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जातिगत जनगणना पर जोर क्यों? OBC वोटों के गणित पर टिके क्षेत्रीय दलों के समीकरण को समझें

देश में 1931 तक जाति के आधार पर एक-एक नागरिक की गिनती होती रही. 1941 में जाति पूछकर जनसंख्या गिनी गई लेकिन इसका आंकड़ा जारी नहीं किया गया.  यानी अभी 90 साल पुराने डेटा पर देश में जाति के आधार पर आबादी का गणित चला आ रहा है.

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जातिगत जनगणना पर PM मोदी से मिले बिहार के नेता (फोटो- पीटीआई)
जातिगत जनगणना पर PM मोदी से मिले बिहार के नेता (फोटो- पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • क्षेत्रीय दलों का वोटबैंक रही हैं ओबीसी जातियां
  • बीजेपी ने बड़ा हिस्सा अपने नाम कर लिया
  • जनगणना के बहाने ओबीसी वोटों की गोलबंदी की कोशिश

जातिगत जनगणना की मांग को लेकर सोमवार को बिहार से 10 राजनीतिक पार्टियां दिल्ली पहुंचीं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. इन 10 दलों में ऐसी पार्टियां भी हैं जिनका राजनीतिक अस्तित्व ही एक दूसरे के विरोध पर टिका है, लेकिन ओबीसी वोट बैंक साधने के लिए ये पार्टियां अभी एक मंच पर हैं. जातिगत जनगणना की मांग को लेकर ये पार्टियां इतनी जोर क्यों दे रही है, वोटों के गणित पर टिके इस सियासी समीकरण को आसान शब्दों में समझिए. 

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1941 से जारी नहीं हुए हैं आंकड़े

देश में 1931 तक जाति के आधार पर एक-एक नागरिक की गिनती होती रही. 1941 में जाति पूछकर जनसंख्या गिनी गई लेकिन इसका आंकड़ा जारी नहीं किया गया. यानी अभी 90 साल पुराने डेटा पर देश में जाति के आधार पर आबादी का गणित चला आ रहा है. आकलन के आधार पर जनसंख्या में ओबीसी, दलितों और सवर्णों की भागीदारी का अनुमान लगाया जा रहा है.

सामाजिक कल्याण के नीतीश और तेजस्वी का तर्क 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जातिगत जनगणना के पीछे का तर्क बताते हुए कहा कि एक बार जनगणना हो जाएगी तो आबादी की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और इसी के आधार पर उन्हें सरकारी कार्यक्रमों का लाभ मिलेगा, उन्होंने कहा कि सही आंकड़ों के अभाव में अभी कई समूहों को सरकार की नीतियों का लाभ नहीं मिल पा रहा है. 

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नीतीश को सड़क से सदन तक घेरने वाले तेजस्वी यादव इस मुद्दे पर बिहार सीएम के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं. तेजस्वी ने कहा कि जाति गणना से देश के गरीब-गुरबों को इसका लाभ मिलेगा. उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रीय हित में काम होगा तो विपक्ष हमेशा सत्ता पक्ष का सहयोग करने को तैयार रहेगा. 

ओबीसी वोटों का ध्रुवीकरण है मुख्य उद्देश्य 

लेकिन क्या सच इतना ही है?  अगर केंद्र सरकार देश में जाति आधारित आबादी की गणना करा दें तो उन आंकड़ों के आधार पर पिछड़े वर्ग की सही संख्या पता चलने पर उनका विकास राजनेता नई नीतियां बनाकर करना चाहते हैं? 

इस सवाल के जवाब पर चुनावी राजनीति पर गहन शोध करने वाली संस्था CSDS में लोकनीति के सह निदेशक संजय कुमार राजनीतिक दलों की पोल खोलते हैं. उन्होंने कहा, "निशाना तो है वोट बैंक, कोई भी राजनीतिक दल नहीं कह सकता है कि हम किसी खास वर्ग के विकास के लिए बात कर रहे हैं. हाथी के दांत दिखाने और खाने के अलग होते हैं. दिखाने वाले दांत कहेंगे कि हम एक समुदाय के आर्थिक सामाजिक विकास की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन जब जनगणना होगी और उसके आंकड़े सामने आएंगे तो सरकार पर भी दबाव डाला जाएगा कि इस समाज के विकास के लिए ही नीतियां बनाई जाए. लेकिन इससे राजनीतिक ध्रुवीकरण होगा और ये पार्टियां ओबीसी वोट को मोबिलाइज करने में सफल होंगी."

