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दानिश अली से राहुल के बाद अब अजय राय भी मिले, क्या नए सियासी समीकरणों की है तैयारी?

बसपा सांसद दानिश अली से राहुल गांधी के बाद अब यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने भी मुलाकात की है. दानिश अली से कांग्रेस नेताओं के मेल-मुलाकातों के पीछे क्या है? क्या नए सियासी समीकरण गढ़ने की तैयारी है?

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बसपा सांसद दानिश अली (फाइल फोटोः पीटीआई)
बसपा सांसद दानिश अली (फाइल फोटोः पीटीआई)

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद रमेश बिधूड़ी ने संसद में चंद्रयान-3 मिशन की सफलता को लेकर चर्चा के दौरान बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सांसद कुंवर दानिश अली के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था. बसपा प्रमुख मायावती ने ट्वीट कर दानिश अली को लेकर बीजेपी सांसद की टिप्पणी की निंदा की थी वहीं, इसे लेकर विपक्षी कांग्रेस फ्रंटफुट पर आ गई है.

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कांग्रेस ने राजस्थान चुनाव में रमेश बिधूड़ी को जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर भी बीजेपी पर हमला बोला है. कांग्रेस एक तरफ बिधूड़ी और बीजेपी पर हमले कर रही है तो दूसरी तरफ दानिश अली से कांग्रेस नेताओं की मुलाकात का सिलसिला जारी है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, केसी वेणुगोपाल और इमरान प्रतापगढ़ी के बाद अब उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने दानिश अली से मुलाकात की है.

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अजय राय की दिल्ली में दानिश अली से मुलाकात को कांग्रेस पार्टी का सुख-दुख में साथ खड़ा होना बता रही है. यूपी कांग्रेस के प्रवक्ता अंशु अवस्थी ने इसे लेकर कहा कि दानिश अली एक विपक्षी पार्टी के सांसद हैं. उनके लिए संसद में जिस तरह की भाषा इस्तेमाल की गई, विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम उनके साथ मजबूती से खड़े हों. उन्होंने कहा कि दानिश अली लोकसभा में यूपी की अमरोहा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं और ऐसे में यूपी कांग्रेस का अध्यक्ष होने के नाते ये अजय राय का फर्ज था.

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दानिश अली से मिलने उनके आवास पहुंचे यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय (फोटोः एक्स)
दानिश अली से मिलने उनके आवास पहुंचे यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय (फोटोः एक्स)

यूपी कांग्रेस के प्रवक्ता ने दानिश अली के कांग्रेस में शामिल होने की अटकलों को खारिज करते हुए इसे एकजुटता का संदेश देने की कोशिश बताया. यूपी कांग्रेस भले ही इन मेल-मुलाकातों को दानिश के विपक्ष का सांसद होने के नाते एकजुटता दिखाने की कोशिश और सुख-दुख में साथ खड़े होने के संस्कारों से जुड़ा बता रही हो, सवाल उठ रहे हैं कि क्या बात बस इतनी सी ही है? कांग्रेस का हाल आखिर 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना टाइप' क्यों हो गया है?

दरअसल, बिधूड़ी की टिप्पणी के बाद दानिश के साथ जितना बसपा या मायावती खड़ी नजर नहीं आईं, उससे कहीं अधिक कांग्रेस एक्टिव नजर आई है. मायावती ने ट्वीट कर दानिश पर टिप्पणी की निंदा की थी. दलित-मुस्लिम समीकरण सेट करने की कोशिश में जुटीं मायावती के ट्वीट की सॉफ्ट भाषा को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे थे. इस पूरे घटनाक्रम को लेकर दानिश ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर कार्रवाई करने की मांग की थी. दानिश की शिकायत के बाद बीजेपी के निशिकांत दुबे और रवि किशन ने भी स्पीकर को पत्र लिखा.

