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UP में कांग्रेस को संजीवनी, इस बार 7 हजार लोगों ने टिकट मांगे, पार्टी का प्लान क्या है?

कांग्रेस ने विधानसभा सीटों का बंटवारा रणनीति के आधार पर किया है. इस बार पार्टी ने करीब चार दर्जन से ज्यादा ऐसी सीटों की पहचान की है जहां उसे बेहतर नतीजों की उम्मीद है.

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7 हजार कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में दावेदारी पेश की है
7 हजार कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में दावेदारी पेश की है
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पिछले चुनाव में कांग्रेस 100 सीटों पर मैदान में थी, लेकिन मात्र 7 सीटें जीती थीं
  • पहले की तुलना में इस बार आवेदकों की संख्या बहुत ज्यादा है
  • कांग्रेस इस बार 40 प्रतिशत महिलाओं को हिस्सेदारी देगी

यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सभी 403 सीटों पर अकले चुनाव लड़ रही है. बहुत साल बाद ऐसा दिख रहा है जब बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं ने विधानसभा जाने के लिए टिकट मांगा है. 7 हजार कार्यकर्ताओं ने योग्यता शर्तों को लगभग पूरा करते हुए, अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में दावेदारी पेश की है. लगभग सभी विधानसभा सीटों पर 10 से 20 की संख्या तक दावेदार सामने आए हैं. पार्टी नेता चुनाव से पहले प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में इसे अच्छा संकेत मान रहे हैं.

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यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने कहा- 'पहले की तुलना में इस बार आवेदकों की संख्या बहुत ज्यादा है. 7 हजार पार्टी कार्यकर्ताओं ने अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी टिकट पर चुनाव में उतरने की इच्छा जताई है. आवेदकों ने पार्टी की तमाम योग्यता शर्तों को पूरा किया है और करीब हर सीट पर 10 से 20 बढ़िया दावेदार सामने आए हैं. यूपी कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा कि टिकट वितरण में कांग्रेस इस बार 40 प्रतिशत महिलाओं को हिस्सेदारी देगी. युवा, अल्पसंख्यक और दलित उम्मीदवारों का पूरा ख्याल रखा जा रहा है. यह दावा भी किया कि कांग्रेस यूपी में सभी तरह के राजनीतिक पूर्वानुमान ध्वस्त करने जा रही है. पिछले चुनाव में कांग्रेस 100 सीटों पर मैदान में थी, लेकिन मात्र सात सीट जीतने में कामयाब हुई थी.

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आवेदन लेना बंद, पर अभी भी दावेदार सामने आ रहे

कांग्रेस ने काफी पहले ही टिकटों के लिए आवेदन लेने की प्रक्रिया बंद कर दी थी. हालांकि हमारे सूत्रों ने बताया कि अभी भी आवेदन स्वीकार किए जा रहे हैं. मगर वही आवेदन लिए जा रहे जिन्हें खुद प्रदेश अध्यक्ष आगे बढ़ा रहे हैं. विधानसभा चुनाव 2022 के लिए कांग्रेस ने टिकट दावेदारों के सामने कई शर्तें रखी थीं. इसमें सभी को कोष में 11 हजार रुपये जमा करने और संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों में एक निश्चित सदस्यता लक्ष्य पूरा करना था. इसके साथ ही हर दावेदार से बनाए गए सदस्यों के जरिए भी पार्टी कोष में पांच-पांच रुपये का शुल्क जमा करने जैसी शर्त भी रखी गई थी. यह शर्त पार्टी के साथ जुड़ने वाले नए सदस्यों की निष्ठा के लिए रखी गई थी.

चार दर्जन सीटों पर मैदान में उतर चुके हैं दावेदार

टिकट वितरण को हमारे अन्य सूत्रों से पता चला कि पार्टी में बने रहने वाले सभी मौजूदा विधायकों को टिकट दिया जाएगा. पिछले विधानसभा चुनाव में अच्छी मार्जिन के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवारों को भी टिकट दिया जाएगा. इनमें उपचुनाव में भी अच्छा करने वाले नेता होंगे. कांग्रेस ने विधानसभा सीटों का बंटवारा रणनीति के आधार पर किया है. इस बार पार्टी ने करीब चार दर्जन से ज्यादा ऐसी सीटों की पहचान की है जहां उसे बेहतर नतीजों की उम्मीद है. इन सीटों पर संभावित उम्मीदवारों को अनाधिकारिक रूप से पहले ही मैदान में जुट जाने का संकेत दे दिया है और वे कई हफ़्तों से आक्रामक कैम्पेन भी ड्राइव कर रहे हैं. इनकी घोषणा औपचारिकता भर है. शेष सीटों टिकट वितरण की प्रक्रिया के तहत काम हो रहा है.

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दूसरी ऐसी सीटें होंगी जहां पार्टी जाति लिंग और धर्म के आधार पर कैंडिडेट उतारकर कांग्रेस के पक्ष में एक फ़ॉर्मूला सेट करने की कोशिश करेगी. पार्टी को लगता है कि भले ही ये सीटें जीती ना जा सकें, लेकिन इनके जरिए प्रदेश और देश की राजनीति में बड़ा मैसेज दिया जा सकता है. पार्टी की योजना ऐसी सीटों पर हर वर्ग की महिला उम्मीदवारों, युवाओं और जातीय समीकरण को साधने वाले कैंडिडेट देने की है.