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क्षेत्रीय दलों से बीजेपी ने छीना है ओबीसी वोट बैंक 

जातियों के आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण कैसे होता है इस बात को समझने के लिए याद करिए 90 का वो दशक जब मंडल कमीशन ने पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिया. ये वो वक्त था जिसके बाद यूपी और बिहार में कई क्षेत्रीय दल पिछड़े वर्ग के वोट से मजबूत होते गए.  

1996 के लोकसभा चुनाव में जहां कांग्रेस को 25 फीसदी ओबीसी वोट मिला, बीजेपी को 19 फीसदी ओबीसी वोट हाथ आया, वहीं क्षेत्रीय दलों को सबसे ज्यादा 49 फीसदी ओबीसी कोटे का वोट हासिल हुआ. 

2009 तक ओबीसी वोट का बंटवारा कमोबेश ऐसा ही रहा. 2009 में कांग्रेस का शेयर 24, बीजेपी का 22 और अन्य दलों का 42 फीसदी रहा. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी मैजिक के सामने ओबीसी वोटों का गणित पूरी तरह बदल गया.

2019 में कांग्रेस के खाते से ओबीसी वोट 15 फीसदी आया, बीजेपी के लिए पिछड़े वर्ग के मतदाताओं ने रॉकेट की तरह छलांग लगाई और बीजेपी का वोट शेयर 44 फीसदी हो गया. 

इधर समाजवादी पार्टी, आरजेडी समेत ओबीसी वोट के मुख्य लाभुक रहे क्षेत्रीय दलों के खाते में देश में सिर्फ 27 फीसदी वोट ओबीसी से आए. 

ओबीसी वोटों को वापस पाने की कोशिश में क्षेत्रीय पार्टियां

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सवाल है कि क्या इसी कारण नीतीश, तेजस्वी समेत यूपी में समाजवादी पार्टी और दूसरे क्षेत्रीय दल जाति के आधार पर जनगणना की मांग करके ओबीसी आबादी की ताकत का सही गणित जानना चाहते हैं?  ताकि केंद्र सरकार की नौकरियां और शिक्षण संस्थाओं में OBC कोटे में बदलाव के लिए सरकार पर दबाव बनाने का मुद्दा मिले और बीजेपी की ओर शिफ्ट होते पिछड़े वर्ग के वोट को वापस अपनी ओर मोबिलाइज किया जा सके? 

लोकनीति के सह निदेशक संजय कुमार कहते हैं कि निश्चित रूप से इन पार्टियों को फायदा दिखाई पड़ता है. इनका जनाधार ओबीसी ही रहा है जो उन्हें पारंपरिक रूप से वोट करते रहे हैं. उन्होंने कहा,"जब जनगणना होगी और आंकड़े आएंगे तो पार्टियों के नेता इस बात की पुरजोर कोशिश करेंगे कि यह जो 50 फ़ीसदी आरक्षण की सीमा सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई है.  इसके इर्द-गिर्द राजनीति होगी और इन पार्टियों को फायदा होने की गुंजाइश दिखती है. 

केंद्र सरकार अब तक तक कई बार जातीय जनगणना की किसी भी तैयारी से साफ इनकार कर चुकी है. लेकिन इस बार दूसरे क्षेत्रीय दलों के अलावा बीजेपी के सहयोगी भी इस मांग पर लेकर अड़े हैं. क्योंकि बीजेपी को चुनौती देने के लिए इनके तरकश में फिलहाल सबसे बड़ा मुद्दा जाति के नाम पर जनता की गिनती ही है. 

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(आजतक ब्यूरो)

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