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निशिकांत दुबे और रवि किशन ने बिधूड़ी के बयान का समर्थन नहीं किया लेकिन दानिश अली के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर दी. बिधूड़ी के पक्ष में ना सही लेकिन दानिश अली के खिलाफ बीजेपी के सांसद उतर आए लेकिन बसपा नेतृत्व और नेताओं ने मौन रहना उचित समझा. इन सब घटनाक्रमों के कारण खबरें तो यहां तक आईं कि दानिश का बसपा से मोह भंग हो गया है. कयास यहां तक लगाए जाने लगे कि दानिश अली बसपा छोड़ सकते हैं. हालांकि, दानिश अली की ओर से इसे लेकर कोई बयान नहीं आया है. पूरे विवाद पर बसपा और मायावती के रुख को लेकर दानिश अली की नाराजगी के भी चर्चे हैं. 

दानिश अली से गले मिले अजय राय (फोटोः एक्स)
दानिश अली से गले मिले अजय राय (फोटोः एक्स)

दूसरी तरफ, दानिश अली के मामले में खुद राहुल गांधी एक्टिव नजर आए. लोकसभा में बिधूड़ी की टिप्पणी के अगले ही दिन राहुल गांधी संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के साथ दानिश अली से मिलने उनके आवास पर पहुंच गए. इसके बाद समाजवादी पार्टी (सपा) भी दानिश के पक्ष में खुलकर आ गई. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि दानिश अली सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में जीते थे. इसलिए दानिश जितने बसपा के हैं, उतने ही सपा के भी हैं.

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इन सबके बीच एक पहलू ये भी है कि मायावती ये ऐलान कर चुकी हैं कि बसपा लोकसभा चुनाव में किसी भी गठबंधन में शामिल नहीं होगी और अकेले चुनाव लड़ेगी. कांग्रेस की इस सक्रियता को गठबंधन में एंट्री के लिए मायावती को तैयार करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है. कांग्रेस की ओर से पहले भी ये कहा जाता रहा है कि मायावती के लिए विपक्षी गठबंधन के दरवाजे हमेशा खुले हुए हैं, वह जब चाहें आ सकती हैं. यूपी में बसपा के बगैर विपक्षी गठबंधन कितना प्रभावी हो पाएगा, ये भी बहस का विषय रहा है.

कांग्रेस, सपा और विपक्षी गठबंधन के तमाम घटक दल मऊ जिले की घोसी सीट पर साइकिल दौड़ने को 2024 का संकेत बता रहे हैं, वहां हाथी से कोई उम्मीदवार नहीं था. ये भी फैक्ट है. विपक्षी दलों के नेताओं की पटना में हुई पहली बैठक से पहले भी मायावती के इसमें शामिल होने की चर्चा जोरो पर थी. तब ये भी अटकलें थीं कि बसपा 40 सीटें मांग रही है. मायावती ने पटना की बैठक से पहले कहा भी था कि विपक्ष में चल रही राजनीतिक हलचल पर हमारी नजर है.

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दानिश अली से राहुल गांधी ने भी की थी मुलाकात (फाइल फोटो)
दानिश अली से राहुल गांधी ने भी की थी मुलाकात (फाइल फोटो)

साफ है कि यूपी में अगर इंडिया गठबंधन के बैनर तले सपा और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए अखिलेश को दरियादिली दिखानी होगी. अब एक पहलू ये भी है कि राजनीति में कोई बेवजह दरियादिली नहीं दिखाता. कांग्रेस को अगर अखिलेश के सामने सीटों की मांग मजबूती से रखनी है तो उसे सीट बंटवारे के समय मुस्तैदी से दिखानी होगी, अपनी ताकत बढ़ानी होगी.

कांग्रेस अगर मायावती को विपक्षी गठबंधन में आने के लिए मना लेती है तो अखिलेश के लिए कोई भी फैसला एकतरफा ले पाना आसान होगा. दानिश अली से कांग्रेस नेताओं की मेल-मुलाकातों को इस नजरिए से भी देखा जा रहा है. अब कांग्रेस का दानिश के साथ खुलकर आ जाना क्या गुल खिला पाता है, ये देखने वाली बात होगी.

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