पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की जबरदस्त जीत से पूरे देश के विपक्षी दलों में भी काफी खुशी देखी जा रही है. शिवसेना, एनसीपी, सपा, पीडीपी, आरजेडी जैसी दलों ने ममता बनर्जी को इस जीत के लिए बधाई दी है. इससे एक बार फिर यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या ममता बनर्जी केंद्र में एनडीए के खिलाफ बनने वाले किसी गठबंधन का चेहरा बन सकती हैं?
मोदी-शाह को सीधे चुनौती देने वाली नेता
पश्चिम बंगाल का चुनाव पूरी तरह से ममता बनाम मोदी-अमित शाह हो गया था. पहली बार किसी नेता ने मोदी, शाह, बीजेपी की पूरी चुनाव मशीनरी को इतनी बड़ी शिकस्त दी है. अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी ने वहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी, प्रधानमंत्री और शाह की रैलियों के अलावा बीजेपी के केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को भी प्रचार में लगाया गया, लेकिन अकेले ममता बनर्जी इन सब पर भारी पड़ गईं. उनके नेतृत्व में न केवल टीएमसी तीसरी बार सत्ता में आई है, बल्कि उसने रिकॉर्ड जीत दर्ज की है.
इससे यह स्पष्ट हो गया कि मोदी के सामने अगर कोई मुकाबला करने वाला मजबूत चेहरा है तो वह ममता बनर्जी हो सकती हैं. इससे केंद्र में उनकी भूमिका लेकर कयास लगाए जाने लगे हैं. पिछले कुछ वर्षों में संसद में तृणमूल कांग्रेस को सरकार के खिलाफ ज्यादा मुखर देखा गया है. कांग्रेस एक कमजोर विपक्षी दल साबित हो रही है और टीएमसी मुख्य विपक्ष जैसी भूमिका में आ गई है.
ममता के पक्ष में कई बातें
ममता बनर्जी के पक्ष में फिलहाल ऐसे रास्ते बन रहे हैं जिनसे केंद्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है. ममता बनर्जी की इस प्रचंड जीत पर शिवसेना सांसद संजय राउत से लेकर लेकर अरविद केजरीवाल, महबूबा मुफ्ती, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव तक सबने बधाई दी है. इन सभी क्षत्रपों के मुकाबले निश्चित रूप से ममता बनर्जी का कद काफी ऊंचा हो चुका है और इनके लिए ममता बनर्जी को नेता मानना संभव हो सकता है. दूसरी तरफ, लगातार हार पर हार मिलते देख कांग्रेस पस्त हो चुकी है. उसके अंदर गुटबाजी भी चरम पर है.
वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री बताते हैं, 'बंगाल की जीत के बाद निश्चित रूप से ममता बनर्जी काफी मजबूत हुई हैं और इससे राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी स्वीकार्यता बढ़ेगी. ममता के कद के जैसा आज विपक्ष में कोई स्वीकार्य चेहरा नहीं है. शरद पवार की उम्र और स्वास्थ्य आड़े आ रहा है. बाकी जो नेता हैं अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव या दक्षिण के स्टालिन जैसे नेता अपने इलाके तक सीमित हैं और कई को अभी अपने को राज्य में भी साबित करना है. दूसरी तरफ, ममता बनर्जी को केंद्रीय मंत्री के रूप में केंद्र की राजनीति में भी काम करने का अनुभव है. दक्षिण के नेताओं की तुलना में ममता की हिंदी भी अच्छी है और इस वजह से उत्तर भारत की राजनीति में उनकी स्वीकार्यता ज्यादा है. इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर फिलहात तो ममता को चुनौती देने वाला कोई और नेता नहीं दिख रहा. एक नीतीश कुमार कभी विपक्ष का चेहरा बनने वाले नेता माने जाते थे, लेकिन बीजेपी के साथ जुड़ने से उनकी विश्वसनीयता विपक्ष के लिए खत्म हो गई है.'
वैसे तो यह अभी दूर की कौड़ी है. अगला लोकसभा चुनाव 2024 में होना है और केंद्रीय स्तर पर विपक्ष की कोई गोलबंदी 2023 से पहले शायद ही शुरू हो. लेकिन इसका भी फायदा ममता बनर्जी को ही मिलेगा. असल में अभी उन्हें अपने राज्य की चुनौतियों से निपटना है. नई सरकार बनाने के बाद कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करना है, तोलाबाजी जैसे भ्रष्टाचार के दीमक को खत्म करना है, राज्य की इकोनॉमी को पटरी पर लाना है. अभी वह एक-दो साल अपने राज्य में उलझी रहेंगी तो उन्हें केंद्रीय स्तर पर किसी भूमिका में आने में समय लगेगा.
क्या है ममता के रास्ते में अड़चन
ममता के केंद्रीय नेता बनने में सबसे बड़ा सवाल यह है कि साल 2023 तक जब विपक्ष लोकसभा चुनाव के लिए गोलबंदी करेगा तब कांग्रेस किस भूमिका में रहती है?
विनोद अग्निहोत्री कहते हैं, 'कांग्रेस भले ही ज्यादातर राज्यों में सत्ता से बाहर हो गई हो, लेकिन उसे नजरअंदाज करना इसलिए मुश्किल है क्योंकि उसकी उपस्थिति पूरे देश में है. केंद्र में बनने वाला कोई भी गठबंधन कांग्रेस को नजरअंदाज कर नहीं हो सकता. इसलिए यह देखना होगा कि ममता को नेता मानने में कांग्रेस की क्या भूमिका रहती है? काफी कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि कांग्रेस 2024 से पहले आने वाले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कैसा प्रदर्शन करती है.'
गांधी परिवार से इतर किसी दूसरी पार्टी के नेतृत्व में आना कांग्रेस के लिए भी आसान नहीं है. किसी कमजोर सरकार की स्थिति में बाद में कांग्रेस बाहर से समर्थन देने के लिए तैयार हो रहती है. लेकिन चुनाव पूर्व किसी गठबंधन में ममता को नेता मान लेना उसके लिए आसान नहीं है. हालांकि ममता के नेतृत्व में अगर कोई बड़ा गठबंधन बाद में बनता है तो कांग्रेस के लिए उसे नजरअंदाज कर अलग-थलग रहना भी आसान नहीं होगा.
इसलिए यह अभी भविष्य के गर्भ में है कि अगले दो-तीन साल में क्या राजनीतिक परिस्थितियां रहती हैं और कांग्रेस, अकाली दल, सपा, शिवसेना, जैसे दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को सीमित कर ममता का नेतृत्व किस हद तक स्वीकार कर पाते हैं?