कांग्रेस बाकी की कुछ सीटों पर अंतिम समय में रणनीति बदलने की संभावना बनाए हुए है. ये वो सीटें होंगी जहां पार्टी भविष्य की राजनीतिक खींचतान में दलबदलू उम्मीदवारों की ओर ललचाई देख रही है. भाजपा में बड़े पैमाने पर विधायकों के टिकट कटने की आशंका है. सपा ने रालोद-प्रसपा-महान दल जैसे दलों के साथ गठबंधन किया है. साझेदारी में सीटें किसी पार्टी को जाने की स्थिति में दूसरी पार्टी के असंतु्ष्ट कांग्रेस का हाथ थाम सकते हैं. पार्टी नेताओं को भरोसा है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश, अवध और बुंदेलखंड में साझेदारी और टिकट बंटवारे के बाद उसके लिए अन्य पार्टियों के असंतुष्ट एक बेहतर मौका बन सकते हैं.

यूपी में कांग्रेस का सांगठनिक आधार भाजपा, सपा और बसपा के सामने बहुत कमजोर है. तीनों स्थितियों में कांग्रेस ना सिर्फ हर विधानसभा में एक बेहतर नेटवर्क बनाने में कामयाब होगी बल्कि उसके मत प्रतिशत में भी तगड़ा इजाफा होगा. यह लोकसभा चुनाव से पहले एक बेहतर गठबंधन बनाने में कांग्रेस की मदद करेगा.

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विधानसभा चुनाव बहाना, कांग्रेस की योजना दीर्घकालिक

दरअसल, कांग्रेस के अलग-अलग सांगठनिक सूत्रों से जो संकेत मिले हैं उससे साफ़ है कि पार्टी की योजना विधानसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं है. केंद्रीय राजनीति में विपक्ष के रूप में कांग्रेस के सामने क्षेत्रीय ताकतों ने विकल्प खड़ा करने की कोशिश की है. यूपी में कांग्रेस का कमजोर आधार 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी के लिए सिरदर्द बना हुआ है. यही वजह है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा की सत्ता में वापसी और अखिलेश यादव के दोबारा कुर्सी तक पहुंचने से ज्यादा 'मिस्टीरियस' सवाल प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में कांग्रेस के पुनर्जन्म को लेकर हो रहा है. पार्टी का चुनाव में मजबूती से बने रहना उसके लिए यूपी में सरकार बनाने-बिगाड़ने से ज्यादा महत्वपूर्ण है.

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले यूपी चुनाव कांग्रेस के लिए जीवन-मरण का सवाल भी है. देश के सबसे बड़े राज्य में कांग्रेस की सेहत से ही केंद्र में नरेंद्र मोदी के सामने पार्टी की विपक्षी हैसियत का निर्धारण होगा. यूपी में कांग्रेस को जो भी आधार मिलेगा, वह तय केरेगा कि केंद्र की राजनीति में मोदी के खिलाफ 'मजबूत विपक्ष' किसी गांधी-वाड्रा के पीछे खड़ा होगा या फिर उनका नेतृत्व क्षेत्रीय नेता के रूप में कोई तीसरी ताकत करेगा.

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हकीकत में यूपी का विधानसभा चुनाव कांग्रेस की दीर्घकालिक राजनीतिक योजनाओं का ही एक हिस्सा है. मोदी 2.0 के बाद से ही कांग्रेस की ओर से लगाया गया पूरा जोर इस बात को पुष्ट भी करता है. यूपी से कांग्रेस और गांधी परिवार को ऐसे जनादेश की उम्मीद है जो हिंदी बेल्ट के साथ ही समूचे देश में विपक्षी दलों को बड़ा संदेश देने वाला साबित हो.

पंजाब ने यूपी कांग्रेस को मुस्कुराने का मौका दिया

भाजपा के सामने यूपी में कांग्रेस की विपक्षी हैसियत कागजी रूप से ना के बराबर है. लेकिन तीन तलाक, धारा 370, नागरिकता क़ानून, किसान आंदोलन, महंगाई और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर प्रियंका और राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस ने यूपी में भी विपक्ष को मोदी 2.0 में लंबे वक्त तक आगे बढ़ने से रोके रखा. हालांकि अखिलेश की रथ यात्राओं के शुरू होने के बाद, अब तक भाजपा के निशाने पर बनी रही कांग्रेस की जगह सपा लेते गई. लेकिन सुरक्षा कारणों से पंजाब में मोदी की रैली रद्द होने के बाद ताजा हालात कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकते हैं.

साफ है कि पंजाब में जो कुछ हुआ उसे भाजपा यूपी में भुनाने की तैयारी कर रही है. जाहिर है कि भाजपा के निशाने पर प्राथमिकता से एक बार फिर कांग्रेस होगी. बीजेपी का कांग्रेस पर सीधा हमला यूपी में पार्टी को एक विपक्ष के तौर पर स्वीकार्यता दिलाने वाला साबित हो सकता है. चुनाव से पहले 'मजबूत' विपक्ष के रूप यह कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है.

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403 विधानसभा सीटों पर होने से कांग्रेस के मत प्रतिशत में नतीजों के आने तक तगड़ा सुधार का संकेत तो माना ही जा सकता है.

 

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