
भयंकर तबाही मचाने के बाद कोरोना की दूसरी लहर अब काबू में आती दिख रही है. एक बार फिर देश के कई राज्य अनलॉक की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं. फिर जिदंगी को पटरी पर लाने की कवायद है. वैसे ये अनलॉक सिर्फ आम आदमी तक सीमित नहीं है, बल्कि कोरोना की सुस्त रफ्तार के बाद से देश की सियासत भी अनलॉक हो गई है. हर मुद्दे को दबाने वाला कोरोना जैसे ही बैकसीट पर आया, एक बार फिर राजनीतिक सुगबुगाहट तेज हो गई और पंजाब से बंगाल तक, यूपी से राजस्थान तक सियासी भूचाल देखने को मिल गया.
सियासी भूचाल नंबर 1- पंजाब में कैप्टन बनाम सिद्धू
मई के अंत से देश में कोरोना के मामले तेजी से घटे हैं. अब जितनी तेजी से मामले घटे, उतनी ही तेजी से राजनीति की सियासी ट्रेन भी दौड़ती दिख गई. इस ट्रेन का पहला स्टेशन पंजाब रहा जहा पर पूर्ण बहुमत होने के बावजूद भी कांग्रेस अंदरूनी लड़ाई में फंसी दिखाई पड़ी. सिद्धू बनाम कैप्टन की सियासी जंग ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के लिए बड़ा संकट खड़ा कर दिया. एक तरफ सिद्धू ने सीएम अमरिंदर सिंह के नेतृत्व को सिरे से खारिज कर दिया तो कैप्टन भी रानजीति की इस सियासी पिच पर मजबूती से खड़े रहे. उन्होंने खुद को पंजाब का सबसे बड़ा नेता बताने में जरा भी गुरेज नहीं किया. कैप्टन को इसका फायदा भी हुआ क्योंकि पंजाब की इस अंदरूनी कलह को दूर करने के लिए जो कांग्रेस ने तीन सदस्य कमेटी बनाई थी, उसकी तरफ से साफ कर दिया गया कि अमरिंदर सिंह ही पंजाब के सबसे लोकप्रिय नेता हैं और उनके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जा सकता है.
लेकिन उस कमिटी ने नवजोत सिंह सिद्धू के कद को भी नजरअंदाज नहीं किया. बतौर स्टार प्रचारक खुद को कई मौकों पर साबित कर चुके सिद्धू को डिप्टी सीएम की कुर्सी देने पर विचार हुआ. इस फैसले पर अभी तक मुहर नहीं लगी है लेकिन अटकलें तेज हैं कि गर्दिश में चल रहे सिद्धू के तारे फिर चमक सकते हैं. अब कांग्रेस के लिए पंजाब में मामला सेट हुआ तो राजस्थान में एक साल बार फिर सियासी ड्रामा शुरू हो गया. सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों ने जैसे ही अपने तेवर कड़े किए, दोनों सीएम अशोक गहलोत और कांग्रेस हाईकमान बैकफुट पर आ गए.
सियासी भूचाल नंबर 2- राजस्थान में फिर सक्रिय पायलट गुट
पिछले 10 महीने से दो ही मुख्य मांगों को लेकर राजस्थान में सियासी बवाल जारी है. पहली मांग तो ये रही कि पायलट समर्थक विधायकों को मंत्री पद या फिर किसी बोर्ड का चेयरमैन बना दिया जाए. दूसरी मांग ये रखी गई कि राजस्थान कांग्रेस 2022 तक सचिन पायलट को सीएम बनाने की रणनीति बनाए. अब इतने महीने बाद भी दोनो ही मांगें अधूरी रह गईं और हाईकमान के सुस्त रवैये से पायलट गुट फिर नाराज हो गया. 10 दिन के भीतर पंजाब मुद्दे का सुलझना भी राजस्थान की सियासी आग में पेट्रोल का काम कर गया. पायलट समर्थक विधायक सवाल खड़े करने लगे कि पंजाब में विवाद का समाधान 10 दिन में हो गया तो राजस्थान में 10 महीनों बाद भी रास्ता क्यों नहीं मिला? अभी के लिए पायलट रविवार तक दिल्ली में ही रहने वाले हैं. खबर है कि वो प्रियंका गांधी या राहुल गांधी से मिल अपने मन की बात कर सकते हैं. लेकिन उस मुलाकात तक उन्हें शांत रहने के लिए कहा गया है और उनकी वो चुप्पी ही कई सियासी अटकलों को हवा दे रही है.
