्रतिद्वंदी को करारी शिकस्त देकर यह साबित भी किया कि 2014 की जीत कोई संयोग नहीं थी.

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विधानसभा चुनाव में हार के बाद गिरा सियासी कद

बंगाल में विधानसभा चुनाव आ गए. बीजेपी ने बंगाल विजय के लिए पूरी ताकत झोंक दी. बाबुल सुप्रियो को चुनाव में अहम जिम्मेदारी दी गई. कई सांसदों के साथ ही बाबुल सुप्रियो को भी विधानसभा चुनाव की समरभूमि में उतार दिया गया. बाबुल सुप्रियो टॉलीगंज विधानसभा सीट से लड़े लेकिन इसबार उनका जादू नहीं चला और उनको विधानसभा चुनाव में शिकस्त मिली.

टॉलीगंज विधानसभा सीट का चुनावी मुकाबला बाबुल, टीएमसी के अरूप विश्वास से हार गए. विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद बाबुल के सियासी कद में गिरावट का दौर शुरू हुआ. बंगाल बीजेपी के एक धड़े ने प्रदेश के चुनाव में हार के लिए बाबुल को कठघरे में खड़ा किया.

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