वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने 2024 की जंग के लिए अभी से ताल ठोंक दी है. 76 साल के दिग्विजय सिंह ने चुनावी दंगल में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को सीधा चैलेंज किया है और कहा है कि अगर कांग्रेस पार्टी कहे तो वह अगले साल गुना सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ उतरने को तैयार हैं.
मध्य प्रदेश के गुना लोकसभा सीट को सिंधिया राजपरिवार का गढ़ माना जाता है. सिंधिया परिवार के सदस्यों को अभी भी यहां की जनता महाराज के नाम से संबोधित करती है. आजादी के बाद के पिछले 75 सालों में कम ही ऐसे मौके आए हैं जब ये सीट सिंधिया खानदान के हाथों से खिसकी है. कभी विजया राजे, कभी माधवराव तो कभी ज्योतिरादित्य सिंधिया इस सीट से यहां की जनता का प्रतिनिधित्व करते आए हैं. हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जब ज्योतिरादित्य इस सीट से उतरे तो प्रचंड मोदी लहर का सामना वे नहीं कर सके. सियासत के इस दंगल में उन्हें बीजेपी के सामान्य उम्मीदवार कृष्ण पाल सिंह यादव ने पटखनी दे दी.
अभी ज्योतिरादित्य बीजेपी में हैं और इसी मौके को भांपते हुए दिग्विजय सिंह ने इस सीट से अपनी दावेदारी पेश कर राजनीतिक हलकों में सनसनी मचा दी है. दीगर है कि दिग्विजय सिंह भी मध्य प्रदेश के राघोगढ़ राजपरिवार से आते हैं.
मध्य प्रदेश के सिवनी में पहुंचे दिग्विजय सिंह ने गुना सीट से अपनी दावेदारी पेश करते हुए कहा कि वे अभी राज्यसभा के सदस्य हैं और उन्हें चुनाव लड़ने की आवश्यकता नहीं है. लेकिन वे पार्टी के सिपाही हैं और पार्टी उन्हें जो भी आदेश देगी वे करेंगे. दिग्विजय सिंह ने कहा कि उनका संसदीय क्षेत्र गुना नहीं बल्कि राजगढ़ है. उन्होंने कहा कि पिछली बार उन्हें भोपाल से चुनाव लड़ने के लिए कहा गया था जो उनकी सीट नहीं थी. लेकिन वे पार्टी के कार्यकर्ता और सिपाही हैं. इस बारे में पार्टी जो भी आदेश देगी, उसपर वे काम करेंगे.
2019 का चुनाव, गुना सीट और जीत-हार का गुणा-गणित
2019 का लोकसभा चुनाव गुना लोकसभा सीट, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के उलटफेर लेकर आया. गुना सीट से 2019 में कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को टिकट दिया था. ये सीट सिंधिया की पारंपारिक सीट थी. वे इससे पहले इस सीट से 2002, 2004, 2009 और 2014 से सांसदी का चुनाव जीत चुके थे. उनके पिता भी इस सीट से सांसद रहे थे. लिहाजा न तो कांग्रेस को और न ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को इस सीट से अपनी जीत को लेकर कोई शक-सुबहा था. इधर बीजेपी ने इस सीट पर टिकट दिया कभी ज्योतिरादित्य सिंधिया के विश्वासपात्र रहे कृष्ण पाल सिंह यादव को. कृष्ण पाल सिंह यादव सिंधिया के लंबे कार्यकाल के दौरान उनके सांसद प्रतिनिधि रहा करते थे. लेकिन बाद में कुछ विवाद की भी वजह से उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया का साथ छोड़ दिया और बीजेपी में शामिल हो गए.
2019 में मोदी लहर पर सवार होकर कृष्ण पाल सिंह यादव ने वो कर दिखाया जिसे राजनीति में सियासी तख्तापलट कहा जा सकता है. कृष्ण पाल सिंह यादव ने सिंधिया खानदान को उनके गढ़ में ही मात दिया और चुनाव जीत लिया. इस बीच मध्य प्रदेश में कांग्रेस की राजनीति में कई उथल-पुथल हुए और आखिरकार मार्च 2020 में सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए. इसके बाद बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा भेजा और फिर उड्डयन मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई.
राघोगढ़ के राजा साहेब दिग्विजय
इधर दिग्विजय सिंह के लिए भी 2019 का चुनाव हलचल भरा रहा. राजगढ़ लोकसभा से चुनाव लड़ने वाले दिग्विजय सिंह 2019 में भोपाल से बीजेपी कैंडिडेट प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ उतरे. लेकिन 10 साल तक मध्य प्रदेश के सीएम रहे दिग्विजय सिंह को एमपी की राजधानी भोपाल में इस चुनाव में शिकस्त का सामना करना पड़ा. बता दें कि दिग्विजय सिंह ने विधानसभा का चुनाव राघोगढ़ से लड़ा तो लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी उम्मीदवारी राजगढ़ सीट से पेश की. राघोगढ़ विधानसभा सीट से दिग्विजय सिंह ने 1977 में पहली जीत हासिल की थी. इसके बाद इस सीट से वे 1980, 1998, 2003 से जीते. जबकि राजगढ़ लोकसभा सीट से दिग्विजय सिंह 1984, 1991 में जीते. इस सीट से 2013 और 2018 में उनके बेटे जयवर्धन सिंह चुनाव जीते. दिग्विजय सिंह 2014 से राज्यसभा सांसद हैं.
एक दल में रहे, लेकिन नहीं मिले दिल
मार्च 2020 से पहले दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया भले ही एक ही पार्टी में रहे हों, लेकिन कहा जाता है इन दोनों नेताओं के बीच अविश्वास की खाई हमेशा बनी रही. इसके पीछे दो राजपरिवारों की प्रतिस्पर्द्धा और अदावत तो है ही एक ही पार्टी में वर्चस्व की जिद भी है. ज्योतिरादित्य सिंधिया अगर ग्वालियर राजघराने के महाराजा हैं तो दिग्विजय सिंह भी राघोगढ़ राजपरिवार के राजा साहेब हैं.
सिंधिया की ग्वालियर रियासत और दिग्विजय की राघोगढ़ रियासत के भी प्रतिद्वंदिता की कहानियां दशकों पुरानी है. साल 2018 में जब कांग्रेस मध्य प्रदेश में सरकार बना रही थी उस दौरान ज्योतिरादित्य भी सीएम पद की रेस में थे लेकिन इस दौरान दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ का समर्थन कर दिया. इसके बाद सीएम पद की कुर्सी कमलनाथ को मिली. यही वो समय था जब ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांग्रेस नेतृत्व के बीच खटास पैदा हो गई. इसके सवा साल बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आखिरकार कांग्रेस को छोड़ ही दिया.
अब दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के किले में उतरकर उन्हें टक्कर देने का ऐलान कर लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी है.