सियासी भूचाल नंबर 3- चुनाव से पहले यूपी बीजेपी में बैठकों का दौर
अब कांग्रेस जरूर अंदरूनी लड़ाई से त्रस्त है लेकिन बीजेपी ने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनावी बिसात बिछाना शुरू कर दिया है. पिछले कुछ दिनों से जिस अंदाज में बैठकों का दौर जारी है, उस वजह से राजनीतिक गलियारों में हलचल काफी तेज है. कभी मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर माहौल बनने लगता है तो कभी खबर आती है कि यूपी के नेतृत्व से बीजेपी हाईकमान खुश नहीं है. अब वो खबर जब तक जोर पकड़े, सीएम योगी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात हो जाती है. उस मुलाकात का निचोड़ निकालने की कोशिश हो, तब तक योगी फिर लखनऊ पहुंच जाते हैं और उनकी अधिकारियों संग मीटिग का दौर शुरू हो जाता है. कई नेता भी उनके निवास पर बातचीत करने के लिए आ जाते हैं.
इस समय यूपी बीजेपी के लिए इतनी तेजी से घटनाक्रम बदल रहे हैं कि इन बैठकों के जरिए ही चुनाव की भी तैयारी है, मंत्रिमंडल विस्तार पर भी चर्चा है, नाराज विधायकों को फिर मनाने की भी कोशिश है और यूपी के राजनीतिक अखाड़े में जातीय इंजीनियरिंग भी की जा रही है. इस सबके ऊपर चुनाव से ठीक पहले बीजेपी अपने सहयोगियों को भी साधने में लगी है. गठबंधन को सुचारू रूप से चलाने के लिए सभी की नाराजगी को दूर किया जा रहा है. इसी कड़ी में अपना दल की अनुप्रिया पटेल भी अमित शाह से मुलाकात कर चुकी हैं. कहा जा रहा है कि प्रेशर पॉलिटिक्स के तहत उन्होंने प्रदेश मंत्रिमंडल में अपना दल का कोटा बढ़ाने की मांग रख दी है.
वैसे यूपी में एक तरफ बीजेपी चुनावी मोड में नजर आई तो कांग्रेस के साथ यहां भी 'खेला' हो गया. जितिन प्रसाद का यूं अचानक से बीजेपी का दामन थाम लेना कांग्रेस के लिए तो बड़ा झटका रहा ही, बीजेपी ने इसे यूपी की सियासत में अपने लिए सोने पर सुहागा मान लिया. कहने को कुछ सालों से राजनीति में जितिन प्रसाद का कद कुछ कम जरूर हुआ है, लेकिन ब्राह्मण समाज में उनकी पकड़ अब भी मजबूत है और बीजेपी 2022 के चुनाव में उसे ही भुनाने की कोशिश करेगी.
सियासी भूचाल नंबर 4- उद्धव- मोदी की मुलाकात, राउत ने की पीएम की तारीफ
कोरोना के सुस्त पड़ते ही महाराष्ट्र की राजनीति भी हरकत में आ गई. 7 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सीएम उद्धव ठाकरे की 40 मिनट की अकेले वाली मीटिंग ने ऐसा सियासी तापमान बढ़ाया कि उसकी गर्मी महाराष्ट्र की सियासी पिच पर साफ महसूस की जा सकती थी. मीटिंग को जरूर औपचारिक बताया गया, कहा गया कोरोना और दूसरे मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन ये बात किसी से नहीं छिपी कि शिवसेना, बीजेपी की सबसे पुरानी साथी में से एक रही है. माना अब साथ नहीं हैं, लेकिन कहा जाता है कि उद्धव के मोदी-शाह संग निजी रिश्ते अभी भी प्रगाढ़ हैं. अब इस मीटिंग को सियासी बल तब और ज्यादा मिल गया जब शिवसेना सांसद संजय राउत ने पीएम मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ दिए. अब यहां पर सारा खेल 'राजनीतिक टाइमिंग' का रहा. अगर दो महीने पीछे या आगे ये बयान आता, तो शायद इतना असर नहीं पड़ता लेकिन पीएम से सीएम की बैठक के तुरंत बाद ऐसी प्रतिक्रिया दोनों एनसीपी और कांग्रेस की दिल की धड़कनों को बढ़ा गया.
