
हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं. इन तीनों ही राज्यों में गुटबाजी कांग्रेस के लिए सिरदर्द रही है लेकिन चुनाव से पहले एक्टिव हुआ कांग्रेस नेतृत्व तीनों ही राज्यों में गुटबाजी पर लगाम लगाने में सफल नजर आ रहा है. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव हों या राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट या मध्य प्रदेश में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह, सभी हम साथ-साथ हैं का संदेश देते नजर आ रहे हैं.
बघेल ने सिंहदेव के पैर छूकर लिया आशीर्वाद
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच कुछ महीने पहले तक नूराकुश्ती चल रही थी. ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री के फॉर्मूले की बात आई, रायपुर से दिल्ली तक बैठकों का दौर चला. शीर्ष नेतृत्व एक्टिव हुआ. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में हुई बैठक में टीएस सिंहदेव को बघेल सरकार में डिप्टी सीएम बनाने के फॉर्मूले पर छत्तीसगढ़ की रार का हल निकला. सिंहदेव को डिप्टी सीएम बनाए जाने को लेकर जानकारी भी कांग्रेस नेतृत्व की ओर से जारी की गई.
टीएस सिंहदेव को भूपेश बघेल सरकार में नंबर दो का ओहदा देकर पार्टी ने छत्तीसगढ़ की गुटबाजी थाम ली. अब सूबे में सियासी हालात इस कदर करवट ले चुके हैं कि मुख्यमंत्री बघेल, टीएस सिंहदेव को अपना बड़ा भाई बता रहे हैं, पैर छूकर आशीर्वाद ले रहे हैं. सीएम बघेल ने सरगुजा में पैर छूकर सिंहदेव का आशीर्वाद लेने के बाद कहा भी कि हमारी केमिस्ट्री अच्छी थी. हमेशा ही स्नेह रहा है.
राजस्थान की रार का कैसे निकला हल
राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच तल्खी इस हद तक बढ़ गई थी कि उसे कंट्रोल कर पाना बहुत मुश्किल माना जाने लगा था. सीएम गहलोत ने पायलट को निकम्मा, नकारा, गद्दार तक कह दिया था. पायलट भी अपनी ही पार्टी की सरकार में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को लेकर धरने पर बैठ गए, पदयात्रा निकाली. इस रार का हल निकल भी पाएगा या नहीं? ये सवाल उठने लगे थे लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने चुनाव से कुछ महीने पहले इस गुटबाजी का भी हल खोज निकाला.
कांग्रेस नेतृत्व ने पायलट को संतुष्ट करने के लिए ये ऐलान कर दिया कि हम चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा आगे किए बिना जाएंगे. दोनों नेताओं से एकजुट होकर चुनाव मैदान में जाने और बयानबाजियां तत्काल रोकने को कहा. नेतृत्व की पहल का असर ये हुआ कि जब बीजेपी ने सचिन पायलट के पिता को बीजेपी ने घेरा तब अशोक गहलोत बचाव में उतर आए.
बीजेपी ने मिजोरम में भारतीय वायुसेना की ओर से बमबारी का दावा कर सचिन पायलट के पिता को कठघरे में खड़ा किया था.राजस्थान कांग्रेस के संगठन में भी पायलट खेमे के सदस्यों को प्रतिनिधित्व दिया गया. कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने सचिन पायलट को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी शामिल कर एक तरह से ये संदेश दिया कि पार्टी में उनकी अहमियत कम नहीं हुई है. राजस्थान के बाहर भी कांग्रेस को पायलट की जरूरत है.
मध्य प्रदेश में खत्म हुई नासूर बन चुकी गुटबाजी
मध्य प्रदेश कांग्रेस और गुटबाजी, दोनों ही एक-दूसरे के पर्याय बन गए थे. यहां तक कहा जाने लगा था कि कांग्रेस को कांग्रेस ही हराती है. पिछले विधानसभा चुनाव के बाद कमलनाथ सरकार की 15 महीने में ही विदाई ने भी इस धारणा को और मजबूत कर दिया. पिछले चुनाव तक मध्य प्रदेश कांग्रेस में मुख्य रूप से तीन गुट थे- दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया का गुट. चुनाव के समय जैसे-तैसे हर गुट को साधकर कांग्रेस ने चुनावी नैया तो पार लगा ली थी लेकिन पार्टी उस एकजुटता को बरकरार नहीं रख पाई और सिंधिया गुट की बगावत के कारण कमलनाथ को 15 महीने में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ गई थी.
सिंधिया के बीजेपी जॉइन करने के बाद सूबे में अब दो ही गुट रह गए हैं- कमलनाथ और दिग्विजय. दोनों ही पूर्व मुख्यमंत्री हैं. दिग्विजय सिंह 10 साल तक सूबे की सत्ता के शीर्ष पर रहे हैं तो वहीं कमलनाथ 15 महीने. चुनाव से पहले दोनों साथ नजर आ रहे हैं. दिग्विजय सिंह चुनाव के समय कमलनाथ के लिए एक तरह से लक्ष्मण की भूमिका में आ गए हैं. पार्टी ने भी दोनों नेताओं के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए अच्छा फॉर्मूला निकाला है. कमलनाथ जहां मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं तो वहीं दिग्विजय सिंह को भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में एडजस्ट किया गया है. मध्य प्रदेश में कभी नासूर नजर आने वाली गुटबाजी की बीमारी चुनाव से पहले खत्म नजर आ रही है.
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए कितना फायदेमंद?
अनुभवी मल्लिकार्जुन खड़गे ने जिस तरह से गुटबाजी जैसी बड़ी समस्या पर लगाम लगाई है, कांग्रेस के लिए आगामी चुनाव में ये कितना फायदेमंद होगा? राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि इससे इन राज्यों में कांग्रेस के नेताओं, कार्यकर्ताओं के बीच निश्चित रूप से सकारात्मक संदेश जाएगा. इन राज्यों के कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बढ़े मनोबल का असर वोटों के रूप में भी नजर आ सकता है.