उस एक बैठक के बाद ही एनसपी प्रमुख शरद पवार को शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे की याद आ गई और इशारों-इशारों में ही उन्होंने एक वादा भी याद दिला दिया. कह दिया कि बाल ठाकरे ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दिया अपना वादा निभाया था और कांग्रेस के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ा. इस वादे के साथ पवार ने ये और जोड़ दिया कि शिवसेना कभी वादाखिलाफी नहीं करती और इसी वजह से उनकी सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी. अब ये तो वो बैठक-मीडिया से बातचीत हैं जो अभी जून के महीने में हुई हैं, लेकिन देवेंद्र फडणवीस-शरद पवार की मुलाकात, पवार-शाह की 'कथित' बैठक, उद्धव की शरद पवार से मीटिंग,ये राजनीतिक गतिविधियां भी महाराष्ट्र की सियासत में कई नाटकीय मोड़ लाने वाली साबित हुई हैं. हाल ही में प्रशांत किशोर की भी शरद पवार से मुलाकात हो गई है, तो उसके भी अलग ही सियासी मायने हैं.
सियासी भूचाल नंबर 5- बंगाल में मुकुल रॉय की टीएमसी में घर वापसी
अब बात करते हैं देश के सबसे बड़े सियासी अखाड़े की जहां पर चुनाव के बाद भी राजनितिक युद्ध जारी है-पश्चिम बंगाल. बंगाल में ममता बनर्जी की वापसी तो हो गई, लेकिन चुनाव जीतते ही उनके मंत्रियों पर सीबीआई का हल्ला बोल देखने को मिल गया. नारदा स्टिंग मामले में मंत्री फिरहाद हाकिम, सुब्रत मुखर्जी, विधायक मदन मित्रा और कोलकाता के पूर्व मेयर सोवन चटर्जी की गिरफ्तारी होने से सियासी भूचाल आ गया. ममता सीबीआई दफ्तर पहुंच गईं और बीजेपी ने भी अपना हमला तेज कर दिया. राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने भी मुख्यमंत्री के रवैये पर सवाल खड़े कर दिए. ऐसे में इस विवाद ने ममता को बैकफुट पर लाने काम कर दिया. अब बीजेपी इस सब से कुछ सियासी फायदे तलाशने की कोशिश करती, उससे पहले ही उसे भी बड़ा झटका लग गया. 11 जून को मुकुल रॉय ने टीएमसी में अपनी घर वापसी कर ली.
2017 में बीजेपी से अपनी दूसरी राजनीतिक पारी शुरू करने वाले मुकुल रॉय को पूरी उम्मीद थी कि वे बंगाल में एक बड़ा सियासी उलटफेर करेंगे. लेकिन उस उलटफेर को करने के लिए उन्हें जो ताकत चाहिए थी वो बीजेपी में रहते कभी नहीं मिली. बंगाल चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जरूर बनाया गया लेकिन फिर शुभेंदू अधिकारी के बीजेपी में आते ही मुकुल का कद छोटा होता गया. अपने पुरानी साथी से मिल रही टक्कर को वो पचा पाते, तब तक तो शुभेंदू को बंगाल में प्रतिपक्ष का नेता भी नियुक्त कर दिया गया. ये मुकुल का बीजेपी में टर्निंग प्वाइंट रहा और समय रहते उन्होंने फिर ममता के शरण में जाने का मन बना लिया.
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सियासी भूचाल नंबर 6- कर्नाटक में सीएम येदियुरप्पा की सीएम कुर्सी को खतरा
अब सियासी भूचाल की ये हवा दक्षिण भारत तक पहुंची है. कर्नाटक में कोरोना का कहर खत्म नहीं हुआ है, लेकिन सीएम येदियुरप्पा और उनकी मुख्यमंत्री वाली कुर्सी को लेकर विवाद जारी है. हालात ऐसे हैं कि पहले येदियुरप्पा को यहां तक कहना पड़ता है कि अगर पार्टी हाईकमान ने चाहा तो वे इस्तीफा देने को तैयार हैं. वहीं बाद में जब कर्नाटक प्रभारी अरुण सिंह उनके नेतृत्व की पैरवी कर देते हैं, तो कुछ दिनों बाद वहीं येदियुरप्पा फिर दम भरते हैं और अपना कार्यकाल पूरा करने की बात करने लगते हैं.
यहां समझने वाली बात ये भी है कि कर्नाटक में येदियुरप्पा और उनके नेतृत्व को लेकर तीन बड़े विवाद हैं, पहला- खुद सीएम की बढ़ती उम्र, दूसरा मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर बगावत और तीसरा फंड एलोकेशन को लेकर पिछले साल हुई एक मीटिंग जहां कई बीजेपी विधायकों ने ही सीएम के खिलाफ बोल दिया था. ऐसे में अभी के लिए बीजेपी जरूर चुनाव से पहले येदियुरप्पा पर अपना भरोसा जता रही है, लेकिन विधायकों में सीएम को लेकर बढ़ता असंतोष बड़ा सियासी नुकसान और उलटफेर करने का दम रखता है.